जीएसटी घटा तो कंपनियों ने चुपके से बीमा महंगा किया।
सब जानते थे यही होगा, यही हुआ....
सरकार इन बीमा कंपनियां पर डंडा क्यों नहीं चलाती है।
@nsitharaman जी आपको इसका संज्ञान लेना चाहिए और हमें बताएं कि आपने इसमें क्या किया।
आदरणीय प्रधानमंत्री @narendramodi जी आपके जनकल्याणकारी फैसले को पलीता लगा दिया गया है।
बीमा कंपनियों को ऐसा सबक दीजिए कि यह घुटनों पर आ जाएं।
और अगर क्रिकेट में मेहनत और मौक़े का अनुपात कभी मापा जाए, तो अमरजीत कैपी का नाम सबसे ऊपर होगा। पंजाब और हरियाणा के मैदानों पर यह खिलाड़ी 80 के दशक में “रन” नहीं, इज़्ज़त कमाता था।
7,800 से ज़्यादा रन, औसत 52 से ऊपर, और हर बार वही कहानी! टीम मुश्किल में, कैपी क्रीज़ पर। उनकी बल्लेबाज़ी में न ग्लैमर था, न गुस्सा बस एक सादगी जो आज के दौर में अमूल्य लगती है। वो रन नहीं, जिम्मेदारी खेलते थे। भारत की टीम जब उन्हें भूल गई, उन्होंने खेल को नहीं भुलाया। उन्होंने सिखाया कि हर खिलाड़ी का सबसे बड़ा पुरस्कार “निरंतरता” है, चाहे दुनिया उसे गिनती में न ले।
अगर क्रिकेट कभी कविता के रूप में खेला गया, तो हैदराबाद के एम. वी. श्रीधर उसके कवि थे। उनकी बल्लेबाज़ी में शांति थी, स्ट्रोक्स में तर्क था, और चेहरे पर मुस्कान। 6,700 रन, औसत 49 और एक ऐसा करियर जो हर बार 90 के दशक के चयन शिविर तक पहुँचता, और फिर वहीं से लौट आता।
वो उन दुर्लभ खिलाड़ियों में से थे जो खेल के भीतर ‘संस्कृति’ ढूँढते थे। उनका जीवन बाद में भी खेल से जुड़ा रहा लेकिन प्रशासक, संयोजक, मार्गदर्शक के रूप में! श्रीधर की विरासत आंकड़ों में नहीं, उनके स्वभाव में थी। उन्होंने दिखाया कि सम्मान का सबसे ऊँचा रूप है जब आप बिना पहचान चाहे भी अमर हो जाएँ।
अगर सच्चाई यह है कि भारत के पास हमेशा स्पिनरों की भरमार रही, तो उसके विपरीत राणादेब बोस का नाम दर्द बनकर खड़ा है। बंगाल के इस तेज़ गेंदबाज़ ने 317 विकेट लिए थे। लाइन, लेंथ, और अनुशासन की परिभाषा लिख दी। 2007 के इंग्लैंड दौरे में चुने गए, पर एक भी मैच खेलने का मौक़ा नहीं मिला। वो लौट आए, बिना नाराज़ हुए, क्योंकि उन्हें पता था कुछ खिलाड़ियों का काम बस दूसरों के रास्ते को समतल करना होता है।उनकी गेंदबाज़ी में गुस्सा नहीं, गहराई थी।
राणादेब ने दिखाया कि कभी-कभी सबसे लंबी दौड़ वही लगाता है, जिसे स्टार्टिंग लाइन तक भी नहीं पहुँचने दिया गया।
अमोल मजूमदार क्लब
राजेंद्र गोयल शायद भारतीय क्रिकेट के इतिहास का सबसे बड़ा ‘अगर’ हैं। अगर उनका जन्म कुछ साल बाद हुआ होता, अगर बिशन सिंह बेदी और प्रसन्ना का दौर न होता, अगर सेलेक्टर्स ने एक बार भी झाँककर हरियाणा और नॉर्थ ज़ोन के रणजी मैदानों की मिट्टी देखी होती तो भारत के पास एक और बाएँ हाथ का जादूगर होता।
750 विकेट लेने वाला बाएँ हाथ का कलाकार, जिसने हर रणजी मैदान को अपनी उँगलियों की नोक पर नचाया, पर जब भारत की टीम बनती थी, तो सामने बैठा था बिशन सिंह बेदी। एक ऐसा नाम जो अपने ही युग के बाकी स्पिनरों के लिए दरवाज़ा बंद कर चुका था। गोयल ने शिकायत नहीं की, बयान नहीं दिए, बस विकेट लेते रहे, मानो वो चयनकर्ताओं से नहीं, खुद वक़्त से खेल रहे हों।
अगर कभी किसी कलाकार की रचना पर किसी और की प्रसिद्धि हावी हुई, तो वो कहानी पद्माकर शिवलकर की है। मुंबई का यह बाएँ हाथ का जादूगर रणजी क्रिकेट में कविता बनकर खेलता था। धीमी लय, सटीक टर्न, और बल्लेबाज़ की नब्ज़ पढ़ने की कला। 589 विकेट, और एक ऐसा औसत जो कई टेस्ट दिग्गजों को छोटा कर दे।
पर किस्मत ने उनके सामने वही दीवार रख दी।
प्रसन्ना, चंद्रशेखर, बिशन सिंह बेदी, जो उस वक्त “स्पिन” का प्रतीक थे के समय काल में शिवलकर को कभी रंगमंच नहीं मिला, पर वो हर अभ्यास नेट में एक क्लास रचते रहे। उनका नाम आज भी मुंबई की मिट्टी में घुला है। जैसे कोई गुमनाम राग, जो खत्म नहीं होता, बस सुनाई देना बंद हो गया है।
अगर “भरोसे” को कोई चेहरा दिया जाए, तो वो देवेंद्र बुंदेला होंगे। मध्य प्रदेश के लिए दो दशक तक वो सिर्फ बल्लेबाज़ नहीं, आत्मा थे। 10,000 से अधिक रन, सैकड़ों दिन क्रीज़ पर बिताए, पर भारतीय क्रिकेट में उनकी कहानी बस “घरेलू दिग्गज” कहकर सिमट गई। रणजी में सबसे ज्यादा मैच खेलने का रिकॉर्ड बनाने वाले बुंदेला ने शोर नहीं किया, कभी शिकायत नहीं की, बस हर सीज़न नए बच्चों को कंधा दिया और अगली पीढ़ी तैयार की।
वो मैदान पर ऐसे उतरते थे जैसे साधक मंदिर में जाता है, श्रद्धा से, निश्चलता से! उनके लिए खेल पूजा था, परिणाम नहीं और शायद इसलिए वो भारत की टीम में जगह नहीं पा सके क्योंकि वो उस दौर के खिलाड़ी थे, जहाँ विनम्रता को “गैर-आवश्यक गुण” माना जाता था।
अगर आज के युग में कोई अमोल मजूमदार का उत्तराधिकारी है, तो वो जलज सक्सेना है। 6,000 रन, 300 विकेट, 100 कैच! भारत का इकलौता खिलाड़ी जिसके आँकड़े इतने संतुलित हैं, फिर भी चयनकर्ताओं की फाइलों में हर बार “अगली बार” लिखा गया।वो मध्य प्रदेश और केरल दोनों के लिए खेले, हर बार प्रदर्शन किया, पर हर बार दरवाज़ा बंद मिला।
उनकी कहानी आज के खिलाड़ियों के लिए आईना है जहाँ योग्यता हमेशा पहचान नहीं बनाती। वो दिखाते हैं कि मौन में भी महानता छिपी होती है,और “ना बुलाए जाने” के बावजूद आप खेल को प्यार करना नहीं छोड़ते।
इन सबके ऊपर जो छाया है वो है अमोल मजूमदार का साया। क्योंकि उन्होंने इन सबके बीच उस प्रतीक को जन्म दिया जहां सफलता बिना पुरस्कार के भी पूरी हो सकती है। उन्होंने हमें सिखाया कि क्रिकेट सिर्फ़ कैप नहीं है, एक चरित्र है। उन्होंने इंतज़ार को तपस्या में बदल दिया।
यही तो है भारतीय क्रिकेट का सबसे शांत, सबसे गहरा दर्द -“अमोल मजूमदार क्लब”।
वो खिलाड़ी जिन्होंने सब किया, बस इंडिया के लिए नहीं किया। उनके पास रिकॉर्ड हैं, आँकड़े हैं, रणजी ट्रॉफी के टेप पर उनकी स्ट्रोक्स और स्पेल अब भी गूँजते हैं पर वो कॉल कभी नहीं आया।
इस क्लब की सदस्यता किसी को दी नहीं जाती वो खुद कमाई जाती है, सालों के धैर्य, निराशा और अबूझ प्रेम से। राजेंद्र गोयल, शिवलकर, बुंदेला, राणादेब, जलज ....
हर किसी की कहानी उस पुराने पैड लगाए लड़के की तरह है जो सचिन और कांबली के बाद बल्लेबाज़ी की बारी आने का इंतज़ार कर रहा था। कभी नहीं आई, पर उसने मैदान छोड़ना भी नहीं सीखा।
यही हैं “अमोल मजूमदार क्लब” के असली सदस्य वो जो इतिहास में नहीं, पर इंसानियत में हमेशा दर्ज रहेंगे।
भारत हर क्षेत्र में कीर्तिमान रच रहा है, महिला क्रिकेट वृंद को विश्व कप जीत की अनंत शुभकामनाएं, ऐसे ही समय में भारत की गरिमा में अपना योगदान, और तप जोड़ने वाले कुछ छुपे रत्न भी विश्व के समक्ष अपनी निष्ठा और कर्मठता का परिचय दे रहे, ऐसा एक बड़ा नाम है अमोल मुज़ूमदार @AmolMuzumdar1 भारतीय महिला क्रिकेट टीम के प्रशिक्षक, तथा सहयोगी समूह ( सपोर्ट स्टाफ) जिनके समर्पण से , तथा खिलाड़ियों टीम के अनोखे माता पिता के अनोखे दिल छूने वाले हृदयों को, पूरी टीम ने विश्व कप जीत कर भारत का मस्तक ऊँचा किया ॥
पूरी टीम को तथा अमोल जी को अनंत शुभकामनाएँ तथा अभिनन्दन॥ हर हर महादेव ॐ @ICC@BCCI@BCCIWomen
#Cricket #icc #win #IndianCricket #india
लंबे समय तक पंकज भइया चाहते रहे कि माताजी गाँव न रहकर उनके साथ मुम्बई रहें। भला किस चीज की कमी थी। तबियत ख़राब हो तो श्रेष्ठ डॉक्टर से लेकर सेवा भाव करने के लिए नौकर- चाकर और गाड़ी-बंगला तक क्या उपलब्ध नहीं था ?
लेकिन माताजी गंगा सरयू की उस माटी से बनी थी
जो सुबह उठते ही पहले आंगन बुहारती है। तुलसी जी को जल चढ़ाती है, ठाकुर जी को भोग लगाती है, गाय को रोटी खिलाती है, तब दुनिया का कोई और काम करती हैं।
जिसके लिए अपने घर-गाँव-आंगन की हवा डॉक्टर की दवा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अस्सी पार कर जाने के बाद...पिछले साल के आखिरी दिनों तक वो अपने दैनिक क्रिया कर्म करने से लेकर पूजा करने तक में समर्थ थी औऱ अपने बेटे को ये बताने में भी कि ए बबुआ, तहरा के आज टीवी में देखनी ह हो...बड़ा दुबरा गइल बड़s।
पंकज भैया इधर से हंसते..कि माई दुबराइल नइखी रे...तोरा लागता अईसन।
फिर मां-बेटे में इस बात पर बहस होती कि दुबले हुए हो या मोटे हुए हो ?
और बगल में बैठकर मुझे झट से अपने मां की याद आ जाती है... फिर समझ आता कि बेटा टीवी पर चमक रहा, इसकी ख़ुशी से ज्यादा मां को इस बात की चिंता है कि बेटा दुबला हो गया...!
ये चिंता सिर्फ़ माँ जैसा शब्द ही कर सकता है।
मुझे याद है...पिछले साल पिताजी के देहान्त के ठीक बाद माताजी की थोड़ी तबियत खराब हुई तो पंकज भैया उनको गांव से लेकर मुम्बई आ गए। इस उम्मीद में कि अब शायद माताजी कुछ दिन बेटे के साथ रहेंगी।
पहले फ्लैट था..अब तो बंगला है..सामने सुंदर गार्डेन है...शायद अब माई को अच्छा लगे।
लेकिन हफ्ता-दस दिन भी नहीं बिता कि माताजी ने कहा कि ए बबुआ अब गांवे ले चला. तहार घर-दुआर देख लेनी...एही से तबियत ठीक हो गइल.. अब हमरा बम्बई के डॉक्टर के जरूरत नईखे।
उनकी जिद के आगे पंकज भैया हार मान जाते थे।
हजारों बार देखा.. लाख व्यस्तताओं के बीच भी माताजी का हाल-चाल लेते हुए।
सामने डायलॉग याद करने के लिए रखा है लेकिन उसके साथ माताजी की बीपी पिछले तीन महीने में कब-कब कितनी है, वो पहले याद रहती थी। टहलते-घूमते गाँव के डॉक्टर से मां का हाल लेना उनके लिए सांस लेने जैसा था।
ये दृश्य देखकर हमारे जैसे लोगों को सीख मिलती कि आसमान छूना तो है लेकिन माँ-माटी और गाँव नहीं भूलना है।
अब पता नहीं...होली हो या दीपावली पंकज त्रिपाठी माई को सबसे पहले गोड़ कैसे लागेंगे.. गांव से लौटते समय अब गले लगाकर उनको कौन रोएगा..अब टीवी में देखकर किसको चिंता होगी कि ए पंकज दुबरा गइला कि मोटा गइला हो बबुआ?
क्योंकि दुनिया की कुछ सुंदर चिंताएं मां के साथ ही आती हैं और उसी के साथ विदा भी हो जाती हैं।
आज पंकज भैया की माताजी विदा हो गई।
पंकज त्रिपाठी एक्टिंग से बने तो हैं..लेकिन उसमें पंडित बनारस त्रिपाठी औऱ हेमवंती देवी के सादगी भरे संस्कारों का बहुत बड़ा योगदान है। ये वो बखूबी जानते हैं और उसे निभाते भी रहे हैं। वो निभाना बहुत कुछ सिखाकर गया है..मेरे जैसे तमाम करीबी लोगों को।
आज माताजी को श्रद्धांजलि के साथ पंकज भैया और मृदुला भाभी के लिए प्रार्थना... ईश्वर इस दुःखद घड़ी में परिवार को संबल प्रदान करें... 🙏)
अतुल
वर्षों तक इस देश में क्रिकेट का मतलब सचिन, धोनी और विराट हुआ करता था। आज वक्त ने करवट बदली है। जिधर देखिये उधर महिला क्रिकेटर्स के आंसुओं से स्टोरी औऱ स्टेटस भरा है। सुदूर गाँव की लड़कियों ने दीप्ति, स्मृति, हरमन प्रीत, और जेमिमा के विजयी आंसूओ में अपने सपने बुनने शुरू कर दिए हैं। भारत क्रिकेट प्रेमी देश तो बहुत पहले से था लेकिन आज जाकर क्रिकेट का सच्चा प्रेमी देश बना है। ❤️ 🇮🇳
#ICCWomensWorldCup2025
आज हमारी समस्या यह नहीं है कि हम नायकों को पहचान नहीं पा रहे। समस्या यह है कि हम सिर्फ़ वही नायक पहचानते हैं जिन्हें किसी एजेंसी ने पैक कर के परोसा है। देश की चेतना कभी इश्तहारों से नहीं चली थी बल्कि उन चेहरों से चलती थी जो भीड़ में घुल जाते थे, पर उनके कर्म इतिहास में गूँजते थे।
हमारे समय का पतन यह नहीं है कि हमने आदर्श खो दिए, बल्कि यह है कि हमने सच देखने के लिए स्क्रीन और स्पॉन्सर का इंतज़ार शुरू कर दिया। खेल, सेवा, त्याग, यह सब अब “कॉन्टेंट कैटेगरी” बन चुका है। और जहाँ बलिदान श्रेणी बन जाए, वहाँ मनुष्य से पहले एल्गोरिदम जीतता है।
हर दूसरा रेलयात्री आज परेशान है — Tatkal बुकिंग फेल, वेटिंग टिकट कन्फर्म नहीं और फिर भी IRCTC 60₹ सुविधा शुल्क काटकर टिकट बेच ही रही है, जबकि सीट है ही नहीं।
रेल मंत्रालय और IRCTC क्या सोए हुए हैं? जब उपलब्धता नहीं, तो बेचना बंद करो —> ये खुलेआम जनता से लूट है।
अब के कुछ जरूरी और तख्तियों जैसे कदम जो तुरंत होने चाहिए :>
1. No Ticket → No Payment लागू करो —> भुगतान पर तभी काटो जब टिकट कन्फर्म हो।
2. हर ट्रेन पर वेटिंग लिस्ट की कठोर सीमा तय करो (जैसे 100), उसके बाद “No Tickets” दिखाओ।
3. सर्वर-एरर/फेल पेमेंट पर त्वरित ऑटो-रिफंड + क्षतिपूर्ति पॉलिसी लागू हो।
4. पीक-घंटों में एजेंट/बोट्स की कड़ाई से निगरानी, काउंटर ऑडिट और CCTV रेकॉर्ड सार्वजनिक करो।
5. एक पारदर्शी पब्लिक डैशबोर्ड दिखाओ —> कितने टिकट एजेंट्स/काउंटरों ने लिए, रिफंड रेट, सर्वर अपटाइम।
6. शिकायत निवारण 24×7, पब्लिक रिपोर्टिंग और त्वरित कार्रवाई के सख्त नियम बनाओ।
यात्री जनता कर के पैसे से चलने वाली सेवा की उम्मीद करती है —> व्यापार नहीं। IRCTC और रेल मंत्रालय जवाब दो : >जनता की सुविधा नहीं , दलाली बंद करो। 🚆✊
पाँचवीं कक्षा
मौखिक परीक्षा।
सब याद करके गई थी,उत्साहित थी।मुझसे पहले जो भी गए,उनसे पूछे प्रश्न के उत्तर भी जानती थी।बारी आई,आचार्य जी ने एक प्रश्न पूछा और भेज दिया।
मुझे स्वयं को विशेष सिद्ध करने का अवसर जाता दिख रहा था।उस आयु में प्रशंसा का नशा सा होता है।मैंने कहा,"आप पूछिए..
यह सब बहुत चुपचाप होता है। न कोई शोर, न विदाई के फूल।
बस एक सुबह आप देखते हैं कि घर में किसी की आवाज़ कम हो गई है। हर सुबह अख़बार अब वैसा नहीं फरफराता, घर के मंदिर की घंटी वैसे नहीं बजती और आँगन की वो कुर्सी, जो सूरज की तरफ़ मुड़ी रहती थी वो अब खाली हो चुकी है।
यही नया भारत है।
अगले दस–पंद्रह सालों में एक पूरी पीढ़ी धीरे-धीरे विदा हो जाएगी।
वो लोग, जिन्होंने हमारी सुबहें बनाई, हमारे संस्कार सँवारे, और हमें सिखाया कि जीना और अच्छा लगना यह दो अलग बातें हैं। कोई गलत और सही नहीं होता, बस अलग होता है।
वे जो रात को जल्दी सोते थे और भोर होते ही उठते, तुलसी को पानी देते, मंदिर जाते, राह में हर किसी से मुस्कराकर मिलते थे।जिनके लिए हर भोजन ईश्वर को याद किए बिना पूरा नहीं होता था।
त्योहार उनके लिए सजावट नहीं बल्कि संबंधों की सजावट थे।दीये जलते थे, पर उजाला रिश्तों में होता था। रंग उड़ते नहीं दिल में बस जाते थे। मेहमान आते थे, तो घर में जगह नहीं, दिल में जगह बनाई जाती थी।
वे न “रूटीन” के पीछे भागे, न “वेलनेस” के और उनका अनुशासन ही उनकी साधना था। उनकी सादगी ही उनका वैभव थी। अगर आपने उनके साथ कुछ साल गुज़ारे हैं, तो आपको वो जीवन याद होगा।
घर के आँगन में अचार की खुशबू, सिलबट्टे की खट–खट आवाज़,
डायरी में नीली स्याही से लिखे नंबर, और हर एकादशी–अमावस्या का ज़िक्र, जिसमें समय भी भक्ति बन जाता था।
पुरानी चप्पलें, मोटे शीशों वाला चश्मा, और चेहरे पर वो सुकून जो किसी ऐप से डाउनलोड नहीं होता। वो लोग कम बोलते थे, पर हर शब्द में स्थिरता थी। वो दिखाते नहीं थे, बस करते थे।
अब धीरे-धीरे, एक-एक कर के, वे जा रहे हैं और उनके साथ ही जा रहा है एक जीवन-दर्शन!
जहाँ जीवन में संतोष था, दिखावा नहीं, विश्वास था, पर कट्टरता नहीं और प्यार था, पर सौदा नहीं। जब वे नहीं रहेंगे, तो केवल लोग नहीं जाएँगे। उनके साथ एक लय चली जाएगी, जिसमें भारत साँस लेता था।
अगर आपके घर में आज भी कोई ऐसा है तो उनके पास बैठिए।
बात कीजिए। सुनिए उनको!
क्योंकि वे सिर्फ़ यादें नहीं हैं, वे संस्कार हैं। वे हमारी कहानी के आख़िरी जीवित अध्याय हैं। हमारे पूर्वज हमारे अतीत नहीं हैं।
वे हमारा नक्शा हैं। वे बताते हैं हम कहाँ से आए हैं ताकि हम रास्ता न भूलें।
उनसे सीखिए।
उनकी सादगी में गहराई है और उनकी चुप्पी में उत्तर हैं।
उनकी आँखों में वो शांति है, जो आज के समय में दुर्लभ हो चुकी है।
इससे पहले कि यह युग पूरी तरह चला जाए, थोड़ा रुकिए और बस थोड़ा सा झुकिए।
और याद रखिए बस एक बात!
"सादगी भी एक विलासिता थी, जिसे हमने आधुनिकता की भीड़ में खो दिया।"
हमारे पास पिरामिड से भी पुराने मंदिर और एथेंस से भी प्राचीन शहर हैं। लेकिन आप किसी भी पर्यटक से पूछ लीजिए,
"दोबारा आओगे?"
नहीं!!!!!
मैं अपनी टीम को इंडोनेशिया से आगरा ताजमहल और वृंदावन दिखाने लाया था। ताजमहल तक पहुंचने से पहले ही सबके मास्क निकाल चुके थे। मेरी ओर मजाक भरी निगाहों से देख रहे थे।
माना कि इंडोनेशिया, वियतनाम, थाईलैंड जैसे देश ग़रीब माने जाते हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर भी कमजोर माना जाता है और राजनीति भी अस्थिर है। लेकिन उनका पर्यटन चमकता है।
क्यों?
क्योंकि उन्होंने बुनियाद को पकड़ा हुआ है। इन देशों में स्थानीय लोगों का व्यवहार शानदार है। पर्यटक का शोषण नहीं स्वागत होता है। नागरिक समझदार हैं। नियमों, ट्रैफिक और भीड़ पर नियंत्रण रहता हैं। साफ़-सफ़ाई के लिए कानून नहीं बनाने पड़ते हैं।
यह मात्र GDP का खेल नहीं है। यह मानसिकता का खेल है। पर्यटन वहीं खिलता है जहाँ स्थानीय लोग अपने शहर को इज़्ज़त देते हैं।
भारत के मंदिर, किले, नदियाँ, खाना, संगीत, त्यौहार, सब पेरिस और बाली से कहीं आगे निकल सकते हैं। लेकिन जब तक अनुशासन और गर्व नहीं आएगा, हम अरबों डॉलर और करोड़ों नौकरियाँ गंवाते रहेंगे।
याद रहे!!!
दुनिया सिर्फ आपकी इमारतें देखने नहीं आती, दुनिया आपके बर्ताव को भी देखती है।
परमाणु, परमाणु, परमाणु। रट तो ऐसे रहे हैं जैसे इन्हीं के ऊपर आकर गिरता सबसे पहले।
अगर गिरता भी तो क्या होता? मर ही जाते न? मर तो अब भी रहे ही हैं। कोई धर्म पूछ कर मार दे रहा, कोई सीमा पर गोली खा के मर रहा। हम यहां शर्म से मर रहे।
जापान पर परमाणु गिरा था 1945 में, आज वो हमसे वो हमसे बहुत आगे है। और हमारे पास भी परमाणु ही हैं। खत्म हो जाते तो खत्म कर भी देते।
अपनी कायरता छुपाने के बहाने न ढूंढिए। देश का सर आज शर्म से झुक गया है। कोई माने न माने लेकिन यह भारत की हार है। यह उन फौजियों का अपमान है जो सीमा पर खड़े रहते हैं। दिल्ली के AC कमरों में बैठने वाले उनको युद्धविराम का आदेश देते हैं जो वहां बर्फ में पत्थर जैसी रोटियां खा रहे हैं। धिक्कार है।
सोनमर्ग में इस स्लेज गाड़ी (जिसे कि हम बचपन में रढ़-घुसट) कहते थे) के ही ५०० रुपए लिए जाते हैं और दूरी मात्र ४००-५०० मीटर की। सत्य में एक हेल्पर आकर चिपक जाता है कि हम आपको गिरने नहीं देंगे। पर्यटक ख़ुशी ख़ुशी इन्हें ये पैसे दे भी देता है क्योंकि उनका बात करने का तरीका बेहद लुभावना होता है।
उत्तराखंड में यदि किसी पॉइंट पर इतनी सी सैर का १०० रुपया माँग लिया जाए तो शायद ही कोई तैयार हो। मार्केटिंग ही सबसे बड़ा कारण है टूरिज्म ग्लैमर का।
कश्मीर में पैसा बहाने से बढ़िया है कि आप उत्तराखंड में पहाड़ी भाई-बंधुओं की पर्यटन अर्थव्यवस्था में मदद करें। स्वरोजगार से यहाँ पलायन की समस्या का भी समाधान हो सकेगा और देवभूमि के खाली हो रहे गांवों में अब्दुल और नेपाली आकर नहीं बसेंगे।
बैशाख के महीने बुरांस के जूस का आनंद देवदार के घने वन के बीच। होम स्टे में मेरी आर्थिक मदद करनी हो तो मुझे DM कर सकते हैं, सनातनी साथियों को सुबह का नाश्ता मुफ्त मिलेगा। 😁
परसो हमले में 28 लोगों को मार दिया गया। आज पाकिस्तानी आर्मी ने BSF के एक जवान को अगवा कर लिया। और भारतीय मीडिया पूछ रहा है कि सीमा हैदर वापस जाएंगी या नहीं।
डूब मरो सालों तुम सब, तुम दाग हो इस देश पर।
ये IT सेल वाले बार बार राहुल गांधी, रॉबर्ट वाड्रा या खड़गे के बयान पर क्यों आ जा रहे हैं। भोसडीके सरकार तुम्हारी है या उनकी। हमने उन्हें वोट नहीं दिया था जिसे दिया था उसका बताओ वो क्या कर रहा है?
फैसले सरकार को लेने होते हैं और अगर तुम हमें ये बताना चाहते हो कि उनकी सोच कैसी है तो ये हमे पहले से पता है इसीलिए उन्हें वोट नहीं दिया था।
हम जानना चाहते हैं कि सरकार क्या कर रही है। कड़ी निंदा ही करेगी या इससे आगे भी कुछ?
सेकुलर कीड़ों ने मरने वालो की लिस्ट में अपना जीजा ढूंढ लिया है। वो उस एक आदमी की मौत पर बता रहे हैं कि देखो धर्म देखकर नहीं मारा। बाकी 28 मौतें इनके लिए झूठ हैं।
जिनके पति मरे हैं वो सब झूठ बोल रही हैं। जिनके परिवार के लोग मरे हैं वो सब झूठ बोल रही है। इन कीड़ों को कीटनाशक की जरूरत है।
जिन्हें भी लगता है कि आतंकियों ने धर्म देखकर नहीं मारा वो एक बार अपने मा बाप के साथ घाटी में चला जाए और एक रात ऐसी जगह रुके जहां आर्मी की सुरक्षा न हो। बड़गाम, अनंतनाग, बारामूला, पुलवामा, अवंतीपोरा, सोपोर या किसी भी जगह चला जाए और बस एक रात किसी ऐसी जगह जहां आर्मी की सुरक्षा न हो वहां तंबू लगा के रुके और भारत का झंडा लगा कर देख ले।
पता चल जाएगा कि किसने मारा और क्यों मारा।
जम्मू कश्मीर पुलिस का कोई भी पुलिस कर्मी सबसे व्यस्त टूरिस्ट सीजन में कश्मीर के सबसे व्यस्त टूरिस्ट स्पॉट पर उसी दो घंटे क्यों नहीं था, जब ये घटना हुई!
और आतंकी अपना काम कर आराम से निकल भी गए।
जम्मू कश्मीर पुलिस को जवाब देना पड़ेगा।