शीर्षक: 🚨 जर्जर भवनों में दांव पर बच्चों का भविष्य!
कसमार प्रखंड के सुदूरवर्ती मध्य विद्यालय, हिसीम से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। यहाँ यूकेजी (UKG) से लेकर आठवीं कक्षा तक के 131 छात्र-छात्राएं महज 5 जर्जर कमरों में पढ़ने को मजबूर हैं।
मुख्य समस्याएं:
• हादसे का डर: दीवारों का प्लास्टर जगह-जगह से झड़ रहा है और भवन खंडहर में तब्दील हो रहा है।
• करंट का खतरा: बारिश के दिनों में दी���ारों में नमी (सीपेज) के कारण करंट उतरने की शिकायतें आ रही हैं।
• रास्ते की दिक्कत: बारिश में स्कूल के दोनों भवनों के बीच पक्का रास्ता न होने से बच्चों और शिक्षकों को खेत की मेड़ से होकर गुजरना पड़ता है।
• सुविधाओं का अभाव: स्कूल में लाइब्रेरी की किताबें तो हैं, पर उन्हें रखने की जगह नहीं है। साथ ही कंप्यूटर और लैब की भी कोई सुविधा नहीं है।
• सुरक्षा का अभाव: चारदीवारी (बाउंड्री वॉल) न होने और प���ाड़ी व जंगली क्षेत्र होने के कारण जंगली जानवरों का हमेशा डर बना रहता है।
प्रशासन (डीएसई) का कहना है कि तकनीकी टीम को ऐसे विद्यालयों को चिन्हित कर प्राक्कलन तैयार करने को कहा गया है और डीएमएफटी (DMFT) फंड से नए भवन बनाए जाएंगे।
लेकिन सवाल यह है कि जब तक यह कागजी प्रक्रिया पूरी होगी, तब तक इन मासूम बच्चों की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?
शिक्षा व्यवस्था में सुधार सिर्फ दावों में नहीं, धरातल पर दिखन��� चाहिए! 🙏 @HemantSorenJMM @JharkhandCMO @YogendraGomia @BokaroDc #jharkhand #kasmar #hissim #educationsystem
बच्चों को स्कूल जाने के लिए पुल नहीं, लकड़ी के खतरनाक जुगाड़ पर चलना पड़ रहा है।
बारिश के दिनों में नाले का प���नी बढ़ जाता है, जिससे करीब 200 बच्चों को जान जोखिम में डालकर स्कूल पहुंचना पड़ता है। हालात इतने खराब हैं कि शिक्षकों को खुद लकड़ी का अस्थायी पुल बनाना पड़ा।
सवाल सिर्फ एक पुल का नहीं, बच्चों की सुरक्षा और उनके शिक्षा के अधिकार का है।
अगर किसी दिन यह अस्थायी पुल टूट गया और कोई बड़ा हादसा हो गया, तब जिम्मेदारी कौन लेगा?
सरकार और प्रशासन से मांग है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए यहां तत्काल पक्का पुल बनाया जाए।
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जब राज्य का सारा पैसा फिजूल खर्च मे बर्बाद किया जा��गा,तो school पर सरकार ध्यान क्यो देगी?
@HemantSorenJMM को जनता ने 10 साल मौका दिया है,अगर वे चाहते तो किसी भी एक क्षेत्र चाहे शिक्षा या स्वास्थ्य के क्षेत्र में कीर्तिमान हासिल कर सकती थी,लेकिन अफसोस है।
@BokaroDc
@Iprd_Bokaro
झारखंड के बोकारो जिला अंतर्गत कंडेर गांव में उच्च विद्यालय न होने के कारण हमारे नौनिहालों का भविष्य दांव पर है। यहाँ के सैकड़ों बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर रोजाना जंगल, पहाड़ और नदियां पार करके बड़की डुंडी (रामगढ़) पढ़ने जाना पड़ता है। तस्वीर और वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस प्रकार मासूम बच्चे दुर्गम रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं। ऐसे में जंगली जानवरों के हमले या किसी भी अप्रिय घटना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
क्या झारखंड के बच्चों को शिक्षा पाने के लिए हर दिन संघर्ष करना पड़ेगा? माननीय श्री @HemantSorenJMM@JharkhandCMO@YogendraGomia@BokaroDc से विनम्र आग्रह है कि इस गंभीर समस्या का संज्ञान लें और कंडेर में जल्द से जल्द उच्च विद्यालय की स्थापना कराई जाए, ताकि हमारे बच्चे सुरक्षित माहौल में शिक्षा प्राप्त कर सकें।
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