बेजुबान जानवरो की हत्या करने वालो भगवान से तो डरो,हाथ नहीं कांपते क्या ऐसा कृत्य करते इन लोगो के🥺🥺
कड़ी से कड़ी सजा मिले ऐसे लोगो को।#लीलसर_हिरण_शिकार_प्रकरण
भादरा की ये तस्वीरें दिल को झकझोर देने वाली है।कई वर्षों से वन्यजीव संरक्षणकर्ता सरकार से हिरणों को बचाने के लिए गुहार लगा रहे हैं लेकिन सरकार है की गहरी नींद से जागती ही नहीं।वर्तमान सरकार के मंत्रियों ने तो पेड़ लगाने को ही पर्यावरण संरक्षण मान लिया है।ओर मीडिया भी ऐसा कि कोई आवाज नहीं उठा रहा।बेसक पेड़ लगाइये पर अगर थार के वन्यजीवों को बचाने के लिए प्रयास नहीं किये गये तो ये विलुप्त हो जायेगें।वर्तमान मे कई गाँव बारिश को तरस रहे हैं जबकि मेरे गाँव के तालाब तीन बार पानी आ चुका है जो बारह गाँव के लोग पी रहे हैं कही ना कही इन वन्यजीवों की पुकार उपर वाला जल्दी सुनता है शायद इसलिए अगर ये वन्यजीव ही नहीं बचेगे तो इंसानों के करम इतने अच्छे रहे नहीं है कि भगवान बरसे उनके लिए।बहुत महत्वपूर्ण हैं ये वन्यजीव हमारे इकोसिस्टम में इसलिए @RajCMO@RajGovOfficial@BhajanlalBjp@Sanjay4India1@ForestRajasthan@JS_Bishnoi थार के वन्यजीवों के संरक्षण के लिए कठोर कदम उठाए अन्यथा वन्यजीव प्रेमियों के भारी विरोध का सामने करने को तैयार रहे।
इस मुद्दे पर सार्थक बहस हो...
अमर शहीद कीर्ति चक्र अंशुमान सिंह के माता-पिता ने जो अपनी पीड़ा रखी है, वह कहीं बेमतलब की बहस में उलझकर खत्म नहीं हो जाए। एक पक्ष है जो अंशुमान सिंह के माता-पिता की आलोचना कर रहा है। एक पक्ष है जो शहीद अंशुमान सिंह की वीरांगना की आलोचना में व्यस्त है। आइए, एक पक्ष इस मुद्दे पर सार���थक बहस करने के लिए भी तैयार करें।
मुद्दा ये है कि अंशुमान सिंह विवाह के महज पांच माह बाद ही वीरगति को प्राप्त हो गए। उन्हें मिलने वाले समस्त आर्थिक लाभ और कीर्ति चक्र उनकी पत्नी को मिला और कीर्ति चक्र प्राप्त करने के बाद उनकी पत्नी स्मृति सिंह उस कीर्ति चक्र सहित उनके परिवार को छोड़कर चली गई। अंशुमान सिंह को पाल-पोसकर बड़ा करने और काबिल बनाने वाले उनके माता-पिता मंजू सिंह और रवि प्रताप सिंह के पास अंशुमान सिंह की तस्वीरों और यादों के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि नॉमिनी होने के नाते स्मृति सिंह का उस पैकेज पर अधिकार था लेकिन उनके कुछ कर्तव्य भी थे जिन पर संभवत: उन्होंने ध्यान नहीं दिया। हमारे देश में बात सिर्फ अधिकार की होती है, कर्तव्यों की होती ही नहीं है। शहीदों के परिवारों को बहुत अच्छे आर्थिक पैकेज इसलिए दिए जाते हैं ताकि पीछे रह गया परिवार पूरे सम्मान के साथ जिंदगी जी सके और समाज को यह संदेश भी मिले कि शहीद के परिवार असहाय नहीं होते। खासतौर से कारगिल युद्ध और इसके बाद सर्वोच्च बलिदान देने वाले ज���ानों-अफसरों के परिजन आज बेहतरीन आर्थिक पैकेजेज के चलते शानदार जिंदगी जी रहे हैं, जिसके वे हकदार भी हैं। अब मामला टेक्निकल है। जब हम इंश्योरेंस करवाते हैं, नया खाता खुलवाते हैं, एफडी करवाते हैं तब फॉर्म में एक नॉमिनी का नाम भरा जाता है। इस दौरान मृत्यु होने पर जिसका नाम लिखा है, वह राशि उसको ही मिलती है। बिना किसी बहस के। क्योंकि नियम और कानूनों में भावनाएं नहीं होतीं। सिस्टम चलते भी तभी हैं, जब वे नियमों को फॉलो करें। लेकिन नियम बनाने वालों ने ऐसा सोचा नहीं होगा कि शहीद की पत्नी शहीद के माता-पिता को छोड़कर चली जाएगी। कारगिल युद्ध के बाद भी ऐसे मामले आए थे। कुछ युवा वीरांगनाओं को फिर से परिवार के ही किसी युवा ने अपना लिया था। जबकि कुछ केस अंशुमान सिंह जैसे भी थे, जिसके चलते सेना ने संभवत: नियमों में कुछ संशोधन किए भी थे। अभी किसी पर भी कोई आरोप लगाने या शहादत का अपमान करने जैसी बातें करने के बजाय सरकार से सिर्फ यही मांग की जानी चाहिए कि इस तरह के मामलों से जुड़े नियमों को फिर से देखा जाए। पत्नी भी निकटतम परिजन है और माता-पिता भी निकटतम परिजन ही हैं। ऐसे में शहीद को मिलने वाले पैकेज के उचित हिस्से किए जाने चाहिए और दोनों पक्षों में राशि का बंटवारा होना चाहिए। इसमें यह भी ध्यान रखा जाना जरूरी है कि शहीद के माता-पिता आत्मनिर्भर हैं या न��ीं? अगर माता-पिता शहीद की आय पर ही निर्भर हैं तो पेंशन का कुछ हिस्सा भी उनको मिलना चाहिए। यह नहीं हो सकता कि शहीद के माता-पिता सिर्फ अपने बे��े की शहादत पर गर्व ही करें और खाने के लाले पड़ जाएं। इस मामले को रक्षा मंत्रालय को अलग से देखते हुए अंशुमान सिंह के माता-पिता के लिए कुछ करना चाहिए और आगे के लिए ऐसी पुख्ता व्यवस्था की जानी चाहिए कि भविष्य में ऐसी असहज स्थितियां उत्पन्न नहीं होने पाएं। शहीद पूरे देश के लिए गौरव का विषय होते हैं लेकिन उनके बलिदान की कीमत उनके निकटतक परिजन ही चुकाते हैं। हम दूर बैठकर जज नहीं बनें तो ही अच्छा है।
@rajnathsingh @PMOIndia
#AnshumanSingh