I can’t stress how important it is to understand that this is the result of a deep structural flaw in the Indian Constitution’s design, and not just a temporary “aberration.” Brief thread. 👇🏼
The government that was sleeping since 28th February has suddenly issued a flurry of statements after our press conference.
But the problem is that the public is expected to be reassured by an incoherent statement – one that reads as if it were drafted by a five-year-old – claiming that “unidentified officials” are making commitments about speaking to “non-specific suppliers” regarding “undefined quantities” of energy at “unknown prices.”
But since we are at it, I challenge @HardeepSPuri to clarify the following:
1. If India’s current stock position is truly “comfortable,” why have restrictions in gas supply been ordered?
2. Again, if the energy situation is comfortable, why is it being “reviewed twice a day”? That hardly sounds like routine.
3. Australia, Canada, the United States, and the UAE are options. But India does not need a hundred “potential sellers” – it needs a few reliable suppliers. Which ones has the ministry actually zeroed in on?
4. Denis Alipov, the Russian Ambassador to India, said today, "It is for India to decide its oil supplies and their source. We have always been open towards supplying oil to India." What is India's decision with respect to buying from Russia? Are we waiting for permission from Trump?
5. When officials refer to “alternative markets for gas” and “major oil producers and traders,” are these real entities with names, or simply convenient placeholders for face-saving?
5. Lastly, but importantly, on 9th February, you said on the floor of the Rajya Sabha that we have 74 days of petroleum reserves. On March 3, the government said that we have only 25 days of stocks. What unfortunate end did our petroleum stock meet? Or did you lie in Rajya Sabha?
Don’t hide behind sources – come out and speak clearly. These tricks may have worked on your friend Epstein – but the nation deserves clarity.
Sociology teacher here
(and deeply disturbed by this incident)
- Higher the patriarchal nature of society, higher is the urge to get a higher Dowry (to ascertain and then show off groom’s worth)
And if a groom gets lower dowry, the self-assumed worth gets a hit in the eyes of “saamaaj”
So, a lot of times, dowry is sought not only to do “aish” but also to ascertain the value of the “ladka” and superiority of “ladke waale”
A brilliant sociologist, Deepankar Gupta, considers that dowry’s glorification is the manifestation of consumerism
But then, there’s also a very famous Indian sociologist (M.N. Srinivas) who in his book ‘Some Reflections on Dowry’ equates dowry deaths to failure of modern state
The harshest analysis comes from Bina Aggarwal who considers dowry as saamaaj’s reaffirmation of the worthlessness of women
But if you read V. Geetha’s book “Patriarchy” you find that dowry might be the manifestation of denial of inheritance to women
All of them very uniquely Indian (or to say, greatly practiced in our subcontinent)
Here, being an Indian, I personally also believe that the practice of virilocality (staying at groom’s house after marriage) alienates a woman from her parental support system (and makes her dependent on her husband’s family)
And also makes bride’s parents falsely live in an assumption that her new home is her final destination and that they can’t and shouldn’t participate in what is believed to be now their daughter’s “personal matter��
The daughter, suddenly, becomes the most helpless while becoming the most vulnerable in her entire life
Baaki you must have also heard the common phrase that “ek aurat hi aurat ki dushman hoti hai”, which finds place in sociology too as the concept of “patriarchal bargain”, where women like Saasu Maa go to all extents to keep the status of her Bahu to the lowest so that Saasu Maa herself could stay relevant in a men’s world
All of this, the fake egos of males, their parents, the self-effaced respect of women and their ghar waale, the notion of saamaaj and what will it say continues to stay rent-free in everyone’s head and the idea that marriage is the most important milestone of life, comes together and makes the lives of so many brides and their parents unbearable yet with no escape
Only way out I see is sheer rebel by the women against everyone who pressurises them AND a promise from state that such rebellious women will be protected from the samaaj
And since it’s a difficult thing to do, we’ll continue seeing more such cases..
That, such cases will happen for sure, just that we don’t know with whom 🙏
लश्कर-ए-तैयबा : पाकिस्तानी आर्मी की अघोषित बटालियन
28 मई को लश्कर-ए-तैयबा का नया पॉलिटिकल फ्रंट ‘पाकिस्तान मरकज़ी मुस्लिम लीग’ देश भर में ‘यौम-ए-तकबीर’ मन रही थी. PMML ने कल मीनार-ए-पाकिस्तान के सामने बड़ा जलसा किया.
पोस्ट में अटैच पहली फोटो तल्हा सईद की है. यह हाफिज सईद का बेटा है. इसने कल PMML की रैली में भाग लिया. इसके साथ जो शख्स दिखाई दे रहा है वो सैफुल्लाह कसूरी, उर्फ़ साजिद जट्ट उर्फ़ साजिद लंगड़ा है. यह फिलहाल कश्मीर में लश्कर के ऑपरेशन का डीफैक्टो हेड है. भारत ने इस पर पहलगाम हमले का मास्टर माइंड होने का आरोप लगाया है. फिलहाल यह PMML का जनरल सेक्रेट्री है.
पोस्ट में दिखाई दे रही दूसरी तस्वीर कराची में लगे एक ���ोस्टर की है। इसमें एक तरफ़ तीनों सेनाओं के प्रमुख हैं और दूसरी तरफ़ सफेद टोपी में जो शख़्स दिखाई दे रहा है उसका नाम फैजल नदीम है।
फैजल नदीम लश्कर का सीनियर कमांडर है। इस पर 2008 के मुंबई अटैक में शामिल होने का आरोप है। इसके अलावा इस पर 1 जनवरी 2023 को राजौरी के डंगरी गांव में हिंदू आबादी पर हुए हमले का मास्टर माइंड अबु क़ताल फैज़ल नदीम ही है।
16 मार्च 2025 को झेलम के दीना डिग्री कॉलेज के सामने फला इंसानियत फाउंडेशन जोकि लश्कर के नेटवर्क का NGO है, उसके एक कारकून नदीमुर रहमान मारा गया था। उस समय इंडिया टुडे ने स्टोरी ब्रेक की कि फैसल नदीम उर्फ अबू कताल मारा गया। लेकिन फैसल नदीम ज़िंदा है और मरकजी मुस्लिम लीग नाम से बनी लश्कर की पॉलिटिकल विंग का पदाधिकारी है।
लश्कर और पाकिस्तानी आर्मी एक-दूसरे में कैसे नत्थी हैं, आइए इसको थोड़ा समझते हैं.
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बांग्लादेश : अनिश्चितता के काले साये
4 फरवरी 2025. शाम को करीब चार बजे थे. बांग्लादेश के कासिमपुर जेल के बाहर एक भीड़ जेल के दरवाजे खुले का इन्तजार कर रही थी. तभी पचास पार की उम्र का एक शख्स जेल की बड़ी सी फाटक से छोटे से दरवाजे से बाहर निकला. भीड़ ने नारा लगाया 'नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर.' भीड़ की आवाज सुनते ही रिहा हुए कैदी के चहरे पर मुस्कान दौड़ गई. इसके बाद पूरे कासिमपुर में उसका विजय जुलुस निकाला गया. अभी डेढ़ साल पहले तक यहा शख्स बांग्लादेश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा कैच हुआ करता था. नाम, मोहिबुल्लाह. बांग्लादेश के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन जमात-उल-अंसार-फिल-हिंदल शर्किया का डिप्टी हेड.
स्वागत में खड़ी भीड़ का नेतृत्व कर रहा था अताउर रहमान बिक्रोमपुरी जोकि खुद अंसारउल्लाह बांग्ला टीम नाम के आतंकी संगठन का घोषित सदस्य था. 2022 में उसे पुलिस ने गिरफ्तार किया था और फिलहाल उसके जमानत की कोई जानकारी लॉ एनफोर्समेंट एजेंसी के पास नहीं थी. दरअसल बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद रैडिकल इस्लामी संगठनों से ताल्लुक रखने वाले लगभग सारे नेता एक-एक करके जेल से बाहर आना शुरू हो गए. इनमें बड़ी तादाद ऐसी थी जिन्हें स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाकर बिना कोर्ट के आदेश के बाहर निकाल लिया गया था. इसमें शर्किया ग्रुप के आतंकी भी शामिल थे जिसे बंगलादेशी सिक्युरिटी एजेंसी अब तक सबसे खतरनाक आतंकी संगठन मान रही थीं.
जमात-उल-अंसार-फिल-हिंदल शर्किया या जिसे आम बोलचाल में शर्किया ग्रुप भी कहा जाता है. 2017 में शमिन महफूज़ ने इस टेरर ग्रुप की नींव डाली थी. ठीक इसी समय चिटगांव हिल्स में एक और एथनिक ट्राइबल मिलिटेंट ग्रुप की भी स्थापना हो रही थी. कुकी-चिन नेशनल आर्मी. संयोग देखिए कि दोनों ग्रुप एक-दूसरे के साथ नत्थी हो गए. KNA ने शर्किया ग्रुप के पहले आतंकियों को चिटगांव के बंदरबन में ना सिर्फ पनाह दी बल्कि ट्रेनिंग और असलहा भी दिया. इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के मुताबिक हर एक कैडर की ट्रेनिग के लिए तीन लाख बंगाली टका चार्ज किया गया. और यह पैसा आ रहा था मेजर सैयद जियाउल हक की तरफ से.
कमाल की बात है कि 2017 में बना KNA को फंडिंग और हथियार अमेरिकन खुफिया एजेंसी CIA से मिलते हैं. मार्च 2023 में KNA को थाईलैंड-म्यांमार के रास्ते अमेरिकन हथियारों की बड़ी शिपमेंट मिली थी. इसी KNA के चटगांव हिल्स स्थिति सेफ हाउस और ट्रेनिंग कैंप के जरिए बांग्लादेश के इस्लामिक रैडिकल आतंकी संगठनों ने खुद को पिछले कई सालों तक ना सिर्फ जिन्दा रखा बल्कि मजबूत भी किया.
2022 में बंगलादेशी सिक्यूरिटी फोर्सेज के कान तब खड़े हुए जब शर्किया ग्रुप का एक सिरा उन्हें जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश तक ले गया. बांग्लादेश की काउंटर टेररिज्म यूनिट ने अपनी जांच में पाया कि जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान का बेटा रफत शफीकुर रहमान ने इस्लामी छात्र शिबिर के 11 लड़कों को ट्रेनिगं के लिए शर्किया ग्रुप के चिटगाँव हिल्स के ट्रेनिंग कैंप में भेजा था.
5 अगस्त 2023 को बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद चीजें तेजी से बदली. लम्जे समय से बैन रही ��मात-ए-इस्लामी फिर से हरकत में आई है. जमात ने तेजी से देश भर के मदरसों को टेकओवर करना शुरू किया. राजशाही, खुलना, बारीसाल प्रोविंस में लगभग सभी मदरसे और मस्जिदें फिलहाल जमात के कब्जे में है. शर्किया ग्रुप, अंसारउल्ला बांग्ला टीम और जमात-ए-मुजाहिद्दीन जैसे टेरर ग्रुप जमात के फोल्ड में शामिल हैं.
दूसरी तरफ शेख हसीना ने एक समय में जमात को काउंटर करने के लिए हिफाजत-ए-इस्लाम नाम के एक दूसरे रैडिकल इस��लामी ग्रुप को अन्दर से सपोर्ट करना शुरू किया था. जमात पर प्रतिबंध के बाद हसीना के दौर में ही जमात का एक बड़ा काडर बेस हिफाजत की तरफ शिफ्ट हुआ था. हिफाजत ने चटगांव हिल ट्रेक्स में डोमिनेंट ट्राइबल क्रिश्चियन आबादी को काउंटर करने के लिए मुस्लिम सेटलमेंट बसाने के बंगलादेशी आर्मी के प्रयासों में बड़ी मदद की. रिजीम चेंज के बाद हिजफत की रैंक एंड फाइल्स में एक और टेरर ग्रुप नेअच्छी-खासी घुसपैठ की है. इस ग्रुप का नाम है हिब्ज-उल-जिहाद-अल-इस्लामी या हुजी.
इसके अलावा हिज्ब-उल-तहरीर नाम एक और आतंकी संगठन है जोकि बांग्लादेश में प्रतिबंधित है. बांग्लादेश के आलावा इस आतंकी संगठन की कुछ एक्टिविटी भारत के दिल्ली,तेलंगाना, मध्य प्रदेश और कर्णाटक में भी रेडार पर आई है. यह संगठन शेख हसीना का तख्तापलट करने में काफी सक्रिय था. तख्तापलट के बाद इस संगठन के फाउन्डिंग मेंबर नासिमुल गनी को होम सेकेट्री बनाया गया है. मतलब कि HuT फिलहाल युनुस के साथ सत्ता की साझेदार है.
कमाल की बात यह है कि बांग्लादेश में सक्रिय सभी आतंकी संगठन के लिंक पाकिस्तान से जाकर जुड़ते हैं. JMB पर बैन लगने के बाद उसने नया फ्रंट इस्लामिक स्टेट बांग्लादेश बना लिया था. अन्सरुल्लाह बांग्ला टीम मुख्य रूप से पाकिस्तानी बरेलवी आतंकी संगठन अंसारउल्लाह का एक्सटेंशन जिसकी वफादारी अल-कायदा के साथ है. हुजी को 1985 में ISI ने कश्मीर में प्रॉक्सी वॉर के लिए बनाया था. 1990 में इसे बांग्लादेश में हुजी-बी नाम से एक्टिव किया गया था.
यह वो बैकग्राउंड है जिसे समझे बिना हाल की घटनाओं को समझना आसान होगा.
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25 दिसंबर 2015:
पाकिस्तान की जमीन पर क्रिसमस के दिन साक्षात सेंटा क्लॉज उतर आए जो तोहफे में शांति का संदेश लाए थे। पूरी दुनिया हैरान थी, पक्ष-विपक्ष सबने कहा था कि इस तरह अचानक लैंड होने से पहले देश को भरोसे में लेना चाहिये था। लेकिन फिर भी सबने कहा चलो इनको भी देखते हैं। 1/n🧵
आतंकी हमला और नैरेटिव वॉर
पहलगाम आतंकी हमले को राजनीतिक फाय���े-नुकसान के हिसाब से नैरेटिव वॉर बना दिया गया है।
जिस जगह पर यह घटना हुई, वहां सिक्योरिटी फोर्सेज को पहुँचने में कम से कम एक घंटे का समय लगता है। शुरुआती फायर के बाद लोगों को घेरकर, उनकी धार्मिक पहचान पूछकर गोल�� मारी गई यह बात सही है।
आपको क्या लगता है कि जिन आतंकियों ने इस घटना को अंजाम दिया है, वो अपने आका के निर्देश के बिना यह सब कर रहे थे। इस पूरी वारदात को इस हिसाब से प्लान किया गया था कि बाद में इसी किस्म का नैरेटिव खड़ा हो।
हम दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी हैं और एक सेकुलर डेमोक्रेसी हैं। और हमें अपनी इस पहचान पर गर्व है।
यह पूरी घटना मानवता के ख़िलाफ़ जघन्यतम अपराध है । निहत्थे नागरिकों की टार्गेटेड किलिंग है। हमारे देश की अस्मिता को सीधी चुनौती है। अगर आप इस पूरी वारदात को हिंदू-मुस्लिम की बहस में घसीटेंगे तो आप इस अपराध के दायरे को संकीर्ण करने का काम कर रहे हैं। और कहीं ना कहीं इस आतंकी वारदात के हैंडलर्स के मंसूबों को पूरा करने में उनकी मदद कर रहे हैं। यह समय साथ खड़े होने का है। राजनीति करने के 50 दूसरे मौके हैं।
कुंभ का कवर-अप और रिपोर्टिंग के पुराने सबक
पोस्ट लंबी है, तसल्ली से पढ़ें।
29 तारीख़ की सुबह मोबाइल पर नोटिफिकेशन आया। परिवार के 25 से ज़्यादा सदस्य कुम्भ में थे। 28 तारीख़ को दादी जी बरसी थी, मां ने भंडारा रखा था। जैसे ही भगदड़ की खबर सुनी तो व्यक्तिगत क्षति का डर सता रहा था। लेकिन घरवाले सब ठीक थे। खबर फॉलो करना शुरू किया। अपडेट थी कि एनएसजी में मोर्चा संभाल लिया है। कुछ लोग घायल हुए हैं। फिर मृतकों की संख्या 7 बताई गई। अब तक सरकार 30 पर अटकी है।
मेला क्षेत्र कैमरे की सर्विलांस में था। लगा कि सरकार असल में मृतकों के आंकड़े को क्या ही छुपाएगी। फिर पिछले कुछ अनुभव याद आना शुरू हुए। सिलसिलेवार तरीके से आपके सामने रख रहा हूँ। इस गरज से कि आप उ��्तर प्रदेश की नौकरशाही के कवरअप की क्षमता को आइडिया लगा सकें।
पहला अनुभव बुंदेलखंड का है। साल 2015 में पश्चिमी विक्षोभ के चलते उत्तर भारत में रबी की फसल तहस-नहस थी। एक दशक का कृषि संकट विस्फोटक हो गया। पूरे देश में किसान आत्महत्या का सिलसिला शुरू हो गया। बुंदेलखंड के एक-एक जिले में सैंकड़ों किसान मरे थे। मैं उरई-जालोन गया था। कालपी के सीओ साहब भले मानस थे। मटर की फसल बर्बाद होने पर एक किसान दंपति आत्म हत्या कर ली। उनकी तीन बेटियां थी।सीओ साहब ने तीनो बच्चियों को गोद ले लिया। उन्होंने मुझे एक डॉक्यूमेंट लीक किया। इसमें जिला प्रशासन की तरफ़ से 25 किसानों की संदिग्ध मौत की विवेचना थी। एक भी किसान की आत्महत्या का वजह कर्ज नहीं था। किसी में पारिवारिक झगड़ा तो किसी में शराब का नशा। जबकि मैंने अखबारों की कत���ने इकट्ठा की थी, उसमें मरने वाले किसानों की तादाद 58 थी। दस से ज़्यादा का इंटरव्यू किया। इस पर स्टोरी भी की।
दूसरा अनुभव मथुरा का रामवृक्ष यादव कांड। मथुरा जिले के केंद्र में एक बड़ा सा उद्यान है। वहाँ जयगुरूदेव मत के मतावलंबी रामवृक्ष यादव ने अपनी मिलिशिया खड़ी कर ली थी। जब उद्यान पुलिस इसे खाली करवाने पहुंची तो क्रॉस फायरिंग हुई। पुलिस के दो आला अधिकारी मारे गए। इसके ��ाद जब पुलिस ने जवाबी करवाई हुई तो औरतों-बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। मुझे कई जगहों पर औरतों के फटे हुए कपड़े और अंडरगारमेंट बिखरे हुए मिले। पाँच हज़ार लोगों पर पुलिस ने फायर खोला था। कितनी महिलाओं का बलात्कार हुआ, कितने लोग मारे गए कुछ पता नहीं लगा। घायलों को मथुरा, वृंदावन, आगरा और अलीगढ़ के अलग-अगल अस्पतालों में भेज दिया गया। आगरा और अलीगढ़ में घायलों से मिलने गया था। निशाना लगाकर गोली मारी गई थी। आगजनी हुई थी। सबकुछ साफ़ कर दिया गया। तीन दिन तक अलग-अलग जिलों के अस्पताल और शमशानों की खाक छानता रहा, कुछ भी हासिल नहीं हुआ।
तीसरा अनुभव 2018 में बरेली में फैले मलेरिया फ़ोल्सीफ़ेरम का है। एक-एक गांव में 15-20 मौतें। सदर अस्पताल के पास जाँच के लिए किट तक नहीं थे। सैंकड़ों की मौत हुई। सरकार ने 29 के बाद गिनती बंद कर दी। बाद में केंद्र से एपिडेमिक कंट्रोल के लिए टीम भेजी। इसमें एक डॉक्��र साहब थे। सिगरेट-चाय वाली दोस्ती बन गई। उन्होंने डॉक्यूमेंट लीक किया। उसमें 80 से ज़्यादा डेथ रिकॉर्ड थी। रातभर बैठकर स्टोरी लिखी। एक संपादक ने तीन दिन इसलिए नहीं छापी क्योंकि 1200 शब्द से ज़्यादा थी। नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया।
उत्तर प्रदेश की नौकरशाही का यह बहुत पुराना ट्रेंड है। अक्सर बड़ी घटनाओं में मृतकों के आंकड़े छुपा दिए जाते हैं। इसके कुछ आसान तरीके हैं। मसलन मृतकों की बॉडी बगल जिले में शिफ्ट कर देना। इसके अलावा परिजनों से जगह पर लिखवा लेना कि मौत प्राकृतिक कारणों हुई है। या फिर मोर्चरी और अस्पतालों को सील कर देना । यह पहले भी हुआ है, अब भी हो रहा है।
जावेद अख़्तर साहब का एक पाकिस्तानी पत्रकार को दिया हुआ ये इंटरव्यू सुनिए। ज�� आईना उन्होंने पाकिस्तानी पत्रकार को दिखाया, उस में हिंदुस्तान के पत्रकार भी अपना चेहरा देख सकते हैं।
प्राइमिनिस्टर गांधी !!!!
1924 बेलग���म अधिवेशन में गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने। अफ्रीका से आये उन्हें 10 साल हो गए थे। अब तक उनकी वो छवि बन चुकी थी, जो कांग्रेस के ढांचे से ऊपर थी।
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उनके पूर्व गोखले, तिलक, लाजपत राय कांग्रेस लीडर थे। मदनमोहन मालवीय, मोहम्मद अली जिन्ना, विपिन चन्द्र पाल, चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, एनिबेसेन्ट दूसरी पंक्ति के लीडर थे।
गांधी के पदार्पण पर इक्वेशन बदला। लोग गांधी को स्वीकारते गए... या कांग्रेस छो��़ते गए।
जिन्ना उन्हें स्वीकार न कर सके, मुस्लिम लीग में गए। हेडगेवार, मुंजे जैसे छुटभैये हिन्दू महासभा की तरफ बढ़े।
कुछ असहयोग आंदोलन करने से खफा होकर गए, कुछ आंदोलन रोकने से खफा होकर। कुछ कांग्रेस द्वारा चुनाव न लड़ने का फैसले की वजह से छोड़ गए।
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मांटैस्क्यू चेम्सफोर्ड सुधारो के बाद, स्टेट्स और सेंट्रल असेम्बली गठित होनी थी। नई दिल्ली में इसीलिए वो भवन बना, जहां कल तक संसद भवन कहा गया।
पर ये शोपीस असम्बलियाँ थी। अधिकार विहीन, तो गांधी ने ऑफर खारिज कर दिया।
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कई कांग्रेसी लड़ने को लालायित थे। तो चितरंजन दास ने बनाई- स्वराज पार्टी। इसमे गए मोतीलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस।
भविष्य में बंगाल के फेमस होने वाले मुख्यमंत्री सुहरावर्दी, बल्लभभाई पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल वगैरह। सब चुनाव लड़े, सभासद बने। जब भगतसिंह ने लोकसभा में बम फेंका, उस वक्त सभापति की चेयर पर विट्ठलभाई पटेल थे।
लेकिन ज्यादातर कांग्रेसी, गांधी के पक्के अनुयायी बने रहे। इसमे मोती का लड़का जवाहर भी था। वो बापू के साथ गया, बाप के साथ नही।
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1925 मे दास की मौत से स्वराज पार्टी का केंद्रीय सूत्र टूट गया। अधिकांश नेता कांग्रेस में लौट आये।
पर नेताओ के आने जाने, छोड़ने लौटने से,गांधी सदा बेपरवाह रहे। जनता से सीधा कनेक्ट था। गांधी नाम ही काफी था।
सुप्रीम लीडर की तरह, आगे पच्चीस साल, गांधी ने कांग्रेस को अपनी सोच पर चलाया। उसकी रीति नीति तय की - पूर्ण स्वराज्य, धर्म निरपेक्षता, अहिंसा, भाईचारा..
लेकिन खुद, केवल 1 बार अध्यक्ष रहे। 7
वही 1924- बेलगाम में।
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तो गांधी युग मे गांधी नही, तम���म दूसरी पंक्ति के नेता अध्यक्ष हुए। कई तो आप पहचानते नहीं।
सरोजिनी नायडू, श्रीनिवास अयंगर, मुख्तार अंसारी, मोतीलाल, जवाहरलाल, वल्लभभाई, मदनमोहन मालवेयर, नेली सेनगुप्ता, राजेन्द्र प्रसाद, सुभाष, अबुल कलाम आजाद, कृपलानी । कांग्रेस का अध्यक्ष विचार विमर्श, सर्वसहमति से चुना जाता। मगर अंतिम मुहर गांधी लगाते।
परम्परा बस एक बार टूटी, ज��� सुभाष ने दोबारा अध्यक्षी पाने के लिए चुनाव की नौबत ला दी।
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अध्यक्ष 1 वर्ष का होता। नेहरू, बल्लभभाई, राजेन्द्र प्रसाद रिपीट भी हुए। ये सारे अध्यक्ष, आजादी की लीडरशिप का पूरा तारामंडल, गांधी ने ही खोजा, पोसा, बढाया, मौके दिए।
कांग्रेस के अध्यक्ष ही नही, भारत का प्रधानमंत्री भी गांधी ने चुना।
बड़ा हल्ला है, गुस्सा है, क्षोभ है, की गांधी ने कांग्रेस की पसन्द, सरदार पटेल के स्थान पर नेहरू को चुना।
गहरा गुस्सा, बड़ा क्षोभ मुझे भी है।
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कौन नेहरू, किसलिये सरदार??
गांधी को अपने आपको चुनना था।
था कोई माई का लाल था कांग्रेस में??
या देश मे, या RSS में?
जो गांधी को पीएम बनने से रोक लेता।
अरे, जरूरत क्या थी किसी नेहरू या सरदार को चुनने की? नेल्सन मंडेला की तरह शान से खुद शपथ लेते-
"मैं, मोहनदास करमचंद गांधी , सत्यनिष्ठा से शपथ लेता हूँ कि.."
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फकीर आदमी शुरुआत में ही पीएम बन जाता। बढ़िया पोश����� पहनकर विदेश जाता। मेडिसन से वेम्बले तक, भाड़े के भांड, ढोल ताशे लेकर स्वागत करने आते। सोचिये, भारत का कितना डंका बजता।
काम धाम के लिए डिप्टी पीएम बना लेते, एक जिन्ना, एक नेहरू, एक सरदार। ज्यादा भी बना सकते थे। अंबेडकर को "दलित डिप्टी पीएम" बना लेते।
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बात मजाक सी लगती है। मगर गम्भीरता से सोचिये, की गांधी खुद ही प्रधानमंत्री क्यो नही बन सकते थे।
गांधी से आप, सिर्फ त्याग, दूसरो को दान देने की उ���्मीद ही क्यो करते हैं?फिर आप उम्मीद करते हैं, की वे नेहरू की जगह सरदार का ही चयन करें।
खुद को नही ?? क्योकि आप खुद मानते हैं कि वे तो संत थे। महात्मा थे।
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देखो भाई, या वो सरदार का हक मारने वाले "कुटिल राजनेता" थे।
या स्वयं की नैचुरल हकदारी छोड़ किसी युवा, योग्य प्रशासक को गद्दी सौंप देने वाले "निस्वार्थ संत" थे।
आप इन दोनों में कोई एक बात तय कीजिए।
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एक मजेदार विमर्श यह ��ो सकता है, कि वे खुद का चयन करते तो, प्रधानमंत्री मोहनदास कैसे प्रशासक साबित होते,
यह कोई नही बता सकता।
मगर एक चीज मैं बता सकता हूँ। प्राइमिनिस्टर गांधी को कोई सड़क छाप गोडसे, इतनी आसानी से..
"घर मे घुसकर" मार नही पाता।
[ADD TO AKHAND BHARAT]
Everybody knows that Columbus mistook America for India. But not many know exactly for how long. Here’s how Europe saw the New World long after Columbus was gone.
For perspective, Columbus got to America (not the mainland) in 1492.
[SPEED OF LIGHT IN VEDAS]
Okay, time to clear the air:
This comes from Sayana, a 14th c. Vedic scholiast, known for his commentaries on Rigveda. Here’s what he says:
तथा च स्मर्यते।
योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने।
एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते।