Total mismanagement at Girnar Hill Top.. जणू काही जैन धर्मीय भाविक अतिरेकी असावे अशी तपासणी सुरू होती... प्रचंड वेळ लागत होता. हे सगळ मुद्दाम सुरू असावे जेणे करून श्रद्धाळू दर्शन न घेताच वैतागून मागे जातील..... बाकी मला शक्य वाटत नव्हते इतके पायऱ्या मी चढू शकेन.. जवळपास ६५०० पायऱ्या चढल्या आणि तेवढ्याच उतरल्या... तुफान पाऊस , जोरदार हवा आणि प्रचंड गारवा..तरीही जवळपास पन्नास हजार भाविक आज दर्शनासाठी आलेय. पर्वत चढतांना आणि उतरतांना खूप खूप ओळखीचे अनोळखी लोक भेटलीत.. देशभरातील जैन धर्माचे इतके अनुयायी मला ओळखतात हे बघून खूप उत्साह वाटला.. एक ऊर्जा मिळाली
#Girnar #नेमिनाथ #Neminath #गिरनार
भगवान नेमिनाथ मोक्षस्थल श्री ऊर्जयंत गिरनार जी सिद्घ क्षेत्र पर मोक्षकल्याणक के अवसर पर दिल्ली से 25 जून को आरम्भ होकर 19 जुलाई को गिरनार जी पहुंची श्री नेमि गिरनार धर्म यात्रा
20 जुलाई 2026
#जैन लोग अपने मंदिरों की व्यवस्था उत्तम तरीके से कर रहे हैं । उनको कोई Mixed Structure की जरूरत नहीं है ।
कृपया अपने विचार #हिंदू मंदिर तक ही सीमित रखे ।
हाल ही में गिरनार की 4थी टोंक पे मौजूद जैन प्रतिमा को औघड़ की प्रतिमा बोल के रंग पोत दिया गया पुलिस और @ASIGoI कुछ नहीं कर रही हे पूरे गिरनार पे ऐसी कई जैन प्रतिमाएं बनी हुई हे जिनको ये लोग कनवर्ट करना चाहते हे ताकि जैन इतिहास पूरी तरह मिटा सके गिरनार से
कितना भी कोशिश कर लो गिरनार से जैन इतिहास नहीं मिटा पाओगे
#ProtectGirnarfromEncroachment
Respected @Vishnu_Jain1 ji
The Jain community has not forgotten your assurance regarding the Girnar issue. We respectfully ask: Has the time not yet come to act?
Girnar's heritage cannot wait indefinitely. Thousands of devotees continue to look towards you with hope. We request you to honour your commitment and help bring this matter forward and spread communal harmony.
History remembers those who act when heritage calls.
#ProtectGirnarfromEncroachment
Hello @Uppolice, is it acceptable for your officers to brutally assault a poor woman like this?
@bandapolice, would your officer ever dare treat someone powerful or wealthy the same way? Or is this "justice" reserved only for the poor?
आप महाराष्ट्र के इतिहास को कितना जानते हो ?
लोहगढ़ किले पर जैन शिलालेख को इतिहासकार लगभग 2300 वर्ष पुराना मानते हैं। @ASIGoI
शिलालेख किसी परंपरा की शुरुआत नहीं होते;
वे उस परंपरा के पहले से जीवित, विकसित और प्रभावशाली होने का प्रमाण होते हैं।
सोचिए — यदि आज से 2300 वर्ष पहले महाराष्ट्र की शिला पर जैन वंदना अंकित हो रही थी, तो जैन समाज, जैन साधु-संघ, जैन श्रावक परंपरा और जैन संस्कृति इस भूमि पर उससे भी बहुत पहले से जीवित, सक्रिय और प्रतिष्ठित रही होगी।
पुणे के लोहगढ़ में प्राप्त जैन शिलालेख इसका एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण इस शिलालेख की शुरुआत होती है —
“नमो अरहंताणं”
अर्थात — अरिहंतों को नमस्कार।
कुछ पत्रकारों द्वारा जैनों को महाराष्ट्र में “बाहरी” समझना, मराठी जैनों के अस्तित्व पर आश्चर्य करना, या जैनों को इस मिट्टी से अलग बताने की कोशिश करना — यह केवल एक समुदाय के प्रति अन्याय नहीं है; यह महाराष्ट्र के अपने इतिहास के प्रति अज्ञान है।
यह उस प्रदेश की स्मृति से कट जाना है, जिसकी चट्टानों पर “नमो अरहंताणं” अंकित है;
जिसकी भाषा के विकास में जैनों की भूमिका रही है;
और जिसके गाँवों, कस्बों, व्यापार, संस्कृति और समाज में जैन पीढ़ियों से रचे-बसे हैं।
महाराष्ट्र की धरती पर जैन परंपरा ने केवल उपस्थिति ही नहीं दर्ज कराई, बल्कि अहिंसा, अपरिग्रह, संयम, तप, करुणा, शिक्षा, व्यापार-नैतिकता और सांस्कृतिक शुचिता की धारा भी प्रवाहित की।
यह वही परंपरा है जिसने बाहरी विजय से पहले आत्मविजय का मार्ग सिखाया;
संग्रह से पहले संयम का मूल्य रखा;
और हिंसा से पहले अहिंसा को धर्म का प्राण बनाया।
जो लोग अपनी ही भाषा के इतिहास से अपरिचित हों, वे यदि उसी भाषा की रक्षा के नाम पर दूसरों की “मूलता” पर प्रश्न उठाने लगें, तो वह ज्ञान नहीं, केवल शोर रह जाता है।
सच्चाई यह है कि जैन इस मिट्टी पर आज के नहीं हैं।
वे किसी हालिया प्रवास या आधुनिक सामाजिक संयोग के कारण महाराष्ट्र में उपस्थित नहीं हुए।
जैन परंपरा इस प्रदेश की प्राचीन आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और भाषिक धारा का एक पुराना, गहरा और प्रमाणित हिस्सा है।
उन्हें यह भी शायद न पता हो कि महाराष्ट्र और दक्खिन के भाषिक-सांस्कृतिक इतिहास में जैन आचार्यों, कवियों, श्रावकों और दानपरंपरा की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
राजनीतिक इतिहास ✨
लोहागढ़ किला (Lohagad Fort) अपने सामरिक महत्व, छत्रपति शिवाजी महाराज के मराठा साम्राज्य और प्राचीन जैन इतिहास का एक अद्भुत संगम है। यह महाराष्ट्र में लोनावला के पास स्थित एक ऐतिहासिक और अजेय किला है। लोहागढ़, छत्रपति शिवाजी महाराज और जैन इतिहास का संबंध इस प्रकार है:छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास:महान छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1648 में इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण किले को अपने अधीन कर लिया था।
1665 में पुरंदर की संधि (Treaty of Purandar) के तहत उन्हें इसे मुगलों को सौंपना पड़ा था।इसके बाद 1670 में शिवाजी महाराज ने इस किले को मुगलों से वापस जीत लिया और अपनी सूरत की जीत से प्राप्त धन-दौलत (राजकोष) को सुरक्षित रखने के लिए इसका उपयोग किया।
प्राचीन जैन इतिहास:
लोहागढ़ के इतिहास में प्राचीन जैन धर्म की गहरी जड़ें जुड़ी हुई हैं। किले के दक्षिणी भाग में लोहगढ़वाड़ी (Lohagadwadi) में चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं मौजूद हैं।
पुरातत्व खोज: सितंबर 2019 में पुणे के ट्रेकर्स द्वारा इन गुफाओं में एक प्राचीन शिलालेख खोजा गया।शिलालेख का महत्व: यह शिलालेख जैन ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में लिखा गया है। यह लगभग दूसरी या पहली शताब्दी ईसा पूर्व (लगभग 2000 साल पुराना) का है।यह शिलालेख 'नमो अरिहंताणं' (Namah Arihantanam) से शुरू होता है, जो जैन धर्म में अत्यंत पवित्र और सामान्य रूप से उपयोग किया जाने वाला मंगलाचरण है। इससे यह प्रमाणित होता है कि यह गुफा कभी एक जैन शैलकृत अभयारण्य हुआ करती थी।
यह किला मराठा सैन्य वास्तुकला (Maratha Military Landscapes) का उत्कृष्ट उदाहरण है और इसके लंबे और संकरे 'विंचू काटा' (बिच्छू की पूंछ) आकार के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।
Jain Heritage 🫶🏻 Lohagad Fort , Lonavala Maharashtra
गुजरात में "श्री नेमी गिरनार धर्म यात्रा" के आज 14 जुलाई 2026 को वापी में प्रवेश पर आयोजित सभा में सकल जैन समाज से गिरनार जी वंदना का निवेदन
19 और 20 जुलाई को गिरनार वंदना के लिए भड़काऊ व भ्रामक संदेश या वीडियो प्रचारित न करने का निवेदन
@CMOGuj@dgpgujarat@collectorjunag@GujaratPolice@SP_Junagadh
#Jain #Jainism