भारतीय रेलवे की कड़वी हकीकत 👇
भारत में अगर एक शहर से दूसरे शहर जाना हो, तो सबसे पहली लड़ाई होती है कन्फर्म टिकट की। बिना 10–15 दिन पहले प्लान किए , सफर लगभग नामुमकिन है।
तत्काल टिकट तो मज़ाक बन चुका है - ब���किंग खुलते ही सेकंडों में सोल्ड आउट।
अब अगर किसी को इमरजेंसी में जाना पड़े तो क्या करे? मजबूरी में लोग जनरल कोच में चढ़ते हैं , जहाँ 100 लोगों की जगह 400–500 लोग ठूंसे जाते हैं। बैठना तो दूर , सांस लेने की जगह तक नहीं होती।
गर्मी, धक्का-मुक्की , बच्चों और बुज़ुर्गों की हालत सब कुछ भगवान भरोसे।
सवाल सीधा है 👇
क्या ये हालात सरकारों और रेल मंत्रियों को दिखाई नहीं देते?
क्या आम आदमी का सफर इतना भी सम्मा��� के लायक नहीं है?
कब तक लोग जानवरों की तरह डिब्बों में ठूंसे जाते रहेंगे?
कब बढ़ेंगी जनरल और स्लीपर कोच की संख्या?
कब सिर्फ VIP नहीं , आम यात्री भी सिस्टम की प्राथमिकता बनेगा?
ये सुविधा नहीं , बुनियादी जरूरत है।
और इस हालात से मुक्ति अब सवाल नहीं , मजबूरी बन चुकी है।
उत्तर प्रदेश में 'मिशन शक्ति' और 'पिंक बूथ' के ढोल चाहे जितने पीटे जाएं, लेकिन गाजियाबाद के टीला मोड़ थाने से जो तस्वीर सामने आई है, उसने सरकार के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं।
यहाँ एक बेबस महिला अपने साथ हुए रेप की शिकायत दर्ज कराने चौकी पहुँची थी, लेकिन उसे जो मिला वो किसी भी सभ्य समाज के लिए डूब मरने की बात है।
चौकी इंचार्ज जिन्हें जनता की हिफाजत के लिए तैनात किया गया था, वह एक पीड़ित महिला को सरेआम सड़क छाप गुंडों की तरह गालियां देते और उसे जेल भेजने की धमकी देते नजर आए।
वीडियो में साफ देखा जा सकता है वो चिल्लाकर कह रहे हैं कि जहाँ जाना है जाओ, मैं मदद नहीं करूँगा।
योगी जी, क्या यही आपका 'रामराज्य' है जहाँ रेप पीड़ित महिला को थाने में जिल्लत और गालियां मिलती हैं?
क्या आपकी पुलिस सिर्फ रसूखदारों की चाकरी करने के लिए है? लखनऊ की सड़कों पर महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगवाने से हकीकत नहीं बदलती।
सल���ार-सूट कोई “ड्रेस कोड से बाहर” की चीज़ नहीं, वो इस देश की रोज़मर्रा की गरिमा है। जब किसी भारतीय रेस्टोरेंट में भारतीय पहनावे पर रोक लगाई जाती है, तो असल में कपड़ों को नहीं पहचान को रोका जाता है।समस्या वेस्टर्न बनाम ट्रेडिशनल की नहीं है।समस्या उस मानसिकता की है जो जींस-टॉप = क्लास और सलवार-सूट = पिछड़ापन” जैसा झूठा समीकरण बना चुकी है।क्लास कपड़ों में नहीं होती, क्लास व्यवहार, सोच और सम्मान में होती है। अगर कपड़ों से ही स्तर तय होने लगे, तो फिर संस्कृति सिर्फ़ त्योहारों और स्टेज शो तक सिमट कर रह जाएगी।सबसे दुखद बात यह है कि यह सब किसी विदेशी देश में नहीं, अपने ही देश में हो रहा है जहाँ परंप��ा को गर्व नहीं,अक्सर बाधा समझ लिया जाता है।संस्कृति बदली नहीं जाती,
और न ही बदली जानी चाहिए।उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सम्मान के साथ जिया जाता है।अगर आज हम सलवार-सूट पर चुप रहे, तो कल सवाल साड़ी, कुर्ता, पगड़ी पर भी आएगा। और तब शायद हम यह सोचते रह जाएँगे कि हम आधुनिक कब हुए और अपनी जड़ों से कब कट गए।
🚨 सलवार-सूट पहनने पर एंट्री नहीं....🇮🇳
"एक पति-पत्नी....रेस्टोरेंट पहुंचे,
लेकिन रिसेप्शनिस्ट ने साफ कह दिया...
👉वेस्टर्न कपड़े पहनिए,तभी अंदर एंट्री मिलेगी..
🤔 क्या अपनी संस्कृति अब शर्म की चीज़ हो गई
है,या फिर यह आज भी मानसिकता की गुलामी है..
��सवाल सिर्फ कपड़ों का नहीं है…
यह सवाल सम्मान का है,पहचान का है..
भारतीय रेस्टोरेंट में भारतीय पहनावे का अपमान..
क्यों,क्या जींस-टॉप ही अब ‘क्लास’ की पहचान बन गई
है...
🇮🇳 संस्कृति बदली नहीं जाती,उसे जिया जाता है.....
@cpsinghjunior माननीय मुख्यमंत्री जी 🙏🏻
जूनियर एडेड शिक्षक भर्ती पूरी करिए 🙏🏻
विस्तृत विज्ञप्ति जारी कर भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाइए, हमारी भर्ती पूरी करिए 🙏🏻🙏🏻
@cpsinghjunior जूनियर एडेड शिक्षक भर्ती 2021 में शासन द्वारा भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का आदेश शासनादेश के बाद भी विभाग के अधिकारियों के द्वारा भर्ती प्रक्रिया नहीं शुरू की जा रही है हम सभी छात्र ना चाहते हुए भी आंदोलन करने को विवश है और छात्र मानसिक प्रताड़ना झेल रहे हैं
जूनियर एडेड शिक्षक भर्ती 2021 में श���सन द्वारा भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का आदेश (शासनादेश) के बाद भी विभाग के अधिकारियों के द्वारा भर्ती प्रक्रिया नहीं शुरू की जा रही है हम सभी छात्र ने चाहते हुए भी आन्दोलन करने को विवश हैं।
#cmup
#myyogiadityanath
#aparumkhysachivdepakkumar
जूनियर एडेड शिक्षक भर्ती 2021 में शासन द्वारा भर्ती प्रक्रिया शुरू करने का आदेश (शास���ादेश) के बाद भी विभाग के अधिकारियों के द्वारा भर्ती प्रक्रिया नहीं शुरू की जा रही है हम सभी छात्र ने चाहते हुए भी आन्दोलन करने को विवश हैं।
#cmup
#myyogiadityanath
#aparumkhysachivdepakkumar