ओबीसी एससी साथियों कटऑफ देखिए! इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एजुकेशन डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर भर्ती की लिस्ट निकली है।
SC का कट ऑफ 237.5
OBC का कट ऑफ 270.5
General का कट ऑफ 141.5
OBC और SC से केवल 4-4 लोग चुने गए हैं। बाकी सीटों पर पारिवारिक माहौल है। @JaikyYadav16
नीतीश कुमार से बड़का कायर तानाशाह कोई है ?
लोकतंत्र बचाने का झंडा लेकर गठबंधन बनाया जा रहा है और एक मामूली यूट्यूबर पर रासुका लगाया और अब एक बयान दे दिया तो पुलिस वाले सस्पेंड कर दिए ?
कुछ सुनने का शक्ति नहीं है काहे का लोकतन्त्र?
अहंकार तो रावण का टूट गया था तो नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की क्या औकात है? इनका अहंकार मनीष कश्यप तोड़ेगा जब वह बिहार का मुख्यमंत्री बनेगा
कल जब भाई मनीष कश्यप का वीडियो देखा तो इतना यकीन हो गया है कि यह झुकने वालों में से नहीं है, सोना तपकर कुंदन बनता है और यही प्रयोग अभी मनीष कश्यप के साथ हो रहा है, जब यह जेल से बाहर आएगा तो पूरा बिहार का राजनीति बदल कर रख देगा
नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और सुशील मोदी की तिकड़ी ने बिहार को बर्बाद करके रख दिया और उस बिहार को बर्बादी से बाहर यदि कोई निकाल सकता है तो उसका नाम मनीष कश्यप है!
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बार-बार कहता हूं, हर राष्ट्रवादी हिंदू को एक दूसरे राष्ट्रवादी हिंदू का मदद करना चाहिए और जिस दिन हम संगठित हो गए, उस दिन हर तरफ सिर्फ भगवा ध्वज दिखेगा
ताहिर हुसैन के मित्र दानिश के लिए चार शब्दों का प्रयोग हुआ: ऐ भड़वे, क*वे, ऐ उग्रवादी, ऐ आतंकवादी।
व्याकरण की दृष्टि से एक भी गाली नहीं है। चार में से तीन तो संबोधन हैं क्योंकि ‘ऐ’ का प्रयोग किया गया है, और चौथा बोलचाल की भाषा में सर्वनाम या विशेषण के तौर पर प्रयोग होता है। वैसे, चारों ही विशेषण भी कहे जा सकते हैं क्योंकि चारों से किसी व्यक्ति की विशेषता का भान होता है।
सामाजिक दृष्टिकोण से भी देखें तो ‘भड़वा’ तो एक धंधा है जिसे मेनस्ट्रीम करने के लिए कई NGO वाले आज भी प्रयासरत हैं। ‘कटु*’ शब्द का प्रयोग एक विशेष मजहब के लोग अपने ही मजहब की निचली जातियों के लिए बोल-चाल में करते है। ओवैसी ने स्वयं टीवी पर इसका प्रयोग किया है।
आतंकवादी और उग्रवादी भी आपराधिक गतिविधि में संलिप्तता के द्योतक हैं। गाली तो बिलकुल नहीं हैं।
ऐसे में स्वतः इन शब्दों को किसी मजहब विशेष से जोड़ देना धूर्तता है और सामाजिक वैमनस्य बढ़ाने की चेष्टा है। बिधूड़ी जी ने कहीं नहीं कहा कि दानिश अली चूँकि फलाँ मजहब का है इसलिए वो भड़वा, क**, उग्रवादी या आतंकवादी है। उन्होंने उसके आचरण को देखते हुए, प्रधानमंत्री को बार-बार ‘नीच’ कहने पर इन चारों शब्दों का प्रयोग किया।
वामपंथियों को तो प्रसन्न होने चाहिए कि उनकी भड़वागीरी के धंधे को संसद भवन में इतना कवरेज मिला। तुम लोग काहे दुखी हो भाई! पूरा करियर दलाली और बेटियारी में बीता है, आज भड़वा शब्द पर आपत्ति हो गई! हद है!
जब से ये भाजपा में गए है,,पता नही क्यों इन्हे तबसे विराट कोहली से नफरत हो गई है,,,
किसी से नफरत आदमी एक ही शर्त पर करता की सामने वाला उससे ज्यादा टैलेंटेड है,,,
विराट ने 13000 रन अकेले नही बनाये हैं.. साथ वाले बल्लेबाज ने भी दौड़ लगाई है और विपक्षी टीम के गेंदबाजों ने गेंद डाली हैं, तब बने हैं। #GautamGambhir#ViratKohli
– गौतम गंभीर
रमेश बिधूड़ी पढ़े लिखे और स्वच्छ छवि के नेता है।
जहां तक मैं जानता हूं यह दिल के बहुत साफ है, मन में कुछ भी नहीं रखते, कांग्रेसियों की तरह तो बिल्कुल भी उनके मन में छल और प्रपंच नहीं होता हैं, जो भी होता है दिल में वह बोल देते हैं और आज भी जो उनके मन में या दिल में था इन्होंने बिंदास सबके सामने बोला और डंके की चोट पर बोला!
अब आपको बुरा लग गया तो इसमें रमेश बिधूड़ी जी का कोई गलती नहीं है, इसमें आपका गलती है कि आपको बुरा लगा, वैसे भी जो बात आपके दिल को बुरा लगता है, उसे तो सुनना ही नहीं चाहिए, बेहतर है इग्नोर कर दीजिए
बाकी अभी-अभी अज्ञात सूत्रों से मालूम चला है कि रमेश बिधूड़ी जी खाना-पीना खाकर सो गए हैं तो आप लोग भी अब छाती पीटना बंद कीजिए, चूड़ी जो पूरे दिन में फोड़े हो उसका कचरा इकट्ठा करके डस्टबिन में डालिए और अगर इच्छा हो तो खाना खाकर सो जाइए अन्यथा आप भूखे पेट भी सो सकते हैं यह आपकी मर्जी है!
#रमेश_बिधूड़ी_जिंदाबाद
2019 में आई रेलवे की भर्ती 2024 तक पूरी नहीं हो पाई और इन 6 सालों में लाखो पद रेलवे में खाली हो गए जिसको भरा ही नही गया सिर्फ संविदा पर काम चलाया जा रहा जिससे आए दिन दुर्घटना होती है है,,,
#रेलवे_भर्ती_दो#राष्ट्रीय_बेरोजगार_दिवस
#इंडियागठबंधन के सामने जो पत्रकार और न्यूज़ एंकर डटकर खड़े रहे, जिन्होंने #चरणचुंबक बनने से इनकार कर दिया अब उनका बहिष्कार होगा।
लगभग आधे भारत में इस गठबंधन की सरकारें हैं।
जब लालच,पुरस्कार और FIR भी काम नहीं आये तो अब बहिष्कार।
भारत के मीडिया को अब पूरी ताक़त और एकता के साथ इसका जवाब देना चाहिए।ये बहुत ख़तरनाक स्थिति है।
इसे बैन करना नहीं, इसे डरना कहते हैं
इसे पत्रकारों का बहिष्कार नहीं सवालों से भागना कहते हैं
आपको आदत है हाँ में हाँ मिलाने वालों की
वो न कल किया था न आगे करूँगी
बैन लगाने की हिम्मत उन नेताओं पर लगाइए जो मुहब्बत की दुकान में कूट कूट कर भरी नफ़रत परोस रहे हैं…
सवाल बेलौस थे, हैं और आगे भी रहेंगे। जय हिंद