पटना की सड़कों से...
पटना की सड़कों पर हूं। हाथ में माइक है, सिर पर हेलमेट। न किसी समाचार चैनल का रिपोर्टर हूं, न दोपहिया चलाना जानता हूं।हेलमेट इसलिए पहन रखा है कि इस देश में अब विचारों से पहले पत्थर चलते हैं और संवाद से पहले लाठियां।
दिल्ली से उठी आंदोलन की आंच अब पटना तक पहुंच चुकी है।हर चौक पर क्रांति है, हर गली में प्रतिरोध है और हर मोबाइल कैमरे में एक भविष्य का नेता, क्रिएटर या इंफ्लुएंसर जन्म लेने को तैयार बैठा है। जगह-जगह प्रदर्शन हैं, नारे हैं, कैमरे हैं, लाइव स्ट्रीम हैं, और उनके बीच कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जिन्हें देखकर लगता है कि वे किसी मुद्दे के लिए नहीं, किसी अवसर के लिए आए हैं।
पेपर लीक केवल छात्रों का नहीं, पूरे समाज का प्रश्न है। यह उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है, जो मेहनत को किस्मत के भरोसे छोड़ देती है। इसलिए विरोध होना चाहिए, जोरदार होना चाहिए, जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। लेकिन विरोध और उग्रता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।
आज जो दृश्य देखा, उसने एक बात और स्पष्ट कर दी। सामान्य छात्र वहां मौजूद थे, अपनी पीड़ा के साथ। लेकिन उन्हीं के बीच कुछ ऐसे लोग भी थे जिनके हाथों में किताबें नहीं, लाठियां थीं। राजभवन की ओर बढ़ते कदम बीजेपी कार्यालय के सामने रुक गए। फिर वही हुआ जो अक्सर भीड़ में होता है—नारे पत्थरों में बदल गए, और जवाब कानून से पहले लाठियों में मिलने लगा। पुलिस ने समय रहते दोनों पक्षों को अलग कर दिया, वरना कुछ मिनटों में पूरा मुद्दा हिंसा की राख में दब चुका होता।
यही हर आंदोलन की सबसे बड़ी विडंबना है। आंदोलन को शुरू करना जितना कठिन है, उसे आंदोलन बनाए रखना उससे कहीं अधिक कठिन है। भीड़ अपने साथ केवल संख्या नहीं लाती, चरित्र भी लाती है। और यदि आयोजक उस चरित्र की रक्षा नहीं कर सकते, तो फिर आंदोलन धीरे-धीरे अपने उद्देश्य से नहीं, अपनी तस्वीरों से पहचाना जाने लगता है।
मैंने एक और चेहरा देखा—रील वाली पीढ़ी का। उनके लिए आंदोलन विचार का नहीं, कंटेंट का विषय है। कैमरा ऑन होते ही क्रांति शुरू होती है, कैमरा बंद होते ही प्रतिबद्धता समाप्त। भाषा में तर्क कम, गालियां अधिक; अध्ययन कम, अभिनय अधिक; और उद्देश्य से ज़्यादा महत्व एल्गोरिद्म का। उन्हें ट्रेंड चाहिए, चाहे मुद्दा ट्रेंड से बाहर हो जाए।
इतिहास गवाह है कि किसी भी जनांदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिकता होती है। जिस दिन आंदोलन की पहचान पत्थर, आगजनी और वायरल क्लिप बनने लगे, उसी दिन वह नैतिक बढ़त खो देता है। पचास हज़ार लोगों की एक घंटे की उग्रता, पचास लाख लोगों की सहानुभूति छीन लेती है।
मुझे सबसे अधिक चिंता उन वास्तविक छात्रों की है, जो अपनी मेहनत, अपने भविष्य और अपने अधिकार की लड़ाई लड़ने आए थे। भीड़ शांत होगी, कैमरे हटेंगे, कुछ लोग नेता कहलायेंगे, कुछ लोग इंफ्लुएंसर बन जायेंगे, कुछ राजनीतिक दल इस ऊर्जा का हिसाब अपने-अपने खाते में जोड़ लेंगे। लेकिन अंत में छात्र फिर अपनी किताबों के सामने अकेला बैठा मिलेगा—हाथ में वही अधूरा सिलेबस और सिर पर वही अनिश्चित भविष्य।
आंदोलन की सफलता इस बात से तय नहीं होती कि कितनी बसें जलीं, कितनी लाठियां चलीं या कितने हैशटैग ट्रेंड हुए। उसकी सफलता इस बात से तय होती है कि क्या उसने समाज का भरोसा जीता, क्या उसने सत्ता को जवाबदेह बनाया और क्या उसने अपने उद्देश्य को भीड़ के शोर में खोने नहीं दिया।
एक और बात समझने की है। हर लाल झंडा अन्याय के खिलाफ नहीं उठता, और हर भगवा झंडा व्यवस्था का प्रतीक नहीं होता। राजनीतिक झंडे जब छात्रों की लड़ाई पर हावी हो जाते हैं, तब छात्र सबसे पीछे छूट जाता है। फिर लड़ाई शिक्षा की नहीं रहती, वर्चस्व की हो जाती है। और सत्ता तथा विपक्ष दोनों अपने-अपने हिसाब से उस भीड़ का इस्तेमाल कर लेते हैं।
आख़िर में मंच पर कुछ नए चेहरे बचते हैं—कोई नेता बन जाता है, कोई इंफ्लुएंसर, कोई यूट्यूबर। लेकिन जिसने परीक्षा दी थी, वह फिर अपने कमरे में लौटकर अगली भर्ती का फॉर्म भर रहा होता है।
लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, पर विरोध की भी एक संस्कृति होती है। जो आंदोलन अपनी नैतिक ऊँचाई बचाकर रखता है, वही इतिहास लिखता है। जो आंदोलन पत्थरों के भरोसे चलता है, वह अगले दिन सिर्फ न्यूज़ क्लिप बनकर रह जाता है।
याद रखिए, भीड़ सरकारें गिरा सकती है, लेकिन केवल अनुशासित आंदोलन ही व्यवस्था बदलते हैं। और जिस दिन आंदोलन का सबसे बड़ा लक्ष्य न्याय नहीं, वायरल होना बन जाए, उस दिन समझ लीजिए कि मुद्दा हार चुका है—बस हैशटैग जीत रहा है।
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एक अवैध स्पीड ब्रेकर से गाजियाबाद में पिछले महीने राहुल नाम के एक युवा की जान चली गई. परिजनों ने नगर निगम से इस स्पीड ब्रेकर के बारे में जवाब मांगा. सवाल था कि अवैध स्पीड ब्रेकर किसने बनाया? किसकी अनुमति से मौत के अगले ही दिन ब्रेकर हटाया गया? इसे बनाने वाले JE, AE, ठेकेदार और कर्मचारी कौन थे? गाजियाबाद नगर निगम को लगता है कि यह जानकारी नहीं दी जा सकती. इस अवैध ब्रेकर की जानकारी देने से देश कैसे खतरे में पड़ जाएगा? नगर निगम के अफसरों को क्यों डर लग रहा है इस छोटे से सवाल का जवाब देने में? गाजियाबाद नगर निगम ने जो जवाब दिया है उसकी प्रति नीचे है. @AMRUTCityGzb@sunitadayalbjp@dm_ghaziabad@JRavinderGoud1@myogiadityanath@aksharmaBharat@ChiefSecyUP@UPGovt #JusticeForRahul
देश के हालात-ए-हाज़िरा पर राहत इंदौरी साहब की ग़ज़ल का एक मिसरा याद आता है-
लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में,
यहां पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है!
#jantarmantarprotest#jantarmantar#neetpaperleak
कायर कहलाते हैं
कायर कहलाते हैं
जालिम को पीठ दिखाने वाले,
तानाशाहों को चमकाने वाले
कायर कहलाते हैं...
जो डर जाते हैं आंसू के गोलों से
बूटों के तस्मों से
वर्दी की लाठी से
कायर कहलाते हैं...
जो हुंकारों में चुप रहते
सवाल पूछने से बचते
कायर कहलाते हैं....
जो सच को अनदेखा कर दें
झूठ के आगे माथा टेकें
कायर कहलाते हैं...
जो जंजीरों को गहना समझें
गुलामी को धर्म कहें
कायर कहलाते हैं...
~ सुष्मित सिन्हा
#JantarMantar
E20 पर सबसे बड़ा सवाल एथेनॉल नहीं, जवाबदेही का है।
अगर पेट्रोलियम नीति तय करने और E20 को आगे बढ़ाने का चेहरा सड़क परिवहन मंत्री हैं, तो फिर पेट्रोलियम मंत्रालय की उपयोगिता क्या है? ईंधन नीति आखिर बना कौन रहा है, और जनता के प्रति जवाबदेही किस मंत्रालय की है—पेट्रोलियम या सड़क परिवहन?
क्या E20 का देशव्यापी ट्रायल पर्याप्त समय तक और अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में हुआ था? क्या सभी वाहन निर्माताओं की स्पष्ट सहमति और तकनीकी तैयारी सुनिश्चित की गई थी, या बाज़ार को प्रयोगशाला मान लिया गया?
यह केवल तकनीक का प्रश्न नहीं, करोड़ों वाहन मालिकों की जेब और भरोसे का प्रश्न है। इसलिए सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि E20 पर अंतिम नीति किस आधार पर बनी, प्रधानमंत्री की इस पर क्या सोच है, और इस पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही किसकी है।
@nitin_gadkari@HardeepSPuri@narendramodi #FuelPolicy #EthanolScam #EthanolBlending #E20 #NitinGadkari #Ethanol #E20Petrol #Mileage
नोएडा में एक @tata_cars का सर्विस सेंटर है, नाम है सागर मोटर्स. है तो ये गाड़ियों की सर्विस की जगह, लेकिन यहां आपके दिमाग, समय और पैसा हर चीज़ की सर्विस होती है। यहां के स्टाफ ग्राहकों को बेवकूफ बनाते हैं। काम के नाम पर जीरो है। ऊपर से चोर भी भरे हैं।
🚨 10 साल में किस Mutual Fund ने बनाया सबसे ज्यादा पैसा? | Flexi Cap vs Large Cap | SIP Returns
अगर आप अभी भी Large Cap Fund और Flexi Cap Fund के बीच कन्फ्यूज हैं, तो यह वीडियो आपके लिए है।
📊 10 साल के आंकड़े बताते हैं कि Flexi Cap Funds ने औसतन Large Cap Funds से बेहतर रिटर्न दिया। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि Flexi Cap Funds बाजार के हिसाब से Large Cap, Mid Cap और Small Cap में निवेश बदल सकते हैं, जबकि Large Cap Funds को ज्यादातर निवेश बड़ी कंपनियों में ही करना होता है। (Groww)
इस वीडियो में जानिए:
✅ Flexi Cap vs Large Cap कौन बेहतर?
✅ 5 साल और 10 साल का रिटर्न
✅ SIP में किसने ज्यादा कमाया?
✅ किस निवेशक के लिए कौन-सा फंड सही है?
✅ लॉन्ग टर्म में 1-2% अतिरिक्त रिटर्न कितना बड़ा फर्क ला सकता है?
💬 आपकी राय क्या है?
Flexi Cap या Large Cap- आप किसे चुनेंगे? कमेंट में जरूर बताइए।
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💰 जुलाई में Dividend की बारिश!
अगर आपके Portfolio में UPL, Sobha, New India Assurance, TCI, Singer India, Kesar Terminals समेत ये 11 कंपनियों के शेयर हैं, तो Record Date मिस मत करिए।
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✅ किस कंपनी का कितना Dividend?
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✅ Dividend पाने के लिए शेयर कब खरीदना होगा?
✅ Ex-Dividend Date और Record Date का आसान फर्क
⚠️ सिर्फ Record Date जानना काफी नहीं है। Dividend पाने के लिए आपको Ex-Dividend Date से पहले शेयर खरीदना होगा।
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आपके Portfolio में इनमें से कौन-सा शेयर है? कमेंट में बताइए। 👇
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📈 मार्केट बंद होने के बाद 6 कंपनियों से आई बड़ी खबर!
किसी कंपनी को ₹3,518 करोड़ का EPC ऑर्डर मिला, तो किसी ने 650 मिलियन डॉलर की इंटरनेशनल डील हासिल की। 🚀
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✅ Refex Industries को कितना ऑर्डर मिला?
✅ Ashoka Buildcon को किस देश में बड़ा प्रोजेक्ट मिला?
✅ Transrail Lighting के नए इंटरनेशनल ऑर्डर्स
✅ DCX Systems को मिले डिफेंस ऑर्डर्स
✅ Likhitha Infrastructure का अबू धाबी कॉन्ट्रैक्ट
✅ Vikran Engineering का ₹3,518 करोड़ का मेगा ऑर्डर
सोमवार को इन शेयरों पर बाजार की नजर रहेगी। 👀
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कश्मीर इस देश का अभिन्न अंग है, तो फिर वहां जाने के बाद हिंदुस्तान के नागरिकों को अलग सिम लेने की जरूरत क्यों पड़ती है?
सबसे बड़ी बात ये है कि वहां कोई अलग टेलीकॉम कंपनी नहीं चल रही. वही कंपनियां हैं, जिनकी सिम पूरे देश में इस्तेमाल होती है. फिर ऐसा क्या कारण है कि कश्मीर पहुंचते ही लोगों को नया सिम लेना पड़ता है?
अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर को लेकर कई बड़े बदलाव किए गए. सरकार ने कहा कि अब कश्मीर पूरी तरह देश की मुख्यधारा से जुड़ चुका है. अगर ऐसा है, तो फिर मोबाइल कनेक्टिविटी से जुड़ी ये परेशानी अब तक क्यों खत्म नहीं हुई?
क्या देश के किसी भी नागरिक को अपने ही देश के एक राज्य में जाने पर अलग मोबाइल नंबर और अलग सिम लेने के लिए मजबूर होना चाहिए?
जनता ये जानना चाहती है कि आखिर इस व्यवस्था को जारी रखने के पीछे वजह क्या है. क्या यह सिर्फ टेलीकॉम कंपनियों के फायदे के लिए हो रहा है?
कश्मीर अगर सच में देश का अभिन्न अंग है, तो वहां संचार व्यवस्था भी देश के बाकी हिस्सों जैसी ही होनी चाहिए. जनता इस मुद्दे पर साफ जवाब चाहती है.
#Kashmir @JM_Scindia@DoT_India@airtelindia@reliancejio
मैंने मई 2024 में Samsung कंपनी का एसी खरीदा था। खरीद के समय मुझे 5 वर्ष की एक्सेसरी वारंटी एवं 10 वर्ष की कंप्रेसर वारंटी की जानकारी दी गई थी। हाल ही में एसी में कूलिंग की समस्या आने पर मैंने IN Warranty के आधार पर कंपनी में शिकायत दर्ज कराई। प्रारंभिक जांच में इंजीनियर ने गैस
Very disappointed with @Delhivery service
AWB No: 2827784363973
Package picked up on 3rd April, reached Nagpur on 6th April, and since then it’s stuck with no actual delivery till today.
Tried contacting customer care but got no proper response.
@DelhiveryFAQ@delhivery
Absolutely unacceptable customer service from Motorola. This level of negligence from a brand of this scale is shocking. If this continues, customer trust in India will seriously decline. Fix this immediately.
@motorolaindia@Moto@Flipkart@flipkartsupport@jagograhakjago
Bought a 65-inch Motorola TV from Flipkart in Dec’25. Within a month, a black line appeared. Complaint raised on Jan 17.
After multiple delays, technician confirmed replacement, promised by Feb 26. Since then, I’m only getting “48 hours wait” replies with no resolution.
No technician response, no escalation, no accountability. This is harassment.
@Flipkart@Motorola@jagograhakjago @consumerhelpline
Please resolve immediately or I’ll be forced to take legal action.
#Flipkart #Motorola #ConsumerRights #Harassment
महुआ बीनने वाले लड़के
ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से
पटरियों पर दौड़ रही है…
खिड़की से बाहर झांकते हुए
मैं देख रहा हूं,
सब कुछ कितनी तेजी से
पीछे छूट जाता है…
जैसे अभी कुछ पल पहले
पीछे छूट गया एक पेड़,
जिसके नीचे बिछी हुई थी
दूधिया सफेद चादर…
वो कोई आम चादर नहीं थी…
वह था खज़ाना…
नब्बे के दशक के
किसी गांव के बच्चे के लिए
सबसे अनमोल खज़ाना…
एक महुआ का पेड़,
और उसके नीचे गिरे
असंख्य महुआ के फूल…
जो फूल आज
यूं ही पड़े हैं ज़मीन पर…
एक दौर था,
जब इन सफ़ेद मोतियों को बटोरने
नन्हे-नन्हे हाथ
नींद से लड़कर
भोर से पहले जाग जाते…
गांव के बुज़ुर्गों से भी पहले…
ओस से भीगी घास पर
नंगे पांव भागते लड़के,
और पेड़ों के नीचे झुकी हुई
उनकी छोटी-छोटी पीठें…
जैसे धरती से
कोई रहस्य
समेट रही होतीं…
इन सफेद मोतियों को
फिर धूप में तपाया जाता…
तपकर ये
सुनहरे नहीं,
भूरे होते…
और फिर भर दिए जाते
पुरानी बोरियों में,
एक इंतज़ार के साथ…
उस साइकिल वाले का इंतज़ार,
जो कभी-कभी दोपहर में आता
और उनकी मेहनत को
बदल देता
कुछ रंगीन कागज़ों में…
उन कागज़ों से
फिर होती कुछ दिनों की मौज,
और खरीदी जाती
गर्मियों की पूरी आज़ादी…
उन्हीं पैसों से आता
एक नया बैट,
एक लाल-सी गेंद,
और कभी-कभी
एक-दो पैकेट
टॉफ़ी-बिस्किट भी…
पर अब…
न महुआ के नीचे
वह भीड़ उतरती है,
न सुबह की नींद से लड़ते
वह छोटे-छोटे योद्धा.
- सुष्मित सिन्हा
https://t.co/XvJhGqtQRG
मुंबई से एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसे देखकर आप हैरान रह जाएंगे. एक फल विक्रेता अपने फलों को चूहों से बचाने के लिए उन पर 'Ratol' (चूहे मारने की दवा) लगाता पकड़ा गया. रैटोल में 3% पीला फास्फोरस होता है. यह एक ऐसा जहर है जो शरीर के अंगों को तुरंत नुकसान पहुँचाता है. अगर यह पेट में चला जाए, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है-खासकर बच्चों के लिए यह बेहद घातक है. जो पकड़ा गया वो तो सामने है, लेकिन न जाने कितने और लोग अपनी कमाई के चक्कर में आपकी सेहत के साथ ऐसा खिलवाड़ कर रहे होंगे. यह हमारे देश में 'सर्वाइवल' की एक कड़वी हकीकत बनती जा रही है.