“लेबंटी चाह”सिर्फ चाय नहीं, ज़िन्दगी का सोंधापन है!
अगर आप पटना के उस 'गोलघर' की छाँव में पले-बढ़े हैं या फिर सात समंदर पार बैठकर किसी 'स्टारबक्स' में अपनी जड़ों की खुशबू ढूँढ रहे हैं, तो अभिषेक ओझा की यह किताब आपके लिए किसी 'इलायची वाली कड़क चाय' से कम नहीं है।
अभिषेक की कलम में वो जादू है कि वो 'लेबंटी' (नींबू वाली) चाय की खटास और मिठास के बहाने पूरी दुनिया का दर्शन करा देते हैं। किताब पढ़ते हुए आपको लगेगा ही नहीं कि आप कागज़ के पन्ने पलट रहे हैं, बल्कि ऐसा लगेगा जैसे आप खुद पटना की सड़कों पर अनुराग के साथ टहल रहे हैं या बैरीकुल/वीरेन्दर के साथ किसी अड़ी पर बैठे 'सिस्टम' सुधार रहे हैं।
पात्रों का 'चकाचक' ताना-बना
लेखक ने किरदारों को गढ़ा नहीं है, बल्कि उन्हें जिया है।
• अनुराग की उलझनें हमारी अपनी लगती हैं वही ज़िन्दगी को 'लेबंटी' की तरह चखने की चाह।
• बैरीकुल और वीरेन्दर जैसे पात्र लोक-संस्कृति के उस मजे को ज़िंदा रखते हैं जो अब धीरे-धीरे विलुप्त हो रहा है।
• एल्सा, मेंटल और प्रकृति कहानी में वो रंग भरते हैं जिससे देसी और विदेशी मिज़ाज का एक ऐसा कॉकटेल तैयार होता है, जिसका नशा धीरे-धीरे चढ़ता है।
• और हाँ, सोनुआ! वह छोटा सा किरदार अपनी मासूमियत से ऐसा बांधता है कि मन 'बागी' होने लगता है।
क्यों पढ़ें?
यह उपन्यास सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि 'नॉस्टेल्जिया' को व्यंग्य की चाशनी में डुबोकर परोसा गया एक लजीज व्यंजन है। इसमें सटायर (Satire) की वो धार है जो आपको हंसाएगी भी और कभी-कभी एक ठंडी आह भरने पर मजबूर भी कर देगी। अभिषेक ओझा ने आईआईटी कानपुर से लेकर न्यूयॉर्क के इंवेस्टमेंट बैंकिंग तक का जो सफर तय किया है, उसकी परिपक्वता उनके हर वाक्य में झलकती है।
"संसार की हर बात का कारण चाह ही तो है..." ~~यह महज़ एक लाइन नहीं, इस किताब की रूह है।
निष्कर्ष यह है कि-:
अगर आपकी ज़िन्दगी भी थोड़ी खट्टी, थोड़ी मीठी और थोड़ी 'ब्लैक कॉफी' जैसी कड़वी हो गई है, तो उसे 'दूध-शक्कर' वाला सुकून देने के लिए 'लेबंटी चाह' ज़रूर पिएं (मेरा मतलब है, पढ़ें)। यह किताब आपके मिज़ाज को 'चकाचक' करने की पूरी गारंटी देती है।
अभिषेक ओझा की 'लेबंटी चाह' आपके 'मन को हरियर' कर देगी।
@RamaKRoy सर का धन्यवाद 🙏🏼 उनके शब्द “लेबंटी चाह! क्या शानदार लिखा है ” गूँजता था दिमाग़ में इस किताब को पढ़ते समय।
@aojha जी 🙏🏼🙏🏼 आपको १०० तोपों की बैरीकूल सलामी 🫡
गांव में ड्रोन पर ढेला फैंकने से मार मची।
सोहनलाल बिंद की नातिन की शादी थी। खेत में शामियाना सजा था। घराती इंतजार में थे बारात के आने की। बारात की आतिशबाजी की चमक और शोर भी आने लगा था, पर तभी मामला गड़बड़ा गया।
चमरऊट के कुछ बच्चों ने बारात की एरियल वीडियोग्राफी करते ड्रोन पर ढेला फैंक दिया। गांव के बच्चे हवा चलते ढेला फैंकने की प्रेक्टिस करते हैं। ड्रोन तो उनके लिये बिजली के इंस्युलेटर से कहीं अच्छा निशाना था।
बच्चे का निशाना सटीक था। ड्रोन डैमेज हो गया। तब बरातियों ने चमरऊट के बच्चों को मोटरसाइकिल से चेज किया और मारपीट हुई। पांच सात के सिर फूटे। ड्रोन कूंच दिया गया। ड्रोन पर ढेला-फैंकक बच्चे - गगनवा, पवनवा तो भाग लिये। मार दूसरे खाये।
बरातियों का गुस्सा घरातियों पर टूटा। एक बार तो वे बिना व्याह वापस लौटने वाले थे, पर मानमनौव्वल से शादी-बिदाई हुई।
टेंशन तो हो ही गया। बिंदान और चमरऊट के बीच शीतयुद्ध चलेगा। बीच में यदा कदा सिरफुटौव्वल होगी।
यह खबर मुझे मिली तो लगा नाम बदल कर ठेल दी जाये ब्लॉग पर।
गांव में भी ड्रोन-प्रेरित युद्ध और शीतयुद्ध का युग आ गया है। रागदरबारी का अपडेट संस्करण ओवरड्यू हो गया है! 😂😂🤣
#गांवदेहात #ड्रोनयुद्ध
99 -No century
100 - Century
59 - No retirement
60 - Retirement
31st December - Old Year
1st January - New Year
17 year old - No license, No Vote
18 year old - License, Vote
That's how the world works Zany!