उन का ये कहना सूरज ही धरती के फेरे क��ता है
सर-आँखों पर सूरज ही को घूमने दो ख़ामोश रहो
महबस में कुछ हब्स है और ज़ंजीर का आहन चुभता है
फिर सोचो हाँ फिर सोचो हाँ फिर सोचो ख़ामोश रहो
गर्म आँसू और ठंडी आहें मन में क्या क्या मौसम हैं
इस बगिया के भेद न खोलो सैर करो ख़ामोश रहो
रास्ते चाहे जितने दुर्गम हों, हमारे कदम नहीं रुकेंगे!
जोधपुर के ऊंचे रेतीले टीबों को चीरती हुई हमारी टीम हर बाधा पार कर मरीज तक पहुँची। बाइकें धंसीं, शरीर थका, पर हौसला नहीं ��ूटा। इलाज शुरू, अब बदलाव तय है!
#SocialWork #Humanity #NeverGiveUp #MentalHealthMatters
@elonmusk Elon, the translation tag on your Tesla Semi tweet says 'Translated from Turkish,' but the text is showing in Hindi. Is this a glitch or was it intentional?"
हमारे क्षेत्र के सेवाशिखर
ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया के साक्षात प्रमाण
मैं धन्यभागी हूँ कि #पद्मश्री स्वामी ब्रह्मदेव जी की स्नेहवर्षा का अनुग्रह दशकों से मिलता रहा है
हम सबके लिए आनंदमय गौरव के क्षण है
ये स्वामी जी को पुरस्कार नहीं है अपितु आज ये पुरस्कार ही धन्य हुआ है
@HeverCastroB तस्वीर में दिख रहा व्यक्ति वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो नहीं है, बल्कि अलैक्जेंडर कोटो (Alexandro Cotto) है, जिसे हाल ही में ड्रग तस्करी के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था।
आध्यात्मिक दृष्टि से नववर्ष केवल कैलेंडर की तारीख बदलना भर ही नहीं है, बल्कि यह स्वयं के स्वरूप को पहचानने और काल के बंधन से मुक्त होने का एक अवसर है।
समय (काल) माया की एक रचना है। जिस प्रकार हम स्वप्न में वर्षों का अनुभव कुछ ही मिनटों में कर लेते हैं, उसी प्रकार जाग्रत अवस्था का 'वर्ष' भी माया का एक हिस्सा है।
आदि शंकराचार्य 'दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्' में इसी सत्य को उद्घाटित करते हैं:
विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं,
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया।
अर्थात्, यह विश्व दर्पण में दिखने वाले नगर के समान है जो हमारे भीतर ही है, पर माया के कारण बाहर प्रतीत होता है।
इसको ही गुरबाणी यूँ कहती है:
जगतु मै झूठु करि मानिओ ॥
ज्यों सुपना अरु पेखना ऐसे इहु कउ जानिओ ॥
अर्थात्, मैंने इस संसार को मिथ्या मान लिया है। जिस प्रकार कोई स्वप्न या नाटक का खेल होता है, इस जगत को भी वैसा ही (परिवर्तनशील और नश्वर) जानो।
नववर्ष का 'काल' भी इसी मायावी दर्पण की एक लहर मात्र है।
हर नववर्ष हमें केवल यह याद दिलाता है कि समय तो निरंतर बह रहा है, लेकिन हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो अचल और शाश्वत है। मुख्य सार 'विवेक' से यह समझना है कि क्या स्थायी है और क्या अस्थायी है। वर्ष, महीने, दिन और हमारा शरीरादि ये सब परिवर्तनशील और अनित्य हैं।
‘विवेकचूडामणि' में इसी सत्य को स्पष्ट करते हुए कहा गया है:
न ह्यस्त्यभावो विदुषः स्वरूपतः
किन्त्वस्ति भावोऽनृतवस्तुयोगतः।
अज्ञानकल्पितस्यास्य विनाशो विद्यया भवेत्
न ह्यन्यथा कल्पितस्य विनाशे नित्यतोच्यते ॥
अर्थात्, अज्ञान द्वारा कल्पित असत्य वस्तु में नित्यता कहाँ? केवल आत्म-तत्व ही स्वयं सिद्ध और नित्य है।
इस नश्वरता के प्रति सचेत करते हुए इस पर गुरबाणी का फरमान है:
जो उपजिओ सो विणसि है परो आजु कै कालि ॥
नानक हरि गुन गाइ ले छाडि सगल जंजाल ॥
अर्थात्, जो भी पैदा हुआ है वह आज या कल नष्ट हो जाएगा। इसलिए सब जंजाल छोड़कर उस परमात्मा के गुण गाओ।
जो चैतन्य पिछले वर्षों और शताब्दियों में भी था और इस साल भी है, वही नित्य है। नववर्ष का सच्चा उत्सव तब है जब हम इस नश्वर समय ��े हटकर उस अविनाशी आत्मा की ओर मुड़ें।
गीता में भी इसी शाश्वतता की पुष्टि की गई है:
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
अर्थात्, यह आत्मा न कभी जन्मता है और न मरता है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के नष्ट होने पर भी यह नहीं बदलता। जब साधक इस अभेद अवस्था को अनुभव करता है, तब वह जान पाता है
यही संकेत गुरबाण��� कर रही है
ततु निरंजनु जोति सबाई सोहं भेदु न कोई जीउ ॥
अर्थात्, वह माया-रहित परमात्मा की ज्योति सभी में समाई हुई है; उस परमात्मा और मुझमें (सोहं) अब कोई भेद नहीं रह गया है।
‘नया’ होने का वास्तविक अर्थ है पुरानी गलतफहमियों, अहंकार और अज्ञान का त्याग करना।
जैसे ही आत्मज्ञान का उदय होता है, वैसे ही मनुष्य का आध्यात्मिक पुनर्जन्म होता है।
पुराने संस्कारों को छोड़कर वर्तमान क्षण में पूर्णतः जागृत होना ही वास्तविक नववर्ष है।
एक आम व्यक्ति इन संस्कारों को 'साक्षी भाव' से छोड़ सकता है।
जैसे ही हम विचारों के प्रति तटस्थ होते हैं, वैसे ही संस्कारों की शक्ति क्षीण होने लगती है।
गुरबाणी में मन को वश में करने का सूत्र दिया गया है:
मनु कुंचरु काइआ उदिआनै
माउतु सबदु अंकुसु सिरि धरिओ ॥
अर्थात्, यह मन एक हाथी के समान है जो शरीर रूपी जंगल में भटक रहा है; इसे गुरु के शब्द (ज्ञान) रूपी अंकुश से ही नियंत्रित किया जा सकता है।
जब हम स्वयं को शरीर और समय की सीमाओं से मुक्त अनुभव करते हैं, तब हम 'निर्वाणषट्कम' के इस भाव को जीते हैं:
न मृत्युर्न शंका न मे जातिभेदः,
पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥
बीता हुआ कल्पित वर्ष सुखद रहा हो या दुखद, हमें 'साक्षी भाव' में रहना सीखना होगा।
नववर्ष एक तटस्थ मोड़ है जहाँ हम पिछले अनुभवों से आसक्ति छोड़कर पूर्ण समर्पण के साथ भ��िष्य का स्वागत करते हैं। गुरबाणी के अनु��ार सच्चा समय वही है जो बोध में बीते:
सा रुति सुहावी जितु हरि चिति आवै ॥
सो माहु भला जितु नामु कमावै ॥
अर्थात्, वही ऋतु सुंदर है जिसमें ईश्वर याद आए और वही महीना भला है जिसमें सत्य के नाम की कमाई की जाए।
हर वह क्षण नववर्ष है जब आप यह अनुभव करते हैं कि आप समय के अधीन नहीं हैं, बल्कि आप वह चैतन्य हैं जिसमें समय बीत रहा है। यह केवल तिथि बदलने का नहीं, बल्कि दृष्टिकोण बदलने का पर्व है।
मुमुक्षु वही है जो हर अवसर पर आत्मचिंतन करके उसमें से जानने योग्य तत्व को पहचान ले
आंग्ल नववर्ष पर हम अपने स्वरूपबोध को प्राप्त हों यही मंगलकामना है
हरिॐ
जिसके कारण 6 अगस्त 1999 को हुई वो क्रूरतापूर्ण घटना भी शामिल है जब त्रिपुरा के धलाई जिले में कंचनछड़ा (या कंचनपुरा) से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीन वरिष्ठ प्रचारकों स्व. दिनेंद्रनाथ दे (उत्तर-पूर्वी क्षेत्रप्रचारक), स्व. सुधामय दत्ता जी (अगरतला विभाग प्रचारक), स्���. शुभंकर चक्रवर्ती (धलाई व उत्तर त्रिपुरा जिलों के प्रचारक), स्व. श्यामल कांति सेनगुप्ता (पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर के क्षेत्र कार्यवाह) का अपहरण ह��आ था।
इन्हें नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा नामक उग्रवादी संगठन ने अगवा किया। इसी प्लानर माँ-बेटे के भारत को व संघ को उत्तेजित आतंकित कर देने के प्लान के तहत इन्हें बांग्लादेश की सीमा पार ले जाया गया। NLFT ने शुरू में 2 करोड़ की फिरौती मांगी थी। संघ के साफ़तौर पर मना कर देने से चटगांव हिल ट्रैक्ट्स क्षेत्र में इन्हें दो-ढाई साल तक अमानवीय यातनाएं दी गईं और बाद में हत्या कर दी गई। हत्या की पुष्टि जुलाई 2001 में त्रिपुरा व भारत सरकार द्वारा हुई।
2024 में विदेशी फंडिंग से हुई छात्र क्रांति की आड़ में इरादा फिर से इनका शेख हसीना की हत्या का ही था मगर वहाँ की सेनाप्रमुख की (जो कि हसीना के रिश्तेदार भी थे) तत्परता भरी मदद से वे अपना जीवन सुरक्षित रख पाई। 5 अगस्त 2024 को प्रदर्शनकारियों ने जब हसीना के आवास को घेर लिया था तब सेना ने भी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। हसीना सेना के ही एक हेलिकॉप्टर से आनन-फ़ानन में एक-दो जोड़ी कपड़ों संग भारत भागीं (पहले अगरतला, फिर दिल्ली)। भारत ने पहले की तरह इस बार भी उन्हें शरण दी और सुरक्षित रखा।
अब ये महाशय फिर से 17 साल लंदन में भगौड़ा रहने के बाद दिखावटी नरम रुख अपना रहा है।
कल की रैली में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, शांति और कानून व्यवस्था पर जोर देकर कहता है ���ि BNP सरकार भारत से अच्छे संबंध चाहेगी, लेकिन अपने हिंडन एजेंडे को बांग्लादेश के हित का नाम दे देकर कहा कि पानी का हिस्सा, सीमा मुद्दे ही सर्वोपरि होंगे।
यानी मेरे प्रिय नेता की तरह येन केन प्रकरेण सत्तारूढ़ होने के चक्कर में देश की अच्छी भली अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने के बाद भी ये सुधरा नहीं है
मीडिया और BNP सपोर्टर्स में तारिक रहमान को अक्सर सिर्फ “खालिदा जिया का बेटा” या “BNP का एक्टिंग चेयरमैन” बताकर पेश किया जा रहा है, जैसे उनका बैकग्राउंड साफ-सुथरा हो।
लेकिन सच तो ये है कि वो जनरल जियाउर रहमान का भी बेटा है, जिसने BNP की नींव रखी और बांग्लादेश में भारत-विरोधी सेंटिमेंट्स को सबसे पहले संस्थागत स्तर पर हवा दी
पाकिस्तान/चीन से निकटता, और अवामी लीग को कमजोर करने की पॉलिसी को फ़ालों करने वाला लंदन में 17 साल (2008 से 25 दिसंबर 2025 तक) “एक्साइल” के नाम पर पल��े पोसने वाले ये महाशय अब वापस आकर “इनक्लूसिव लीडर” बनने की कोशिश कर रहे हैं
सभी धर्मों की बात, शांति, यूनिटी, और “I have a plan” जैसे मार्टिन लूथर किंग स्टाइल स्लोगन गढ़ रहे है लेकिन पुराना रिकॉर्ड तो छिप नहीं सकता
अब ये “वेस्टर्न ग्रूमिंग” वाली थ्योरी – US/UK का “पप्पू” फ���ल हुआ तो “ब्रिटिश पोपट” भेजा ये काफी सर्कुलेट हो रही है विश्व व भारतीय राष्ट्रवादी सर्कल्स में।
मलाला यूसुफजई से कंपैरिजन भी मीडिया में आम है कि वेस्ट ने उसे ग्रूम किया, नोबेल दिया, हीरो बनाया, लेकिन पाकिस्तान में उसे रिजेक्ट कर दिया गया और अब लंदन में ही है।
तारिक को भी MI6/BBC जैसी “प्रोपगैंडा विंग” से पुश मिल रहा है BBC ने उन्हें “PM फ्रंट-रनर” कहा, रिटर्न को हाइलाइट किया, और पहले इंटरव्यू भी BBC Bangla को दिया है
कॉमनवेल्थ और सबकॉन्टिनेंट में BBC का इन्फ्लुएंस तो सदा से है ही, वो इसकी “लिबरल-डेमोक्रेटिक” इमेज बना रही है, जबकि जमात जैसे ऑप्शन के मुकाबले BNP को “बेहतर” बता रही है ये सब डायरेक्ट US/UK प्लान है
दिखने में सारी मीडिया कवरेज तो न्यूट्रल लग रही है (Reuters, Al Jazeera, NYT सबने रिटर्न कवर किया, तय एजेंडा के तहत PM कैंडिडेट बताया)।
तारिक का लंदन रहना राजनीतिक केसों से बचने के लिए था, और अब युनुस गवर्नमेंट में केस क्लियर हो गए मगर ये वाली नरम इमेज “ग्रूमिंग” जैसी लगती है, ताकि फरवरी 2026 इलेक्शन में BNP को पावर मिले और पुराना एंटी-इंडिया एजेंडा पानी सीमा मुद्दों के नाम पर वापस आए।
भारत में कई चरणचाटु वामपंथी मीडिया रिपोर्ट्स में इसे भारत के लिए “अच्छी खबर” बताया गया है, क्योंकि उनको जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी व��कल्पों की तुलना में BNP अधिक उदार और लोकतांत्रिक लग रही है।
यह पोस्टर केवल बांग्लादेश के सड़कों पर ही नहीं, बल्कि फेसबुक और एक्स (ट्विटर) पर भी व्यापक रूप से वायरल हुआ है।
जो कि इसके इरादों व वास्तविक चेहरे को उजागर करता है
बांग्लादेश की राजनीति में BNP
और
तथाकथित प्रिंस तारिक रहमान का इतिहास
इस तथाकथित प्लानर का बाप पाकिस्तान के इशारों पर बंगबंधु ��ेख मुजीबुर रहमान के परिवार के 20 लोगों की हत्या में फ़ौजी अफ़सरों को शह देने व अप्रत्यक्ष रूप से उस जघन्य नरसंहार में शामिल रहा था।
बांग्लादेश के इतिहास में फौजी तानाशाह जियाउर रहमान द्वारा स्थापित BNP को सदा से भारत-विरोधी माना जाता है।
जियाउर रहमान, जो फ़ौजी तानाशाही के बाद चार-पाँच साल राष्ट्रपति भी रहा (1977-1981), उसने शुरूआत से ही भारत से दूरी बनाई, क्योंकि 1971 की आजादी के बाद भारत के साथ शेख मुजीबुर रहमान की निकटता थी। जिनकी उसने पश्चिमी देशों, चीन और पाकिस्तान के उकसावे पर हत्या करवा दी। सो भारत से उसके संबंध पूरी तरह से ठंडे रहे।
बड़े टकराव भी नहीं हुए क्योंकि इतनी औक़ात न तब थी न अब है। अधिकांशतः रिपोर्ट्स में उन्हें भारत से सतर्क रहने वाला पूर्वाग्रही बताया गया।
जियाउर रहमान ने संविधान से सेकुलरिज्म हटाकर इस्लामी सिद्धांत जोड़े और धर्म-आधारित पार्टियों को अनुमति दी। “धर्म��िरपेक्षता” शब्द हटाकर ‘बिस्मिल्लाह-अर-रहमान-अर-रहीम’ शब्द जोड़े। “बांग्लादेशी राष्ट्रवाद” पर जोर दिया।
इससे हिंदुओं के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी क्योंकि राष्ट्र की पहचान अधिक इस्लामिक होने लगी। उस कसाई के समय में ‘Vested Property Act’ (शत्रु संपत्ति कानून) का उपयोग हिंदुओं की जमीनें छीनने के लिए किया गया, जिसके कारण बड़ी संख्या में हिंदुओं का पलायन हुआ।
कुल मिलाकर, उसका रुख पूर्णतः इस्लामीकरण की ओर था, लेकिन बड़े पैमाने पर हुई हिंसा की मीडि��ा कवरेज नहीं होने दी गई।
बाद में इसकी माँ खालिदा जिया प्रधानमंत्री रही (1991-96 और 2001-06 तक)। उनके शासन में भारत संबंध सबसे तनावपूर्ण रहे।
उनके शासन में, खासकर 2001-06 में जमात के साथ गठबंधन के कारण, हिंदुओं पर सबसे ज्यादा हमले हुए।
2001 चुनाव के बाद हजारों घटनाएं – मंदिर तोड़े गए, घर लूटे गए, महिलाओं पर अत्याचार हुए। वहाँ के हिंदू नेता इसे BNP-जमात की सुनियोजित कार्रवाई बताते हैं। उस दौरान तारीक रहमान को सत��ता का सबसे शक्तिशाली केंद��र माना जाता था। तब हिंदुओं पर हुए हमलों में उनकी चुप्पी या कथित सहभागिता के कारण हिंदुओं के बीच उनकी छवि बहुत खराब रही।
Amnesty International और US State Department की रिपोर्ट्स में इसे BNP-जमात समर्थकों से जोड़ा गया, क्योंकि हिंदू अक्सर अवामी लीग को वोट देते थे।
कुछ पुरानी रिपोर्ट्स में तारिक पर हिंदू धर्मग्रंथों के बारे में विवादास्पद टिप्पणियां (जैसे पोर्नोग्राफिक बताना) का आरोप लगा, जो इसका एंटी-हिंदू रुख दिखात��� है। सभी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में इसे अल्पसंख्यकों का भयावह उत्पीड़न करने वाला कहा गया।
हालांकि 1991 में भी काफी हमले हुए थे मगर मीडिया मैनेज कर लिया गया। चुनाव से पहले कभी-कभी मंदिर विजिट करके हिंदुओं को लुभाने की कोशिश की।
तब इन माँ-बेटे की शह पर उत्तर-पूर्वी भारत के उग्रवादी समूहों को खुलेआम पनाह दी गई। तारीक रहमान जब सत्ता में शक्तिशाली था तब भारत उन्हें एक सुरक्षा खतरा मानता था।
2004 ��ें बांग्लादेश के चटगांव में पकड़े गए ‘10 ट्रक हथियारों’ का मामला सबसे चर्��ित रहा था। भारत का दावा था कि ये हथियार ISI की मदद से भारतीय विद्रोहियों के लिए भेजे जा रहे थे और इसमें तारीक रहमान का पूरा हाथ था।
2004 में ही इन प्लानर माँ-बेटे ने शेख हसीना की रैली पर ग्रेनेड हमले कर नरसंहार की साजिश फिर से रची थी। उस मामले में हाल ही में युनुस की कठपुतली अदालत ने बरी (Acquit) कर दिया है।
फेलानी खातून हत्या का अनावश्यक बवंडर रचा जो कि घुसपैठिया एक बांग्लादेशी लड़की थी जो BSF की गोली से मारी गई। पानी बंटवारा जैसे मुद्दों पर अनावश्यक मतभेद, सीमा विवाद सहित सबसे बड़ी बात ये कि उन उग्रवादियों को पनाह दी थी जो प्रचंड भारत विरोधी व बांग्लादेशी सरज़मीं से हिन्दू विरोधी आतंकवादी गतिविधियाँ चलाते थे।
शेष भाग रिप्लाई सेक्शन में पढ़िएगा 👏
शिकायतों और सियासतों की भी एक उम्र होनी चाहिए,
आदमी को एक टाइम पे बस आदमी होने की फ़िक्र होनी चाहिए।
पीवी नरसिम्हा राव की मृत्यु के बाद हुई घटनाएं भारतीय राजनीति के एक दुखद अध्याय को उजागर करती हैं।
विनय सीतापति की किताब “Half Lion: How P.V. Narasimha Rao Transformed India” में वर्णित विवरण से और परिवार के सदस्यों के बयानों से यह स्पष्ट है कि राव साहब के पार्थिव शरीर के साथ भी पार्टी का व्यवहार बेहद ठंडा और अपमानजनक रहा।
23 दिसंबर 2004 को राव साहब का निधन एम्स में हुआ पूरा परिवार व हजारों लोग दिल्ली में अंतिम संस्कार चाहते थे क्योंकि दिल्ली ही तो उनकी कर्मभूमि थी मगर कांग्रेसी गुलामों (शिवराज पाटिल, गुलाम नबी आजाद, और बाद में वाईएस राजशेखर रेड्डी) ने परिवार को हैदराबाद ले जाने के लिए मनाने की कोशिशें की
YSR रेड्डी के इस आ��्वासन पर कि “भव्य सम्मान और मेमोरियल बनेगा” इस आश्वासन से परिवार अंततः मान गया
इस घटना से पहले कांग्रेस के सभी पूर्व प्रधानमंत्रीयों के शव को कांग्रेस मुख्यालय (24 अकबर रोड) ले जाने की परंपरा थी, ताकि कार्यकर्ता श्रद्धांजलि दे सकें लेकिन 24 दिसंबर को गेट ही नहीं खोला गया तोप गाड़ी आधे घंटे से ज्यादा बाहर खड़ी रही एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने साफ साफ़ कहा, “गेट नहीं खुलता” किताब में लिखा है कि सि���्फ एक व्यक्ति यानी सोनिया गांधी का आदेश होता तो खुलता लेकिन वह आदेश नहीं आया।
मनमोहन सिंह ने बाद में लीपा पोती करने के लिए कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी।
खैर शव हैदराबाद ले जाया गया, जहां अंतिम संस्कार हुआ। सोनिया गांधी वहां भी नहीं गईं।
दिल्ली में जिस भव्य मेमोरियल का वादा हुआ, लेकिन लंबे समय तक नहीं बना (बाद में 2015 में एक साधारण स्मृति स्थल बना)।
राव के साथ क्यों हुआ ऐसा?
क्योंकि सोनि��ा गांधी राजीव गांधी हत्याकांड की जांच में धीमापन , चंद्रास्वा��ी से निकटता (जिन पर राजीव हत्याकांड में संदेह था) , बाबरी मस्जिद विध्वंस (1992) और सबसे बड़ी बात ये थी कि राव ने ग़ुलामी न करके गांधी परिवार से दूरी बनाई और पार्टी को स्वतंत्र रूप से चलाया इन सब के लिए सोनिया उन्हें जिम्मेदार ठहराती थीं।
यह भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण है, जहां अपनी ही पार्टी ने एक पूर्व प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के साथ मृत्यु के बाद भी ऐसा व्यवहार किया।
वास्तव में र��व ने ही भारत को आर्थिक संकट से निकाला, उदारीकरण की नींव रखी, लेकिन कांग्रेस ने हमेशा अपने पालतू मनमोहन को ही इसका श्रेय दिया सोनिया का राजनीतिक बदला उन्हें जीवन और मृत्यु दोनों में महंगा पड़ा।
मोदी सरकार के द्वारा 2024 में उन्हें भारत रत्न मिला, जो देर से ही सही, उनके योगदान की मान्यता है। उनके सुधारों को याद रखते हुए और राजनीति में ऐसी कड़वाहट से कुछ सीखते हुए उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा��जलि
ओम शांति 🙏
सिक्किम ने 2003 से जैविक मिशन चलाकर पूरे राज्य को रासायनिक मुक्त बनाया आज वहाँ के किसान लगभग कर्जमुक्त हैं वहाँ की खेती देखने संसार भर के लोग आते हैं सो पर्यटन से आय बढ़ी।
लखीमपुर (UP) में भी किसानों ने 100 एकड़ बंजर जमीन को 2 साल में उपजाऊ बनाया, जैविक तर���के से कई छोटे किसानों ने कम्पोस्ट खाद और फसल चक्र अपनाने से करोड़पति बने
हरियाणा में एलनाबाद के पास एक गांव है “काशी का बास” जहां से आश्रम का गेहूँ ख़रीदा जाता है उस किसान के साठ किल्ले खेत में पिछले बीस साल से कोई खाद या पेस्टीसाइड उपयोग नहीं हुआ
तात्कालिक सुख” की स्थिर सुख ही समृद्धि है भारत में लाखों किसान जैविक खेती अपनाकर क��्जमुक्त हो चुके हैं। अगर किसान मेहनत करें और सरकार समर्थन दे, तो यह संभव है। इससे न सिर्फ किसान मजबूत होंगे, बल्कि देश की मिट्टी, पानी और अर्थव्यवस्था भी स्वस्थ रहेगी।
मकान सिंपल बना लो मगर खेती में काम आ सके ऐसे बड़े शैड ज़रूर बनाओ ताकि आपकी निकाली गई फसल , पशुधन व उपकरणों को सुरक्षित रखा जा सके
नदी नहरों में आने वाले औद्योगिक कचरे के कारण खेतों व शहरों में पीनेवाले बरसाती पालर पानी की पर्याप्त गहराई वाली डिग्गी हर घर के लिए आज अत्यावश्यक हो गई
कर्जमाफी या कैश ट्रांसफ़र का धीमा ज़हर
चार्वाक दर्शन का यह प्रसिद्ध श्लोक “यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्” जीवन को भौतिक सुख से जीने और कर्ज लेकर भी ऐशोआराम करने की बात करता है, क्योंकि ��े मानते मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता चुकाना भी पड़ा तो पीढ़ियाँ चुकाती रहेंगी
वास्तविकता में कहीं न कहीं यह विचार किसानों के संदर्भ में कर्जमाफी की संस्कृति को जन्म देता है, जो एक धीमा ज़हर (slow poison) की तरह काम करता है।
किसान सोचते हैं कि कर्ज लो, कोठी बनाओ , बोलेरो या जरूरत से ज़्यादा बड़े ट्रेक्टर ले लो , सुख भोगो, और चुनावी मौसम में तो माफी मिल ही जाएगी लेकिन यह लंबे समय में किसानों को निर्भर, कर्जदार और नैतिक रूप से कमजोर बनाता है।
घोषणापत्रों में कर्जमाफी की कैश ट्रांसफ़र की घोषणाएं केवल और केवल सत्ता पाने के राजनीतिक हथियार भर हैं, जो तात्कालिक रूप से तो राहत देती हैं लेकिन लंबे समय में अर्थव्यवस्था, किसानों और समाज को खोखला कर देती हैं।
2025 तक के आंकड़ों और रिपोर्ट्स से स्पष्ट है कि यह “घृत पीने” की लत की तरह है जो शुरू में मीठा, बाद में घातक परिणाम यानी रागा जैसे नेताओं के चुनाव��� भाषण व 1 2 3 4 5 6 7 8 9 जैसी गिनती सुन कर किसान कर्ज चुकाने की आदत छोड़ देते हैं, इस उम्मीद में कि चुनावों में तो पक्का ही क़र्ज़ माफी मिलेगी।
आरबीआई की रिपोर्ट् है कि पिछले दशक में 18 राज्यों में कर्जमाफी से कृषि बैंक एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) 30-85% बढ़ गए।  इससे किसान नए कर्ज तो ले लेते हैं, लेकिन उत्पादकता नहीं बढ़ती, पैसा धीरे धीरे शादियों, ट्रैक्टरों या ऐशोआराम पर खर्च होता जाता है परिणामस्वरूप किसान फिर कर्ज के अंतहीन जाल में फंसत��� हैं, और आत्महत्या के मामले बढ़ते हैं।
आत्महत्या के कई मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया कि कर्जमाफी से किसानों में तनाव बढ़ा, क्योंकि लंबे समय तक क़र्ज़ न चुकाने की आदत कोई फायदा नहीं अपितु अवसाद में धकेल देती है
बैंकों और क्रेडिट सिस्टम पर बोझ बनी कर्जमाफी से बैंकों की रिकवरी गिरती है, जिससे वे ज़रूरी छोटे कृषि लोन देने में कंजूसी करते हैं।
2025 में कृषि लोन कुल ₹28 लाख करोड़ पार हो गए, लेक���न वोटों के लालच में की गई कर्जमाफी के कारण औप��ारिक क्रेडिट सिकुड़ रहा है और किसान अनौपचारिक साहूकारों (उच्च ब्याज) की ओर मुड़ते हैं। 
आरबीआई ने 2024 में चेतावनी दी थी कि कर्जमाफी जैसे सब्सिडी पर बढ़ते खर्च से राज्य सरकारों की विकास परियोजनाएं प्रभावित हो रही हैं।  राजस्व घाटा बढ़ता है, और पूंजीगत व्यय (infrastructure) में 1/3 कटौती होती है। 
कर्जमाफी से आर्थिक और सामाजिक क्षति ही होती है किसान आत्मनिर्भर नहीं बनते वे चुनावी वादों पर निर्भर हो जाते हैं।
अगर वाकई सरकारें प्रोत्साहन ही देना चाहती हैं तो उन किसानों को देंवें जो क़र्ज़ समय पर लौटाते हैं सारी स्कीमें, सब्सिडीयों , बड़े शैडों के पात्र वही लोग हैं ताकि बाकी लोग भी प्रेरित हों
आरबीआई की 2025 रिपोर्ट में कहा गया कि किसान फसल की बिक्री से सिर्फ 40-67% मूल्य ही पाते हैं, बाकी बिचौलिए ले जाते हैं। 
इससे मुद्रास्फीति बढ़ती है, और ईमानदार किसान हतोत्साहित हो यह सोचते हैं कि “ईमानदारी का क्या फायदा?” नेता खा रहे हैं हम भी भी खाएँगे परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता गिरती है, अत्यधिक रासायनिक खेती से मिट्टी बंजर होती है और किसान स्वास्थ्य समस्याओं (कैंसर, किडनी फेलियर) का शिकार होते हैं।
कई आर्थिक अध्ययनों में यह भी पाया गया कि कर्जमाफी किसानों को फिर से कर्जदार बनाती है, क्योंकि खेती से रिटर्न कम रहता है।  कुल मिलाकर चुनावी लोकलुभावन के चक्कर में यह धीमा ज़हर किसानों को “हरामखोर” बनाने की प्रक्रिया है, पहले क���्ज लो, सुख भोगो, लेकिन अंत में सब तबाह कर लो पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में यह स्पष्ट है, जहां प्रति किसान कर्ज ₹2-3 लाख से शुरू होकर आत्मघात करने की सीमा तक पहुंच गया है कर्जमाफी किसानों का मसीहा नहीं अपितु कुर्सी पाने को विशुद्ध राजनीतिक चुनावी चाल है, जो देश की अर्थव्यवस्था पर ₹ लाखों करोड़ का बोझ डालती है।
कर्जमाफी की चाह में नवाचारों के रूप में फसल विविधीकरण नहीं होता, पानी की कमी बढ़ती है, और पर्यावरण नष्ट होता है।
सरकार द्वारा कर्ज की व हर साल कैश ट्रांसफ़र बढ़ा देने की लत छोड़कर, किसान मेहनत, योजना और स्थिरता पर फोकस करके आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
जहरमुक्त ��तलब जैविक खेती (रासायनिक मुक्त), कर्जमुक्त मतलब समय पर चुकाना और निर्भरता कम करना, और आत्मनिर्भर मतलब आय बढ़ाना और खर्च नियंत्रित करके खेती में सिक्किम का मॉडल लक्ष्य बना कर कदम-दर-कदम जैविक खेती अपनाएँगे तो अपने परिवार व गांव को जहरमुक्त कर पाएंगे