उठ खड़े हो इस देश के नौजवान
तुम्हें नौकरी नहीं मिलेगी!
NEET Exam के 22 लाख बच्चों का भविष्य दांव पर है और प्रधानमंत्री चुप हो, तो सरकार जवाब देने नहीं, बचने में लगी है।
बहुत शर्मनाक बात है कि जिस सेना का काम दुश्मनों से देश की रक्षा करना है, आज उसे मोदी सरकार के अपने भ्रष्टाचार से बच्चों के पेपर बचाने भेजा जा रहा है।
एक पेपर लीक मतलब एक साल बर्बाद - अनेकों का भविष्य बर्बाद। उसके बाद की सरकारी लीपा-पोती सिर्फ धोखा है।
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@ANI@PTI_News@ians_india
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल आबादी वाले राज्य में भीषण गर्मी के इस मौसम में बिजली की कम अपूर्ति व कटौती आदि की आम शिकायतों व उसको लेकर विशेषकर ग़रीब, मध्यम वर्ग, किसान, छोटे व्यापारियों व अन्य करोड़ों मेहनतकश लोगों का जीवन अति-कष्टदायी बना हुआ है तथा इसको लेकर लोग विभिन्न रूपों में अपना आक्रोश भी प्रकट कर रहे हैं, जिसकी चर्चा मीडिया में भी काफी व निरन्तर रहती है।
अतः सरकार से अपील है कि वह बिजली आपूर्ति सम्बंधी लोगों के कष्ट व परेशानियों को ध्यान में रखते हुये ज़रूरी उपाय तत्काल सुनिश्चित करे। इसके साथ ही, नये पावर प्लाण्ट आदि के माध्यम से भी आगे के लिये बिजली आपूर्ति की स्थिति को सुधारने का प्रयास करे तो यह व्यापक जनहित में उचित होगा।
ओडिशा के कालाहांडी जिले के तलागुड़ा गांव में एक दलित युवक को मृत गाय की खाल उतारने के दौरान बेरहमी से पीटा गया। FIR दर्ज होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी का हाल भेड़ और चरवाहा जैसा है। संविधान बचाने, आरक्षण, शिक्षा आदि से आंदोलन शुरू होता है। इससे जाति पीछे लग जाए तो पार्टी बना लो और फिर बड़ी पार्टियों से सौदेबाजी करो। उप्र और बिहार में दर्जनों ऐसी जातियां हैं, जिनकी पार्टी बन गई हैं। पहले सवर्णों को खूब खरी-खोटी सुनाते हैं और उससे जाति गोलबंद हो जाती है। शुरू में अकेले चुनाव लड़ते हैं और वोट काटते हैं, उससे बाज़ार में भाव लगने लगता है। बीजेपी इनके पास पहुंचती है और चुनावी समझौता करती है। कुछ सीटें, पैसा और प्रचार तंत्र देकर जितवा देती है। पहले नेता MLA, MP और मंत्री बन जाते हैं। जैसी सौदेबाजी और जाति की संख्या हो, उसके अनुसार कुछ और सीटों पर बीजेपी लड़वा देती है और साधन और कैंडिडेट भी प्रदान करती है। जब जाति के नेता सत्ता का मजा चख लेते हैं, तब अगले चुनाव में पत्नी, बेटे, बहू, दामाद, समधी के लिए जाति की ताक़त का इस्तेमाल करते हैं। कल बिहार मंत्रिमंडल के विस्तार में ऐसा दिख गया।
हज़ारों वर्ष से जाति का कीड़ा दिमाग़ में पीढ़ी दर पीढ़ी घुसा चला आया है। भागीदारी आंदोलन से बीजेपी को खूब लाभ मिला रहा है । जाति को ख़ुद के नेता में बुराई नहीं दिखती और दूर से देखकर ख़ुश है कि उसकी जाति का आदमी मंत्री, MP, MLA, मेयर या जनप्रतिनिधि बना हुआ है। जब जाति की पार्टी नहीं थीं, तो बीजेपी या किसी बड़े दल को सौदेबाजी करना मुश्किल था और पूरी जाति, अर्थात लाखों-करोड़ों लोगों, से संवाद करना पड़ता था। सैकड़ों-हज़ारों को कुछ देना-लेना पड़ता था और अब तो एक को साधने से पूरी जाति सध जा रही है। भेड़ों को बस करने के बजाय चरवाहे को पकड़ने का सौदा टिकाऊ, अल्प संसाधन और कम प्रयास वाला है। इससे सत्ता और वोट मिल जाएं, तो इससे अच्छा क्या हो सकता है?
मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, नीमराना आदि औद्योगिक केंद्रों में मजदूर अचानक क्यों आंदोलित हो गए हैं? क्या पेट की भूख इंसान से कुछ भी करा सकती है? पहले मजदूर अपने अधिकारों और मूलभूत सुविधाओं के लिए धरना, प्रदर्शन और हड़ताल करते थे लेकिन अब वे मात्र जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
लेबर कोड ने मजदूरों के अधिकारों को और कमजोर कर दिया है। मजदूरों को ठेके पर रखा जा रहा है और यूनियनें भी कमजोर हो गई हैं।
बिना किसी नेतृत्व के मजदूर जगह-जगह आंदोलित हो रहे हैं क्योंकि यह उनके जीवनयापन का सवाल बन गया है। मीडिया खबरें तो दिखाता है, लेकिन लेबर कोड की कमियों, सांप्रदायिकता के प्रभाव, पूंजीपतियों की बढ़ती ताकत और लेबर कोर्ट के कथित मजदूर-विरोधी रवैये पर पर्दा डाल देती है ।
भाजपा के डबल इंजन शासित उत्तर प्रदेश में आरक्षण व्यवस्था को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया जा रहा है।
उ०प्र० पिछड़ा वर्ग राज्य आयोग, लखनऊ द्वारा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित की गई आर०ओ०/ए०आर०ओ०-2023 भर्ती के प्री. परीक्षा परिणाम में ओ०बी०सी० आरक्षण में अनियमितता और ओ०बी०सी० सीटों को सामान्य वर्ग में समायोजित किए जाने के मामले में सुनवाई तय होना स्पष्ट संकेत है कि यह कोई साधारण त्रुटि नहीं, बल्कि एक सुनियोजित हस्तक्षेप है।
यह घटना किसी एक भर्ती तक सीमित नहीं, बल्कि प्रदेश की अनेक चयन प्रक्रियाओं में वंचित वर्गों के संवैधानिक अधिकारों के लगातार क्षरण की गंभीर प्रवृत्ति को उजागर करती है।
भीम आर्मी-आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) छात्रों के साथ हो रही हकमारी के खिलाफ उनके साथ मजबूती से खड़ी है और उन्हें उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।
असम सीएम हिमंत बिस्वा शर्मा ने श्री मल्लिकार्जुन खरगे जी को “पागल” कहा ।चुनाव में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल बेहद खेदजनक है। जो बात कम लोग जानते हैं वो है कि पूर्व में सीएम शर्मा ने कहा था “शूद्रों का कर्तव्य है सवर्णों की सेवा करना”। इसका व्यापक विरोध हुवा और मैंने भी कड़े शब्दों में निंदा की थी। शर्मा एक्स से पोस्ट डिलीट कर भाग गए थे और वही मानसिकता फिर प्रकट हो गई ।
RSS और BJP की मानसिकता में दलित और पिछड़े नीच, अछूत और पागल हैं और शर्मा ने उसे जाहिर कर दिया । पूरे देश के दलितों को बीजेपी का बहिष्कार करना चाहिए ।
राजस्थान प्रगतिशील खटीक समाज समिति मानसरोवर, जयपुर द्वारा आयोजित नव निर्वाचित कार्यकारिणी के शपथ ग्रहण समारोह (5 अप्रैल 2026) में डोमा परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ उदित राज जी संबोधित करते हुए।
#डोमापरिसंघ#UditRaj
जयपुर, जाते हुए अलवर में राजस्थान केकेसी के चेयरमैन श्री सूरजमल कर्दम के नेतृत्व में केकेसी के साथियों ने गर्मजोशी से स्वागत किया।
आप सभी साथियों का यह स्नेह, सम्मान और उत्साह आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। हार्दिक आभार 🙏
आइए झुक कर सलाम करें उनको, जिनके हिस्से में यह मुकाम आता है।
बहुत खुशनसीब होते हैं वह योद्धा, जिनका लहू मिशन के काम आता है।
2 अप्रैल बहुजनों के ऐतिहासिक आंदोलन में बलिदान हुए हमारे वीर शहीदों को नमन, आप सब हमारे दिलों में हमेशा जिंदा है और रहेंगे।
#2अप्रैल_बलिदान_दिवस
2 अप्रैल 2018 को दलित संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया था। मैं, बीजेपी का सांसद होते हुए, न केवल इसका समर्थन किया बल्कि इसका नेतृत्व भी किया। उसी समय रामविलास पासवान जी और मायावती जी ने भारत बंद का विरोध किया। ये सारे प्रमाण इंटरनेट पर मिल जाएंगे।
2 अप्रैल 2018 को दलित संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया था। मैं, बीजेपी का सांसद होते हुए, न केवल इसका समर्थन किया बल्कि इसका नेतृत्व भी किया। उसी समय रामविलास पासवान जी और मायावती जी ने भारत बंद का विरोध किया। ये सारे प्रमाण इंटरनेट पर मिल जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की अनुमति आवश्यक हो गई थी। दूसरा मुद्दा एससी/एसटी शिक्षक भर्ती में रोस्टर की गड़बड़ी का था।
बीजेपी के संगठन महासचिव का फोन आया कि आप पार्टी में होते हुए भारत बंद का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने इस पर कड़ी नाराज़गी जाहिर की। मेरी तरफ से भी जवाब उतना ही स्पष्ट था। माहौल गर्म हो गया और उन्होंने फोन काट दिया। अगले दिन उनका फिर फोन आया और वे मुझे समझाने लगे कि ऐसा नहीं करना चाहिए। तब मुझे समझ में आ गया कि बात काफी आगे तक पहुंच चुकी है।
मेरे मन में आया कि मैं इस्तीफा दे दूं लेकिन उससे कोई लाभ नहीं होता। मैंने सोचा कि संसद के मंच का उपयोग किया जाए और जितना संभव हो सके अपनी आवाज उठाई जाए। अब तो इंटरनेट का जमाना है और कोई भी जाकर देख और सुन सकता है कि मैंने सत्ता से जितने सवाल किए, शायद ही किसी ने किए हों।
जरूरी नहीं कि इतिहास सबके साथ न्याय करे। अभी तक तो मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ है, और आगे क्या होगा, यह कहना मुश्किल है।
UGC कानून के समर्थन में आगे आए बहुजन समाज!
डोमा परिसंघ ने जंतर-मंतर से अपने आंदोलन की शुरुआत कर दी है और जब तक ये नियम लागू नहीं हो जाते, तब तक इसे पूरे देश में चलाया जाएगा। गलतफहमियों को दूर करने के लिए इन नियमों का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत किया जा रहा है।
यूजीसी नियम, 2026 को इस सरकार की अचानक या स्वतंत्र नीति पहल के रूप में नहीं समझा जा सकता। इसकी जड़ें यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा) नियम, 2012 में हैं, जिन्होंने विश्वविद्यालयों में भेदभाव की समस्या को स्वीकार किया था, लेकिन उनका क्रियान्वयन लगभग शून्य रहा और प्रवर्तन तंत्र भी सीमित था।
2026 के यूजीसी नियम 2019 में शुरू हुई उस निरंतर न्यायिक लड़ाई का परिणाम हैं, जिसे दो माताओं—राधिका वेमुला और अबेदा तडवी—ने शुरू किया था, जिन्होंने अपने बच्चों को उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव के कारण खो दिया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और 2012 के विनियमों के प्रभावी क्रियान्वयन तथा भेदभाव से निपटने के लिए एक मजबूत संस्थागत ढांचे की मांग की। यह याचिका अधिवक्ता दिशा वाडेकर द्वारा तैयार और दायर की गई, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह विश्वविद्यालयों में 2012 के नियमों के क्रियान्वयन से संबंधित व्यापक आंकड़े प्रस्तुत करे। प्रस्तुत सामग्री में गंभीर कमियां और व्यापक अनुपालन की कमी सामने आई। इसके जवाब में यूजीसी ने न्यायालय के समक्ष कहा कि वह विनियामक ढांचे की समीक्षा और सुदृढ़ीकरण के लिए एक समिति गठित करेगा।
इसके बाद संशोधित नियमों का मसौदा तैयार कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया। याचिकाकर्ताओं, विशेष रूप से माताओं ने मसौदे में कई कमियां बताईं और महत्वपूर्ण संशोधन सुझाए। इनमें परिसर के भीतर भेदभावपूर्ण अलगाव को रोकने के उपाय, अधिक प्रतिनिधित्व वाली इक्विटी कमेटियों का गठन, मजबूत निगरानी तंत्र की स्थापना तथा संस्थानों द्वारा अनुपालन न करने पर स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान शामिल थे।
15 सितंबर 2025 के अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने इन सुझावों को रिकॉर्ड पर लिया और यूजीसी को संशोधित नियमों को शीघ्र अधिसूचित करने का निर्देश दिया। इस प्रकार यूजीसी नियम, 2026 अंततः न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में अधिसूचित किए गए, जो केवल कार्यपालिका की पहल नहीं, बल्कि संवैधानिक न्यायिक प्रक्रिया और विश्वविद्यालयों में जवाबदेही की निरंतर मांग का परिणाम हैं।
लगातार यूपीएससी के साक्षात्कार में दलित, आदिवासी और ओबीसी के प्रतियोगियों के साथ अन्याय हो रहा है । दस वर्ष के विश्लेषण से यह साबित हो चुका कि इन्हें नंबर कम दिए जाते हैं । डॉ. उदित राज जी ने माँग किया है कि पर्सनालिटी टेस्ट के तरीक़े में बदलाव करने की जरूरत । वे ख़ुद IRS रहे हैं अगर उनको यूपीएससी साक्षात्कार में सामान्य वर्ग जैसा नंबर दिया गया होता तो उनकी रैंक और ऊपर हो सकती थी। कार्मिक मंत्रालय ने संसद पटल पर ग़लत जवाब दिया है कि साक्षात्कार बोर्ड को कैंडिडेट की पृष्टिभूमि नहीं पता होती।
#UditRaj #UGC
इतिहास से कुछ भी छुपाने और मिटाने की कीमत सदियों तक चुकानी पड़ती है और अब यही हो रहा ।
फ़्रांसीसी दार्शनिक मोंटेस्क्यू ने अरस्तू के ग़ुलामी (slavery) संबंधी विचारों को स्वीकार नहीं किया। अरस्तू ने अपनी पुस्तक Politics में कहा था कि कुछ लोग “प्राकृतिक रूप से गुलाम” होते हैं अर्थात वे स्वयं निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते।
मोंटेस्क्यू ने अपनी प्रसिद्ध कृति The Spirit of the Laws में इस विचार का विरोध किया और ग़ुलामी को अन्यायपूर्ण तथा अमानवीय बताया। उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी इंसान जन्म से गुलाम नहीं होता।
यदि फ्रांस ने अरस्तू के विचारों को सुरक्षित न रखा होता, तो संभव है कि मोंटेस्क्यू ग़ुलामी के विरुद्ध लिख और बोल न पाते तथा फ्रांसीसी क्रांति के प्रेरक न बनते।
बीजेपी और आरएसएस असहज इतिहास को मिटाकर गलती कर रहे हैं। इतिहास की सही और गलत दोनों बातें आगे बढ़ने के लिए आवश्यक हैं। मुग़लों का इतिहास हटाना, पुरुषवादी सोच, दलितों और पिछड़ों के शोषण को न पढ़ाना तथा जाति व्यवस्था के प्रतिकूल प्रभावों से बचना समाज के लिए घातक हो सकता है।
पीएम मोदी ने नोएडा एयरपोर्ट का कल उद्घाटन किया। उन्होंने समाजवादी पार्टी की कड़ी आलोचना की, लेकिन बीएसपी पर नरमी दिखाई। जब मायावती जी कांग्रेस और एसपी पर लगातार हमला करती रहती हैं और सीएम योगी को धन्यवाद देती हैं तो मोदी जी को भी अपना फ़र्ज़ निभाना था। अंधभक्तों को जब तक यह बात समझ आएगी तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
आज कांग्रेस मुख्यालय, नई दिल्ली में असंगठित कामगार एवं कर्मचारी कांग्रेस (केकेसी) के राष्ट्रीय चेयरमैन माननीय डॉ. उदित राज जी ने तमिल नाडु सहित विभिन्न प्रदेशों से आए समर्पित पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं से आत्मीय मुलाकात की। इस अवसर पर उन्होंने ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए और आंदोलन को और अधिक सक्रिय व जन-जन तक पहुँचाने पर जोर दिया।
#AICC #Congress #RahulGandhi
अमेरिका इस समय ईरान के खिलाफ युद्ध की स्थिति में है, और इसके विरोध में करीब 90 लाख अमेरिकी नागरिक सड़कों पर उतर आए हैं। वहाँ की मीडिया और डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र-विरोधी नहीं कहा।
यदि भारत में ऐसी स्थिति होती, तो सभी को देशद्रोही घोषित कर दिया जाता।
आज मेरे आवास पर हरियाणा से नव निर्वाचित राज्यसभा सांसद श्री कर्मवीर सिंह बौद्ध जी ने मुलाक़ात किया।
1997 में जब पाँच आरक्षण विरोधी आदेश जारी हुए थे, तो कर्मवीर सिंह बौद्ध जी हरियाणा से हजारों कर्मचारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ आरक्षण बचाओ रैली में शामिल होते रहे। इन्होंने न केवल मेरा साथ देकर आरक्षण बचाया बल्कि बौद्ध धम्म की दीक्षा भी ली।
हरियाणा प्रदेश में अभी भी क्लास 1 और 2 में पदोन्नति में आरक्षण नहीं है और निश्चय ही यह मुद्दा कर्मवीर सिंह बौद्ध जी संसद में भी उठाएंगे।
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