We work on full agri value chain and build agri business via impact investment to be re-paid from business profit to transfer 100% economic rights to farmers.
तस्वीर नॉर्वे की है।
बात मिडिल ईस्ट की, पर कहानी शुरू होती है अमेरिका से। और इस बार बात मोदी पर खत्म नही करूँगा।
आप पर करूँगा।
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बहरहाल, 20 वी सदी के अंत तक दुनिया में तेल की जरूरत खाने के अलावे रोशनी के लिए होती थी। वो ज्यादातर आसपास के पेड़ो, फसलों से मिल जाता था।
धीमे जलने वाले गाढ़े तेल के लिए व्हेल का शिकार होता। पर अब इससे काम नही चलना था। तेल की जरूरत, ऑटोमोबाइल के आविष्कार के बाद एकदम से एक्सप्लोड हो गयी।
औऱ तेल मिलता था- धरती के भीतर ड्रिल करके। अमरीका में इसका व्यापार रॉकफेलर ने किया। अरबपति हो गए।
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विश्वयुद्धों का दौर आते आते, तेल सबसे बड़ी कमोडिटी हो गया। पर्ल हार्बर पर हमला, जापान की तेल आपूर्ति पर बढ़ रहे खतरे को मिटाने को हुआ।
तो हिटलर ने काकेशस के बंजर इलाके जीतने में इतना जोर लगाया, ताकि ऑयलफील्ड हाथ आ जायें।असफल रहा।
अंत मे उसकी तोपगाड़ियाँ घोड़े खींच रहे थे। कोल्बे की कोयले से तेल बनाने की विधि जो हम केमिस्ट्री में पढ़ते है, इसी मजबूरी से उपजा।
लब्बोलुआब यह कि तेल ही ताकत था।
और भरपूर तेल मिला- मिडिल ईस्ट में
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ईरान, इराक, कुवैत, जॉर्डन, कतर, ओमान, UAE,सऊदी अरब etc। रेत के ढूह और कबीलो में बंटे इस पिछड़े इलाके के सरदारों को वैश्विक शक्तियों ने साधा।
तेल की खोज,पश्चिमी देश करते। निकालने का ठेका उनकी कम्पनियां लेती, मार्किट मे बेचती। शाह/ सुल्तान/अमीर/तानाशाह को हर बैरल पर रॉयल्टी मिल जाती।
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दशक भर में तानाशाहों की दौलत ठाठें मारने लगी। ब्रूनेई जैसे बित्ता भर देश के सुल्तान की दौलत दुनिया के सबसे बड़े धनिकों से ऊपर है।
आगे चलकर सऊदी जैसे देशों ने अरामको जैसी कंपनियां बनाई। जिसमे उनकी खुद की हिस्सेदारी होती, और फॉरेन पावर्स की भी।
दुबई, जेद्दा, जैसे चमचम शहर बने। लेकिन नागरिक??
तेल की दौलत में उसका कोई हिस्सा न था।
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नॉर्वे के नार्थ सी में तेल की खोज 1960 के दशक में हुई। यह प्रजातन्त्र था। औऱ सरकार का नजरिया अलग।
तेल पर हक, सरकार का नही, जनता का था। जनता में भी सिर्फ मौजूदा पीढ़ी नही, आने वाली नस्लों का भी। एक दिन खत्म हो जाने वाले इस खजाने का लाभ उन्हें भी मिले, जिन्हें अभी पैदा होना है।
तो तेल की सारी कमाई से एक सॉवरिन फंड बनाया गया। जनता केयर फंड कह लीजिए। पूरा पैसा इसमे जमा होता।
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फिर यह फंड, दुनिया भर के मार्किट, बॉन्ड, शेयर में इन्वेस्ट करता। इन्वेस्टमेंट से दौलत और बढ़ती। फिर हर साल, तेल की कमाई तो जुड़ती ही जाती है।
नार्वे में तय किया कि यह दौलत खर्च नही होगी।निवेश से हुए मुनाफे का एक हिस्सा सरकार, शिक्षा और स्वास्थ्य में खर्च करेगी। यह अमूमन रिटर्न का 3-4% होता है।
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इतने से ही नॉर्वे में शिक्षा मुफ्त है, स्वास्थ्य मुफ्त है। ये दोनों ही वर्ल्ड क्लास है, बेस्ट है। टैक्स कम है। सब लोग वैसे ही काम करते है..
और तमाम चीजो का उत्पादन करते है, जैसे की तेल से कोई मुफ्त की अकूत कमाई हो ही नही रही। याने नार्वे की इकॉनमी तेल आधारित नहीं। वह अरब देशो की तरह वन कमोडिटी नेशन नही।
तेल खत्म भी हो गया, तो इकॉनमी चलेगी। उस दौर की दौलत भी बची रहेगी। बढ़ती रहेगी।
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यह आज कई ट्रिलियन का फंड है। दुनिया में सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट फंड, दुनिया के हर बड़े मार्किट में तगड़ा इन्वेस्टमेंट है।
यह बड़ी ताकत है। जेब मे धन हो, तो आप किसी पर भी आंखे तरेर सकते हैं। नार्वे सॉवरिन फंड किसी कम्पनी से पैसा निकाल ले, तो वह कम्पनी डूब जाए। शेयर ख़रीद ले, तो वह सोने के भाव बिकने लगे।
तो दुनिया सबसे बड़े प्रजातन्त्र के राजा को भी, नार्वे जाकर मत्था टेकना पड़ता है। गिड़गिड़ाने के लिए ..
कि नार्वे सरकार ने उसकी बेनामी कम्पनी में इन्वेस्ट करने के लिए, सॉवरिन फंड पर जो रोक लगाई गई है, वह हट जाये।
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प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण किसी भी देश के सामने दो तरह के मॉडल है। एक अरब देशों का मॉडल, और दूसरा नार्वे का मॉडल..
पहला मॉडल नेताओ, उनके बगलगीर धनपतियों और उनकी मौजूदा पीढ़ी को अकूत फायदा देता है। वे धन उलीचकर, प्रॉपर्टीज, कोठियों, महलो, रोल्स रॉयस, मर्सिडीज में भरने के बाद, अंततः स्विस बैंक और केमैन आइलैंड के जरिये विदेशी अर्थव्यवस्था में छुपा देते हैं।
दूसरा मॉडल- धन देश की निगाह मे रहता है। जनता के काम आता है। वह जनता जो अभी सामने है, और वह भी-
जो अभी पैदा नही हुई।
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भारत मे तेल नही है।
लेकिन नेक्स्ट बिग थिंग है।
रेयर अर्थ मेटल्स हैं। निजी कम्पनियो को ठेके पर माइन्स दी जा रही हैं। भले ही उन्हें इसका कोई अनुभव हो न हो विदेशी कम्पनियो के साथ वेंचर होंगे। वे खोदेंगी, बेचेंगी।
अफसरों को रिश्वत, सरकार को रॉयल्टी मिल जाएगी। यह मॉडल अरब देशों का है, या नॉर्वे का?
आप सोचिए।
भारतीय खाद्य निगम के साइलो के ठेके अडानी एग्रो लॉजिस्टिक्स लिमिटेड और लीप इंडिया फ़ूड एंड लॉजिस्टिक्स लिमिटेड प्राइवेट लिमिटेड को देने की राह सुगम बनाने के लिए ‘एकाधिकार विरोधी’ धारा हटाए जाने की केंद्रीय कमेटी तीव्र निंदा करती है.
मूलतः भारतीय खाद्य निगम ने एकाधिकार विरोधी धारा का प्रस्ताव इसलिए किया था ताकि कोई एक कंपनी इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण परियोजना पर वर्चस्व न स्थापित कर ले. खबर है कि नीति आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग ने इस धारा को हटाने के लिए 2022 में जोर डाला. नतीजतन बोली में इस कार्यक्रम के कुल मूल्य 20000 करोड़ रूपए में से 16500 करोड़ रूपए के ठेके, इन दो कंपनियों को मिल गए. आज परियोजना के कुल 60 लाख मीट्रिक टन भंडारण क्षमता में से 46.5 लाख मीट्रिक टन पर इन दोनों कंपनियों का नियंत्रण हो गया है, जो कि कुल योजित क्षमता का 77.5 प्रतिशत है. भारतीय खाद्य निगम की स्थापना 1 जनवरी 1965 को खाद्य अनाज की खरीद, भंडारण, परिवहन व वितरण के लिए संसद द्वारा पारित खाद्य निगम अधिनियम,1964 के तहत हुई थी तथा इसका उद्देश्य किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाना और देश की खाद्य सुरक्षा व कीमत स्थिरता की सुरक्षा करना था. भारतीय खाद्य निगम के अनाज भंडारण ढांचे का पिछले दरवाजे से निजीकरण व एकाधिपत्यीकरण भारत की खाद्य सुरक्षा व संप्रभुता पर सीधा हमला है और यह खाद्य निगम अधिनियम 1964 के उद्देश्यों व अब तक हासिल उपलब्धियों को नष्ट करने वाला है.
केंद्रीय कमेटी, भाकपा (माले) लिबरेशन
उत्तराखंड लोक सेवा आयोग अनाथ हो चला है। जिसके कंधों पर युवाओं को रोजगार देने की ज़िम्मेदारी है, उसे अपने रेगुलर चेयरमैन का इंतज़ार करते हुए जून में तीन साल हो जाएँगे। डॉ राकेश कुमार (Rt. IAS) ने 7 जून 2023 को अपने पद से इस्तीफा दिया था, उसके बाद सदस्य गोदियाल को चार्ज दिया गया, वो भी विगत 17 मई को रिटायर हो गए, चेयरमैन नहीं होने से बोर्ड बैठक, PCS परीक्षा परिणाम, नई भर्तियों की तारीखें और वो तमाम काम लटक गए है जो केवल अध्यक्ष ही कर सकता है।
सूत्र बताते है कि सरकार जिस महिला सदस्य को चेयरमैन बनाना चाहती है उस पर राजभवन के किंतु परंतु में परेशानी बढ़ा दी है, वैसे भी सरकार को डेढ़ दो महीने पहले आयोग के अंदर घटे एक घटनाक्रम का संज्ञान भी लेना चाहिए, जो मीडिया की सुर्खियां बनने से रह गया था।
प्रदेश में युवाओं को क्या रोजगार मिलेगा, आयोग ख़ुद ही बेरोजगार है।
@BJP4India@INCIndia
डंडा चलता है तो डर लगता है
लखनऊ की मेयर के साथ भी यही हुआ। हाई कोर्ट का ऐसा डंडा चला कि आज रविवार के दिन नगर निगम का दफ्तर खुलवा कर सपा पार्षद ललित किशोर तिवारी को शपथ दिलानी पड़ी।
हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद निर्वाचित पार्षद तिवारी को मेयर सुषमा खर्कवाल ने शपथ नहीं दिलाई थीं.. जिद पर अड़ी थीं.. कोर्ट ने उनके वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार सीज़ कर दिए तब मेयर साहिबा का भरम टूटा..
संडे की छुट्टी के दिन सबको बुलाया गया और 5 महीने बाद ललित किशोर तिवारी शपथ दिला दी गई..
#HighCourt #NagarNigam #LMC #Lucknow #Mayor #Corporator #Sunday
युवा निराश हैं, NEET रद्द हो गया है, पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं, गैस की किल्लत है, महंगाई बढ़ रही है और मोदी जी, मेलोनी जी के साथ 'Melody' खा रहे हैं।
— राहुल गांधी
क्या अब 'गोदी मीडिया' में इस बात पर बहस होगी कि कौन 'गैर-गंभीर' राजनेता है? मोदी जी तो बिल्कुल भी गंभीर नहीं लगते!
केंद्रीय कृषि मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मई के शुरुआती सप्ताह में कोई भी प्रमुख फसल मंडी में अपनी MSP का आंकड़ा नहीं छू सकी है. सबसे तगड़ी मार मक्का, बाजरा और सूरजमुखी के किसानों पर पड़ी है. Good report. @KisanTakChannel https://t.co/tf7nXFxaQP
@BBCHindi@ajitanjum@Tweetnitins@HelleLyngSvends@AbhayVishen In human right violation through top IAS officers in secretariats of Government of Uttrakhand in province with DM of Tehri Garhwal and sub divisional magistrate of two divisions Ghansali and Rishikesh took my money forcefully and not paying back despite three court decisions
@HelleLyngSvends@BBCHindi Keep the good work on. In India we trust in our duties and you did that we the people who are fighting fir human rights in courts and other international forum are in solidarity with your fair and good work
@pbhushan1 Am seeking legal help to get our money back which was forcefully recovered on gun point by senior IAS officers can you please help as three times high court set aside the orders of IAS officers but they again repeated the same
@zoo_bear And fortunately who got favourable decisions from court the officers at higher level will not follow like this one. I got four decision in my favour on same case filed twice the contempt petitions but senior IAS officers repeatedly passing the same order which set aside by court
@PTI_News My citizen rights violated three times by secretary level IAS officers which was Challa he’d in High court each time the orders was set aside but nothing has been done to refund the unlawful money recovered from us
देश और धर्म में सर्वोच्च स्तर पर “ब्रह्म” के लिए भी जिज्ञासा करने का साहस था उस देश और धर्म में सामान्य व्यहवार के प्रश्न (जिज्ञासा प्रश्नों का उच्चतम स्वरूप है) भी अनसुने किए जा रहे हैं जैसे वेन के समय “सर्व देवमय राज्ञ” का दम्भ हो लेकिन ऋषियों की वाणी भी आश्चर्यजनक शान्त है
@Mayur52974592 विदेशी निवेशकों के साथ ही घरेलू निवेशकों को आकर्षित करने के बजाय हतोत्साहित किया जा रहा है और ग्रामीण तथा अर्धशहरी क्षेत्रों में ये व्यवस्था कि प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं । केवल चंद लोगों की मनमानी के लिए भय और लालच के साथ अन्य लोग भी एक ही तरह की बात का अनुसरण कर रहे हैं ।
उसी अधिकारी द्वारा शिकायत पर एक ही दिन में दो अलग-अलग उत्तर अपलोड किए गए हैं साथ ही BDO, DDO और CDO भी वास्तविकता उजागर करने के लिए जांच नहीं करवा रहे हैं निदेशक पंचायती राज द्वारा कई बार शिकायत स्पेशल क्लोज की गई @OfficeofDhami@pushkardhami@ChouhanShivraj@PMOIndia@DMTEHRI1
@RebornManish पवन खेड़ा और कांग्रेस ने महात्मा गांधी जी का रास्ता चुनने में दुविधा दिखायी लेकिन उसका स्पष्ट कारण जानता और मीडिया का पूर्वाग्रहों से ग्रसित होना भी है जो अन्ना आंदोलन में शुरू हुआ था सुर अभी तक चल रहा है हाँ तीव्रता कुछ कम हुई है।