डूब के मर जाना चाहिए उन सरपंचों को
जो 5 साल सरपंच रहने के बाद भी
दूसरी बार लोगो के सामने हाथ जोड़ने पड़े
काम ऐसा कराओ कि लोग खुद
आगे रहकर बोले कि सरपंच तो आप ही रहोगे।
लोगों के दिलों में जगह बनाना मेरी नजर में
एक सरपंच की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
पत्रकारिता या चाटुकारिता
पहले मुझे भी लगा गलत हुआ, लेकिन जब पूरा सच देखा तो मेरे होश उड़ गए होश उड़ गए।।।
शुरुआत में जब उस पत्रकार के पिटने, चश्मा टूटने और कपड़े फटने का वीडियो वायरल हुआ, तो मुझे भी बहुत बुरा लगा। मुझे लगा कि यार यह तो बिल्कुल गलत है! स्टूडियो में बैठकर नफरत कोई और फैला रहा है, और सड़क पर रिपोर्टिंग कर रहे रिपोर्टर के साथ लोग गलत कर रहे हैं। हिंसा का समर्थन तो कोई भी नहीं कर सकता।।।
यहाँ तक कि जब हमारे स्पेस भाईचारा 2.0 में @MohitPandey_ और पूछने लगे कि छात्रों की इस अराजकता पर कुछ बोलिए, तो मुझे भी लगा कि इस पर लिखना चाहिए।।।
लेकिन फिर मैंने स्क्रॉल करते हुए यह वीडियो देखा...
वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि पुलिस द्वारा डिटेन किए जा रहे छात्रों में से जब एक बच्चा अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश करता है, तो यह गोदी मीडिया वाला पत्रकार रिपोर्टिंग छोड़कर खुद पुलिसकर्मी बन जाता है! वह उस बच्चे को घसीटकर वापस पुलिस के हवाले करने की कोशिश करता है।।।
अब सवाल यह उठता है
क्या वह छात्र कोई चोर, डाकू या आतंकी था???
पत्रकार का काम रिपोर्टिंग करना है या पुलिस की मुखबरी/दलाली करना???
क्या यह साफ़ नहीं दिखाता कि यह मीडिया पूर्वाग्रह (Bias) से पीड़ित था और घर से ही मन बनाकर आया था कि छात्रों को गलत ही साबित करना है???
मेरा सीधा सवाल
जब पत्रकार निष्पक्षता का मुखौटा उतारकर खुद एक पक्ष की तरफ से गुंडागर्दी या पुलिसगिरी करने लगेगा, तो सड़कों पर उतरे गुस्साए युवाओं से आप किस मर्यादा की उम्मीद करते हैं???
हिंसा का समर्थन कोई नहीं करता, लेकिन जब मीडिया खुद पुलिस की लाठी और सत्ता का औजार बन जाए, तो जनता का भरोसा और सब्र दोनों टूट जाता है।।।
मीडिया को पीड़ित बनने से पहले अपने अंदर झांककर आत्ममंथन करने की सख्त जरूरत है।।।
कौन गलत कौन सही फैसला आपका???हिट
भीष्म जानते थे कि कौरव गलत राह पर हैं,
पर घर की शांति के नाम पर चुप रहे।
यही चुप्पी आगे चलकर
हस्तिनापुर के विनाश का कारण बनी।
आज भी, जब बड़े बोलना छोड़ देते हैं,
तो गलतियाँ परंपरा बन जाती हैं।
निशिकांत तुम्हारे सुपुत्र का The Indian Legal Profession and Code of Ethics का पेपर था.
एग्जाम की टाइमिंग थी: 11:00AM-02:00PM
यानी सेंटर पर कम से कम 30 मिनट पहले तो पहुंचना रहा होगा.
लेकिन राहुल गांधी का धरना शाम को करीब 03:15 बजे शुरू हुआ तो तुम्हारा बेटा लेट कैसे हुआ?
मुगलों ने सदियों तक राज किया,अंग्रेजों ने भी लंबे समय तक शासन किया उनके शासन की आलोचनाएँ इतिहास में दर्ज हैं, लेकिन जितनी नफ़रत और सामाजिक विभाजन पिछले कुछ वर्षों में देखने को मिला है,उतना शायद पहले कभी नहीं दिखा आज हालात ऐसे हैं कि लोग मुद्दों से ज़्यादा एक-दूसरे के विरोध में खड़े नज़र आते हैं यह किसी भी समाज के लिए चिंताजनक स्थिति है...!
सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष पत्रकार शेखर गुप्ता ने आज 50 शब्द का बड़ा सार्थक संपादकीय द प्रिंट में लिखा है:
नई दिल्ली में युवाओं का विशाल विरोध-प्रदर्शन शिक्षा-व्यवस्था से उपजी गहरी हताशा और सरकार की उदासीनता का प्रत्यक्ष विस्फोट है। इन प्रदर्शनकारियों से दमनकारी और अहंकारी ढंग से निपटना हालात को और अधिक बिगाड़ेगा। किसान आंदोलन से यह सबक लिया जाना चाहिए कि आंदोलनों के पीछे षड्यंत्र खोजने और मनगढ़ंत सिद्धांत गढ़ने की प्रवृत्ति अंततः उलटा असर डालती है। मोदी सरकार को युवाओं से संवाद करना चाहिए; किसान आंदोलन के समय की गई वही भूल फिर नहीं दोहरानी चाहिए।
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यह एक संक्षिप्त और स्पष्ट संपादकीय टिप्पणी है। इसमें पाँच वाक्यों के भीतर समस्या, उसका कारण, सरकारी प्रतिक्रिया का खतरा, अतीत का उदाहरण और समाधान सभी रख दिए गए हैं।
1. आंदोलन को कानून-व्यवस्था नहीं, व्यवस्था की विफलता माना गया है
इसमें युवाओं के प्रदर्शन को उपद्रव, अराजकता अथवा राजनीतिक साजिश नहीं कहा गया, उसे दो गहरी समस्याओं की अभिव्यक्ति बताया गया है—
शिक्षा-व्यवस्था से उपजी हताशा
सरकार की उदासीनता
अर्थात प्रदर्शन स्वयं समस्या नहीं है; वह भीतर जमा असंतोष का बाहरी लक्षण है। जैसे बुखार बीमारी नहीं, बीमारी का संकेत होता है, वैसे ही सड़क पर उतरे युवा किसी अधिक गहरे संस्थागत संकट का संकेत हैं।
2. ‘High-handedness’ केवल कठोरता नहीं है। इसमें सत्ता के अहंकार, मनमानी, बलप्रयोग और संवादहीनता का अर्थ शामिल है। इसका आशय ऐसी सरकारी कार्रवाई से है जिसमें
पुलिस बल का अत्यधिक प्रयोग हो,
प्रदर्शनकारियों को अपराधी की तरह देखा जाए,
उनकी मांगों को सुने बिना आंदोलन कुचला जाए,
या प्रशासन अपनी शक्ति के मद में प्रतिक्रिया करे।
टिप्पणी चेतावनी देती है कि ऐसा व्यवहार आंदोलन समाप्त नहीं करता; वह असंतोष को और व्यापक, तीखा तथा नैतिक रूप से वैध बना देता है।
3. किसान आंदोलन का उल्लेख एक राजनीतिक चेतावनी है
किसान आंदोलन को उदाहरण बनाकर टिप्पणी सरकार को उसके पिछले अनुभव की याद दिलाती है। किसान आंदोलन के दौरान भी आंदोलनकारियों को कभी विदेशी शक्तियों, कभी अलगाववादी तत्वों और कभी राजनीतिक षड्यंत्र से जोड़ने की कोशिशें हुई थीं।
यहाँ तर्क यह है कि जब सत्ता वास्तविक शिकायतों का उत्तर देने के स्थान पर आंदोलन को बदनाम करने लगती है, तब वह तीन गलतियाँ करती है—
मूल समस्या को समझने से बचती है।
आंदोलनकारियों को और अधिक एकजुट कर देती है।
आम जनता में अपनी विश्वसनीयता खोती है।
इसलिए “conspiracy theories are counterproductive” का अर्थ केवल यह नहीं कि षड्यंत्र के आरोप गलत हैं; इसका अर्थ यह भी है कि ऐसी रणनीति राजनीतिक रूप से आत्मघाती सिद्ध हो सकती है।
4. टिप्पणी की केंद्रीय मांग: दमन नहीं, संवाद
अंतिम वाक्य इस पूरे संपादकीय का निष्कर्ष है—सरकार को आंदोलनकारियों से engage, अर्थात सक्रिय और ईमानदार संवाद करना चाहिए। केवल वार्ता का दिखावा नहीं, बल्कि उनकी मांगों, परीक्षाओं, भर्ती-प्रक्रियाओं, शिक्षा की गुणवत्ता, अवसरों की कमी और प्रशासनिक जवाबदेही पर ठोस प्रतिक्रिया अपेक्षित है।
इसमें एक लोकतांत्रिक सिद्धांत निहित है:
नागरिकों से बातचीत करना सत्ता की कमजोरी नहीं, लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्यता है।
5. इस टिप्पणी की शक्ति उसकी स्पष्टता और संक्षिप्तता है। वह पचास शब्दों के आसपास ही एक प्रभावी राजनीतिक तर्क तैयार कर देती है। उसकी भाषा उत्तेजक नहीं, लेकिन चेतावनीपूर्ण है।
इसकी सीमा यह है कि इसमें युवाओं की ठोस मांगों, आंदोलन के तात्कालिक कारणों और शिक्षा-व्यवस्था की विशिष्ट विफलताओं का उल्लेख नहीं है। इसलिए यह विस्तृत विश्लेषण की बजाय एक नीतिगत संपादकीय हस्तक्षेप अधिक है।
लब्बेलबाब ये के युवा प्रदर्शन किसी अदृश्य शत्रु की साजिश नहीं, शासन और शिक्षा-व्यवस्था के प्रति टूटते विश्वास का परिणाम हैं। सत्ता यदि इस असंतोष को पुलिस, प्रचार और आरोपों से दबाने का प्रयास करेगी तो वह समस्या का समाधान नहीं करेगी— उसे अधिक विस्फोटक बनाएगी। लोकतंत्र में नाराज युवाओं को शत्रु नहीं, चेतावनी की घंटी समझा जाना चाहिए।
जंतर-मंतर पर पिछले दो दिनों से लोगों को जो गुस्सा दिख रहा है, उसमें साज़िश ढूंढने की बजाय आप समझिए कि ये देश के लोगों का जायज़ गुस्सा है। देश में एक बड़े वर्ग को लगता है कि सरकार ने उसको उसके हाल पर छोड़ दिया है। किसी भी शहर की कुछ-एक पॉश कॉलोनी को छोड़ दीजिए, बाकी शहर आपको नर्क का विज्ञापन लगता है।
टूटी सड़कें, मिलावटी खाना, उड़ती धूल, दूषित हवा, बिखरा कचरा, बहती नालियां, आवारा पशु, बेतरतीब ट्रैफिक, हर फुटपाथ पर अवैध कब्ज़े। सरकारी स्कूल और अस्पताल जाने लायक नहीं। प्राइवेट स्कूल और प्राइवेट अस्पताल में चले जाएं ऐसी 90 फीसदी भारतीयों की हैसियत नहीं।
ऊपर से पेपर लीक, महंगे घर, घूसखोरी, धार्मिक स्थलों पर मची लूट और पुलिस की बर्बरता अलग।
इस सबके बीच यही आम आदमी, जब देखता है कि नेता जब सड़क से गुजरता है तो पूरा ट्रैफिक रुकवा दिया जाता है, छुटभैया नेता भी दस-दस गाड़ियों के काफिले में गुज़रता। कुछ सालों में 50-100 करोड़ कमा लेता है।
महल जैसे घरों में रहता है। अपने बच्चों को पढ़ने विदेश भेज देता है, खुद छुट्टी मनाने से लेकर इलाज कराने विदेश जाता है। जिस नेता पर शिक्षा और स्वास्थ्य को ठीक करने की ज़िम्मेदारी है, वो खुद प्राइवेट स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खोलकर बैठा है, तो ये सब देखकर आम आदमी का सीना छलनी हो जाता है।
जंतर-मंतर पर आज जो पुलिस की लाठी खाते दिख रहे हैं न ये देश के वही आम लोग हैं जिन्हें सिस्टम ने छलनी कर रखा है। इसलिए सवाल लोगों के गुस्से में साज़िश या षड्यंत्र तलाशने का नहीं, इस कड़वी हकीकत को स्वीकार करने का है। देश की हर पार्टी को अपने गिरेबान में झांककर खुद से पूछना चाहिए कि क्या किया है उन्होंने देश के लोगों के साथ। 12 घंटे खूून पसीना बहाने वाले मां-बाप जब बच्चे की छोटी सी मांग भी पूरी नहीं कर पाते न तब भी खुद से पूछते हैं कि क्या मैं अपने के साथ न्याय कर पा रहा हूं या नहीं...क्या मैं एक अच्छी मां या पिता हूं या नहीं। वो सोचता है कि बच्चे के लिए और मैं क्या करूं ताकि इसे एक अच्छी ज़िंदगी दे पाऊं। लेकिन सरकार जो जनता की अभिभावक होती है उनकी ज़िंदगी संवारने या बिगाड़ने की ज़िम्मेदार होती है उनमें लेशमात्र भी ये अहसास नहीं दिखता।
बीजेपी आज सत्ता में है, तो गुस्सा उस पर निकल रहा है, लेकिन पूरी राजनीतिक जमात का चरित्र यही है। दुनिया में शायद ही कोई देश और होगा, जिसके नेताओं ने अपने देश को इस बेरहमी से लूटा हो, अपने लोगों को ऐसे छला हो।
इसलिए जनता के गुस्से को चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। दूसरों पर लांछन लगाने से पहले अपनी अंतरात्मा टटोलिए, बशर्ते अब तक वो मर न गई हो। जिसकी पूरी आशंका है। #JantarMantar #delhipolice
NET-JRF के पेपर 2-3 लाख में हर साल बिकते हैं। Cuet UG और PG के पेपर लीक होते हैं। यह एक खुला सच है। नीट का पेपर बड़ा और ज़रूरी माना जाता है इसलिए यह लीक हुआ तो इसे मुख्यधारा में जगह मिली। वो भी बीस बच्चों को खोने के बाद। NTA इस देश की सबसे भ्रष्ट संस्था है। राजस्थान की अधीनस्थ बोर्ड की भर्तियों की मैरिट 80% कैसे जा रही है यह कोई नहीं पूछ रहा क्योंकि जो बेचारे परीक्षा देते हैं उन्हें वापिस पढ़ने भी तो बैठना है।
जिनको सवाल उठाने चाहिए थे वो तब आवाज़ उठाने आए जब युवाओं ने ख़ुद सड़कों पर आकार इन्हें बताया कि इस सिस्टम को ठीक करो। तथाकथित आंदोलन के लीडरों ने कल लाठियाँ नहीं खायी बल्कि आम स्टूडेंट्स ने खायी है। आज यह सिस्टम नकली डॉक्टर बनाएगा कल को पुलिस, IAS, RAS और मास्टर भी बनाएगा। पेपरलीक गंभीर मुद्दा है, ऐसा मुद्दा जो पीढ़ियाँ बर्बाद कर देगा इसलिए सवाल पूछना जरूरी है उनसे जो जिम्मेदार हैं और जिन पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी थी। यह छात्रों के भरोसे का मामला है। वो सरकार की तरफ नहीं देखेंगे तो और कहाँ जाकर जवाबदेही की माँग करेंगे?
इस प्रोटेस्ट में सरकार और मीडिया को सिर्फ स्टूडेंट नहीं दिखे,लेकिन देशद्रोही,गद्दार,विपक्षी,कांग्रेसी,AAP और वामपंथी सब दिख गए लगता है सरकार अब यह परख रही है कि देश में कितने मानसिक गुलाम अब भी बचे हैं,सबसे बड़ी विडंबना यह है कि राजनीति ने देश में ऐसी मानसिकता पैदा कर दी है कि जैसे ही कोई सरकार से सवाल करता है,एक वर्ग बिना सही-गलत,तथ्य या परिस्थितियों पर विचार किए स्वतः ही सवाल पूछने वालों के खिलाफ खड़ा हो जाता है,जबकि लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है किसी भी मुद्दे का मूल्यांकन व्यक्ति,दल या विचारधारा के आधार पर नहीं,बल्कि तथ्यों और तर्कों के आधार पर होना चाहिए,खैर!...एक बात स्पष्ट है जनता अब धीरे-धीरे जागरूक हो रही है जितनी जागरूकता बढ़ेगी,उतनी ही जवाबदेही भी बढ़ेगी,और यही किसी मजबूत लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है...!
इस प्रोटेस्ट में सरकार और मीडिया को सिर्फ स्टूडेंट नहीं दिखे,लेकिन देशद्रोही,गद्दार,विपक्षी,कांग्रेसी,AAP और वामपंथी सब दिख गए लगता है सरकार अब यह परख रही है कि देश में कितने मानसिक गुलाम अब भी बचे हैं,सबसे बड़ी विडंबना यह है कि राजनीति ने देश में ऐसी मानसिकता पैदा कर दी है कि जैसे ही कोई सरकार से सवाल करता है,एक वर्ग बिना सही-गलत,तथ्य या परिस्थितियों पर विचार किए स्वतः ही सवाल पूछने वालों के खिलाफ खड़ा हो जाता है,जबकि लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है किसी भी मुद्दे का मूल्यांकन व्यक्ति,दल या विचारधारा के आधार पर नहीं,बल्कि तथ्यों और तर्कों के आधार पर होना चाहिए,खैर!...एक बात स्पष्ट है जनता अब धीरे-धीरे जागरूक हो रही है जितनी जागरूकता बढ़ेगी,उतनी ही जवाबदेही भी बढ़ेगी,और यही किसी मजबूत लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है...!
@SanjayAzadSln@Wangchuk66@RahulGandhi जिसका बीजेपी को था इंतजार
वो घड़ी आ गयी, आ गयी
भाई साहब रहने दो अभी क्रेडिट बाद में ले लेना अभी सिर्फ छात्र आंदोलन रहने दो इसको
NEET paper leak: PM silent
Students suicide: PM silent
Ethanol blending: PM silent
Ram Mandir Chanda Chori: PM silent
Falling rupee: PM silent
Fuel price rise: PM silent
Unemployment: PM silent
ISRO scientist quitting: PM silent
I heard that only Manmohan Singh was a silent prime minister. Also atleast remote control of Manmohan Singh was in India.