तुम जितने लोगों को चाहें उतने लोगों को प्रेम कर सकते हो- इसका ये मतलब नहीं है कि तुम एक दिन दिवालिया हो जाओगे, और कहोगे,” अब मेरे पास प्रेम नहीं है”. जहाँ तक प्रेम का सवाल है तुम दिवालिया नहीं हो सकते।
#ओशो
प्रेम और भोग में बड़ा अंतर है। व्यक्ति की
उपस्थिति का मजा लेना प्रेम है, परिस्थिति का
मजा लेना भोग है। पश्चिम की पूरी संस्कृति भोग
पर आधारित है। वहां व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है,
आयोजन महत्वपूर्ण है। पदार्थ महत्वपूर्ण है।
~समर्थगुरू
@SiddharthAulia
234
साक्षी होकर जग को देखो
यह दुनिया एक तमाशा है
कोई श्रीराम-सा शीलवान
कोई रावण के जैसा है
होता रहता है दिवस-रात
मत चाह करो अन्यथा तात
स्वीकारं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
शांत मन ही आत्मा की ताकत है, शांत मन में ही ईश्वर विराजते हैं।
जब पानी उबलता है तो हम उसमें अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख सकते हैं और शांत पानी में हम खुद को देख सकते हैं।
ठीक वैसे ही अगर हमारा हृदय शांत रहेगा तो हमारी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को हम देख सकेंगे।
#ओशो
'समर्थगुरू ने कहा' समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया जी द्वारा दिए गए अध्यात्म और जीवन जीने की कला के स्वर्णिम साधनासूत्रों का संकलन है,जो पॉकेट बुक के रूप में उपलब्ध है। यह सभी साधकों और जिज्ञासुओं के लिये पठनीय और संग्रहणीय है।गैलेरिया से प्राप्त कर सकते हैं। मूल्य ₹40
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प्रेम आलौकिक है ,
और सभी सीमाओं से परे है,
आप प्रेम को प्रगट नहीं कर सकते ,
प्रेम आप को प्रगट करता है,
यही तो प्रेम की खूबसूरती है...
प्रेम सिर्फ एक एहसास है,
इसे शब्दों में बांधना मुमकिन नहीं
सो सिर्फ प्रेम पूर्ण होना ही,
उस की पूजा है।
#ओशो
जहां तुम्हारी
आंखें भर जाएं,
वहीं झुक जाना ।
और जिससे
तुम्हारे नेत्र
तृप्त हों,
वहीं झुक जाना ।
जिससे तुम्हें
सुख की
झलक मिले,
वहीं झुक जाना
जहां शांति का
आकाश खुले,
वहीं झुक जाना ।
#ओशो
232
हर दिन होता न समान सदा
मौसम का रंग बदलता है
कुछ फूल बगीचे में खिलते
काँटा भी पग में चुभता है
है कहीं धूप तो कहीं छाँव
कोयल की कुहू काँव काँव
स्वीकारं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
शांति साक्षी से मिलती है,
प्रज्ञा से बढ़ता प्रेम अहो।
आनंद सुरति से मिलता है,
साक्षी, प्रज्ञा, हरिनाम गहो।
मन का साक्षी जो हो जाता,
वह शांत चित है हो जाता।
अथ साक्षी शरणम् गच्छामि,
भज ओशो शरणम् गच्छामि।
~समर्थगुरू
@SiddharthAulia
231
सत्संगी मित्र विरल होते
मिल जाएं उनको मत खोना
कुछ धोखा भी दे जाते हैं
तब नियति जानना मत रोना
संतुलन जगत का नियम जान
होता रहता मानापमान
निर्द्वंद्वं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
कोमल की रक्षा करने को,
अस्तित्व कवच कुछ रचता है।
आवरण अगर हट जाये तो,
फिर कहाँ कोई फल बचता है।
मैं भी जीतूँ, तुम भी जीतो,
प्रज्ञा फल से जीवन सींचों।
अथ प्रज्ञा शरणम् गच्छामि,
भज ओशो शरणम् गच्छामि।
~समर्थगुरू
@SiddharthAulia
जो गलत हो चुका हो, हमें उस पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इसके बजाय, कैसे उसकी भरपाई हो या आगे से कैसे बेहतर करना है, इस पर ध्यान देना चाहिए! हमें बीती बिसार कर, उससे शिक्षा लेकर, उत्तर खोजने की दिशा में आगे बढ़ने पर अपनी ऊर्जा खर्च करनी चाहिए, इसके सकारात्मक परिणाम निकलते हैं!
#ओशो
229
जो अहोभाव से नहीं भरे
उनकी सेवा कह कौन करे
जो निन्दा में जीवन जीते
उनका मंगल कह कौन करे
बेहतर इनसे दूरी रखो
रब के सुमिरन में मस्त रहो
अथ सुमिरन शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि