VIDEO | Delhi: BJP Rajya Sabha MP Manan Mishra says, "If boycotting, spreading anarchy, and misleading the public are all that remain of the opposition's job, then the public has already shown them their place long ago. That is why they are sitting in the opposition, and will remain so for the rest of their lives. Today, the government has taken such a massive and commendable step. With this new law enacted against paper leaks, no one will dare to attempt it anymore. It contains provisions for such stringent punishments that no one will even dream of paper leaks or using any unfair means in any examination. This thought never crossed Congress'mind in 70 years of their rule, during which paper leaks happened continuously. Under the leadership of Prime Minister Modi ji, this bill was brought for the welfare of students."
(Full video available on PTI Videos - https://t.co/bIyFWTfmBd)
विरो��कांनी हरायचा निश्चय केला असेल तर मतदारांना दोष देण्यात अर्थ नाही. मविआच्या नेत्यांनी आधी जागावाटप लांबवलं आणि आज शेवटी ज्या याद्या जाहीर झाल्यात त्यातून उध्दव ठाकरे यांच्या शिव सेनेचा अति आत्मविश्वास, शरद पवार राष्ट्रवादी पक्षाच्या नेत्यांचे काड्या करण्याचे उद्योग आणि
आज आरती म्हणत आहात,
उद्या नारळ फोडाल,
परवा नवस बोलाल,
नंतर अंगात येईल,
मग भोंदू महाराज येतील,
मग कर्तुत्वाला चमत्कार समजून,
तुम्ही एका दैदीप्यमान पुरुषाच्या कर्तुत्वावर पाणी फेराल...
भविष्यातील हा संभाव्य धोका ओळखून,
तात्काळ शिवरायांची आरती म्हणणे थांबवले पाहिजे.
काल शिवजन्मोत्सवी अनेक ठिकाणी पंचारती, कापूर अगरबत्ती लावून,आरतीचे ताट ओवाळत शिवरायांची आरती म्हणण्यात आली..
हे थांबले पाहिजे...
भविष्यातील पिढीला आपण कोणते शिवराय देऊ इच्छितो...चमत्कारिक देव की कर्तृत्ववान महापुरुष..!
कारण एकदा दैवतीकरण झाले म्हणजे शिवरायांचा समग्र पराक्रम केवळ चमत्कारातून घडला,
असे म्हणायला येथील भोंदूबुवा कमी करणार नाहीत...
शिवाय आपल्याकडे 33 कोटी देव असताना, अजून एखाद्या देवाची आवश्यकता ती कशासाठी..?
मागे एका चित्रकाराने शिवरायांना अनेक हात असणारे चित्र रेखाटून शिवरायांचे दैवतीकरण करण्याचा प्रयत्न केला होता. काही मोठ्या राजकीय पुढाऱ्यांनी त्या चित्राचे भरभरून कौतुक देखील केले होते.
नेमके हे सर्व कशासाठी..?
शिवराय हे देव नाहीत..
शिवराय महामानव आहेत, महापुरुष आहेत.
मन, बुद्धी आणि मनगटाच्या बळावर, स्वकर्तृत्वातून, पराक्रमातून, संघर्षातून शिवरायांनी निर्माण केलेल्या दैदिप्यमान इतिहासामुळे शिवराय हे एखाद्या चमत्कारिक देव-देवतांपेक्षा निश्चितच कैक पटीने श्रेष्ठ ठरतात...
अगदी प्रबोधनकार ठाकरे यांच्या भाषेत सांगायचे तर,
अगदी 33 कोटी देवांची फलटणही शिवराय���ंच्या नावासमोर फिकी पडते..
तेव्हा अकारण, भावनेच्या भरात दैवी संकल्पनेच्या दृष्टिकोनातून शिवरायांना पाहणे थांबवावे...
शिवराय हे जागतिक कीर्तीचे, महापराक्रमी महापुरुष,महामानव आहेत....!!
महत्वपूर्ण सूचना : शिवरायांच्या आरतीला पर्यायी जिजाऊ वंदना म्हणावी...
जय जिजाऊ जय शिवराय 🚩
✍️ स्वप्निल श्रीमंत घुमरे
( छत्रपती संभाजी नगर )
#साभार
अपने खून पसीने से देश को सींचा, 9 साल जेल में रहे, पूरी संपत्ति देश को दान कर दी, उन नेहरू पर सवाल उठाए जाते हैं।
नेहरू कितने बड़े हिंदू थे, इस वीडियो में देखिए, लेकिन वो दूसरे धर्मों का भी उतना ही सम्मान करते थे, और उनके हिंदू होने से दूसरे धर्म के लोगों को डर नहीं लगता था।
राममंदिराच्या पायऱ्यांवर संविधानाचे रक्त!
हिंदूंच्या पाचशे वर्षांच्या स्वप्नाची पूर्तता झाल्याबद्दल उत्सव करताना, या सरकारने देशाच्या संविधानाचा वेळोवेळी केलेला खून स्वतःला हिंदू मानणारा कोणीही विसरू शकणार नाही. माफ करणं तर दूरच.
१५ लाखांचा जुमला, किसानांचे आंदोलन, महिला कुस्तीपटूंची वेदना, २ कोटी जॉब्सचं आश्वासन, वाढणारी सांप्रदायिकता, उद्योगपतींचे पाय चाटणें... उधळलेल्या गुलालाखाली यातलं काहीही लपणार नाही... आम्ही लपू देणार नाही... राम कसम!!!
#AmolKolhe #LokSabha #RamMandir #NCP #Maharashtra @kolhe_amol
��ाप्पू, हे असं नसतं करायचं.. मारलं की मरायचं !!
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेते, प्रतिभावंत अभिनेते, अतुल कुलकर्णी यांनी राष्ट्रपिता महात्मा गांधींवर लिहिलेली, काळजाला भिडणारी ही कविता गांधीजींच्या दर स्मृतिदिनाला प्रत्येक भारतीयाने ऐकायला आणि आपल्या स्नेहीजणांना ऐकवायलाच हवी.
मरते हम तुम है, गांधी कभी मरते नहीं!
राष्ट्रपिता महात्मा गांधींना स्मृतिदिनानिमित्त विनम्र अभिवादन !!
#mahatmagandhiji #RashtrapitaMahatmaGandhi
#Gandhiji #Gandhi
फड़ मारने में हम पहले नंबर पर आ गए... फड़ मारकर ही हमारा देश हांका जा रहा है, जिसमें झूठा और बेमतलब का गर्व भक्तों के भीतर भरकर लूट का बड़ा तंत्र चलाया जा रहा है.
बधाई हो .. फड़ मारने में हम विश्वगुरु हो गए.
1947 का मशहूर किस्सा है..
पार्टीशन की बेला थी, भारत आजाद हो चुका था, और नेहरू प्रधानमंत्री थे। दिल्ली सापेक्षिक रूप से शांत था, मगर अचानक से फिजां बदल गई।
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किसी जगह मुसलमानो के द्वारा हिन्दुओ पर आक्रमण की अफवाह से गुस्सा हिन्दू टोलियां भी निकल आयी।
कनॉट प्लेस में मुलसमानों की दुकानों को लूटा जाने लगा, भीड़ हिंसा पर उतारू थी।
जवाहरलाल, उसी तरफ मार्ग से गुजर रहे थे। इसी समय किसी युवक को भीड़ ने घेर लिया, और हमला करने को थी, की मोटर से कूदकर जवाहरलाल बीच मे आ गए।
भीड़ को ललकारा। भीड़ नेहरू को पहचान कर सहम गई और भागना शुरू कर दिया। तब तक पुल��स भी आ गयी। नेहरू ने खुद एक लाठी ली और दंगाइयों को दौड़ा लिया।
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इस घटना का विवरण अकबर पटेल ने "मेनी फेसेस ऑफ नेहरू' में लिखा।
अमेरिकन जर्नलिस्ट नॉर्मन कजिन्स ने भी इस घटना पर आर्टिकल लिखा था। गूगल पर नेहरू के और भी इस ��रह के घटनाक्रम हैं।
गांधी फ़िल्म का वह सीन कैसे भूल सकते है, जिसमे बंगाल में एक मुस्लिम के घर अनशन पर पड़े गांधी के सामने भीड़ में कोई उन्हें मारने का नारा उछालता है।
नेहरू कूदकर आगे आते है- किसने कहा, आओ, पहले मुझे मारो।
और भीड़ में सन्नाटा पसर जाता है।
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असाधारण नेतृत्व के उभरने के लिए असाधारण दौर भी होना चाहिए। नेहरू को वह दौर मिला।
राहुल भी आजादी के बाद के सबसे कठिन दौर मे अपनी भुजाओ�� का बल तोल रहे हैं।अपनी हिम्मत की गहराई नाप रहे हैं।
एक ओर सबसे ऊंची मीनार पर बैठा छुटभैया है, जो सुख के समय सीना फुलाता है, कठिनाइयों में मुंह छुपा लेता है। पद से उसका कद नही बन सका, और बिना पद राहुल का कद बढ़ता जा रहा है।
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इन कदमो की आहट से डरा हुआ राजा, प्रभु राम की मूरत के पीछे छुपकर गोलियां ��ला रहा है।
बौने कद के सहमे मुख्यमंत्री उसके कदमों में बेड़ियाँ बांधने की योजनाएं बना रहे है।एफआईआर के हथौड़े बजाये जा रहे हैं।
लेकिन राहुल थम नही रहा।
घायल उत्तरपूर्व को उनकी यात्रा ने एक विश्वास दिया है। राहुल को छूकर गुजरती हुई हवा ही मरहम होती जा रही है। महीनों तक हौलनाक खबरों के बाद अब जाकर वहां से कुछ मुस्काने दिखी है।
ये बड़ा आश्वस्त करने वाली मुस्कानें है। देखकर दिल आल्हादित है।
राहुल को शुक्रिया..
जवाहर का खून, उनकी रगों में अपना रंग दिखा रहा है।
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जियो राहुल।
जवाहरलाल बनो।
❤️
आ गया हूँ मैं..
वापस इसी धरा पर.. बंदनवार सजें हैं, ढोल, मंजीरे, दीप जले हैं।
प्रतीत होता है कि उत्सव है कोई।
दूर दूर तक देखता हूं।
चहुँ ओर भक्त हैं। जोश है, गीत है, शोर है, माहौल है। ये नई अट्टालिका है। ऊंचा भवन, नक्काशी तो देखो जरा, वाह ये कलाकारी देखो।
लगता है कोई मन्दिर है,
या महल है।
दृष्य नयनाभिराम है।
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नजर घुमाता हूँ। झंडों से पटी हुई अयोध्या है। गगनभेदी नारे है।
ओह, मेरा जयघोष है।
मेरी जय है !!
ऐसा निनाद, ज्यों कोई युद्ध जीता हो। इतना जोश, ये उत्साह.. उफ्फ। इतना तो मेरी सेना में भी न था।
क्या हुआ है यहाँ..
कोई युद्ध जीता गया है??
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अयोध्या है ये- अयुद्धा !!
मेरा घर, मेरी नगरी। मर्यादा की गंगोत्री.. ये युद्ध का स्थान नही। तो झंडे किसके है, युद्ध यहां किसने लड़ा??
क्या हुआ है, मुझे बताओ।
चुप क्यो हो?
शीश क्यो झुकाया है लक्ष्मण,
हनुमान, ये मौन क्यो??
बोलो सीते.. क्या हुआ है इस नगरी में?
ये बू कैसी है??
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मत बताओ। त्रिकालदर्शी हूँ, खुद ही देख सकता हूँ। राम हूँ, औघड़ नाद में कुचली गयी सिसकियां सुन सकता हूँ।
गुलाबजल से सिक्त वीथियो में नरमांस की बू क्यों है। क्या सड़ रहा है? क्या दबाया गया है यहां??
किसे आहत किया है? किसे मारा गया है? ये भूमि में दबी किनकी लाशें है?
किसने किया ��े??
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ओह, ओह, ओह !!!
ये, ये सब। मेरी खातिर? भला किसकी आज्ञा से? ये छल, मेरे नाम पर..
ओह शिव!! महादेव।
ये काल का नृत्य..
क्या अधर्म किया इन्होंने?? यज्ञ में मांसखण्ड डाल दिये?? यही आसुरी कर्म को रोकने को दिव्यास्त्र का अभ्यास किया था। खर दूषण को मारा। स्त्री वध से पीछे न हटा।
ताड़का का संधान किया।
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सीते, सीते.. अशक्त हो रहा हूँ। ओज क्षय हो रहा है। मर्यादायें तो मेरी शक्ति का स्त्रोत थी। राजधर्म मेरा बल था..
न्याय मेरी ताकत थी। अरे, यही नष्ट कर दिया इस भीड़ ने.. और देखो।
मुझसे कल्याण चाहते है ये??
कृपा मांगते है ये??
किस तरह?? कैसे करूँ कल्याण। कहाँ से लाऊं शक्ति, न्याय फिर स्थापित करूँ तो कैसे?? किसका संधान करूँ?
अन्याय तो मेरी ही पताका लहरा रहा है!!
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ये कौन आ रहा है। पुष्पक विमान से, फूल बरस रहे, दुदुम्भियां बज रही है। अतुलित ��ाद है, कोलाहल है, धूल उठ रही है।
कोई सेना है क्या??
वो नजदीक आ रहे है। अरे, ये कैसी माया है, कैसा इंद्रजाल है??
वो जितना करीब आता है, मेरा आकार घटता जाता है। प्रतिपल छोटा हो रहा हूँ। रुको लक्ष्मण, हनुमान.. ओझल मत हो। विलीन मत हो।
इनके बीच मुझे अकेला न छोड़ो।
ठहरो..
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घट गया। अब बाल रूप हूँ। धनुष और बाण मेरे हाथों से बड़े हो गए हैं। अकेला हूँ..
वो बढा आ रहा है। मेरी तरफ..
उसके साथ जनसमुद्र है..
पकड�� लिया मुझे।
उंगली जकड़ ली है।
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उफ, ये जकड़.. इन हाथों में तमाम बू का स्रोत है। ये विकराल तन, इसके वस्त्र लहूलुहान है, गले मे अनगिनत उंगलियों की माला है। कटे शीश श्रृंगार के उपादान बने है।
इसके गिर्द प्रेत हैं, आह है, चीत्कार की गूँज है। सर फटा जा रहा है। वो इशारा कर रहा है।
उठा लिया है मुझे..
उसके अनुचरों ने..
लिए जा रहे है नरमुण्डों की उस चंगेजी मीनार पर। छोड़ दिया है खुद को, जनसमुद्र के ज्वार में बहा जा रहा हूँ। ज्यो त्रेता में सरयू की लहरें मुझे बहा ले गयी थी।
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पर वो मुक्ति थी। ये बंधन है। अब अशक्त हूँ। ईश्वर नही हूँ। महज पताका हूँ।
किसी के भाले पर लहराती हुई पताका। अट्टालिका में बिठाया जा रहा है। ऊपर उठता जा रहा हूँ। पूरी अयुद्धा दिखाई दे रही है। लोबान जल रहे है, कपूर की गंध है। मंजीरों का शोर, घण्ट बज रहे हैं। दम घुट रहा है।
दूर, बहुत दूर खड़ी वैदेही टकटकी लगाए देख रही है। आंखों की कोर में पानी है। विकल लक्ष्मण है। कसमसाते बजरंग हैं।मुर्दों के टीले पर एकाकी बैठा उन्हें देख रहा हूँ।
पास कांपती, कलपती.. सरजू बह रही है।
इस बार .. शायद!!
वह भी निर्वाण न दे पाएगी।
अगर कॉन्स्टिट्यूशन होता..
आज मैं राम राज में हूँ, त्रेता की अयोध्या में। सोच रहा हूँ, कि यहां एक कॉन्स्टिट्यूशन रेजीम होता...
तो कैसा होता??
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कथा में क्या बदलता, क्या सम्भव होता, क्या होने से बच जाता। जैसे-
क्या अयोध्या की गद्दी के लिए, दशरथ के चार पुत्रों में इलेक्शन होता? क्या अनुभवी सुमंत भी गद्दी के लिए नॉमिनेशन फाइल करते?
और क्या वो धोबी भी चुनाव लड़ता?? अयोध्या के चौराहों पर वंशवाद के ख़िलाफ़ बोलता। रघु से अज तक, रघुकुल की नीतियों रीतियों को कटघरे में खड़ा करता??
22 बरस के युवा राम पर, सदियो के आरोप मढ़ता??
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दशरथ की इच्छा, बिना प्रश्न सबको शिरोधार्य थी। गणतंत्र ��ें कैकई को तीन वरदान देने के पहले सदन में विधेयक लाना होता। विपक्ष अड़ंगा लगा देता।
वनवास पर राम नही, तो लक्ष्मण अवश्य एक PIL लगा देते। आप इलेक्शन लड़ने से डिस्क्वालिफाई कर सकते है, पर कैंडिडेट को वन भेजना तो अनकांन्स्टिट्यूशनल हुआ न।
स्ट्रिक्टली अगेंस्ट ह्यूमन राइट!!
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फिर भरत को इजाजत न मिलती, कि किसी औऱ की खड़ाऊं, गद्दी पर रखकर शासन करें?
क्या रावण के विरूद्ध एफआईआर होती?? स्त्री हरण के ���िए उस पर ट्वीट होते?? राष्ट्रीय सुरक्षा, महिलाओं की हालत पर सवाल उठते?
सूर्पनखा के नाक कान काटने के लिए क्या लक्ष्मण पर FIR होती? मूक सहमति देने वाले क्या श्रीराम को भी क्या, कोएक्युज्ड बनाया जाता??
परस्त्री हरण के लिए तो बाली और सुग्रीव दोनो पर आरोप लगते।कोर्ट के लिए बड़ा ट्रिकी केस होता।
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लंका पर युद्ध छेड़ने के प���र्व, क्या अयोध्या से एप्रूवल लेना होता?
ब्रिज बनाने को टेंडर बुलाये जाते? लोएस्ट प्राइज कोट न करने के बावजूद, नल-नील एंड कम्पनी को कॉन्ट्रेक्ट, क्या सीएजी की आपत्ति का कारण नही बनता??
शिव पूजक, प्रकांड विद्वान, रावण को मारने से ब्राह्मण वोटरों पर क्या असर पड़ता?? क्या वानरों, रीछों, नागों को अयोध्या के प्रशासन में प्राथमिकता मिलती??
अफसरों की ट्रान्सफर पोस्टिंग में राजा की पार्टी के लोगो की, या संगठन की सुनवाई होती?मण्डल अध्यक्ष, फ्रंटल यूनिट प्रभारी, कार्यकर्ताओ की सुनी जाती अथवा नही?
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क्या शंबुक वेदों की तैयारी कर, APSC की परीक्षा देता? क्या वो सर उठाकर सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट का कलेक्टर या प्रभु श्रीराम चीफ सेक्रेटरी बन जाता?
क्या वशिष्ठ को मंत्रिमंडल में जाति के आधार पर वरिष्ठता मिलती, या उन्हें सम्विधान के कपितय न��यमो के अनुरूप स्क्रूटनाइज किया जाता ?
बिना गुजारे भत्ते के, गर्भावस्था में घर से निकाली गई सीता के पास क्या कोर्ट जाने राइट होता। क्या पति की संचित सम्पत्ति से वे एक हिस्सा, अपने लिए एलमनी के रूप में मांगने की अधिकारिणी होती?
क्या शंबुक मर्डर केस या सीताजी द्वारा फाइल सिविल सूट में अयोध्या की कोर्ट, राजा के विरुद्ध जाकर फैसला देती??
सवाल बहुत से हैं?
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पोस्ट प्रभु राम या रामायण का मजाक बनाने की नही। गम्भीरता से जरा सोचिए।
प्रभु के नाम से जिस व्यवस्था को, रामराज बताकर, गणतंत्र से बेहतर बताने की कोशिश है,
अबाध सत्ता की जो छवि आपके अवचेतन में बिठाने की चेष्टा हो रही हैं। जिसपे आप अनजाने मुहर लगा रहे हैं,
उसे खोलकर सामने रख रहा हूँ।।
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गणतंत्र, कानून का राज, कॉन्स्टिट्यूशनल पॉवर्स, लेस्जिलेटिव कन्ट्रोल.. किसी को अधिनायक बनने की इजाजत नही देता।
किसी को रावण, ताड़का, खर दूषण बनने की इजाजत नही देता। किसी को दशरथ, वशिष्ठ, कैकई बनने की इजाजत नही देता।
और स्वेच्छा से धर्म अधर्म को परिभाषित करने, के लिए, सत्ता में अधिनायकवाद लाने के लिए, किसी को श्रीराम बनने की भी इजाजत नही देता।
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सत्ता पर यही बंधन तो मानव इतिहास की उपलब्धि है।आजाद नागरिको की खोज हैं। हम नागरिक है, रियाया नही।
और यह नेशन स्टेट है, रियासत नही। ये बंधन, ही नेशन स्टेट की बैकबोन है। उसे ��ड़ा रखते, बिखरने से रोकते है।
कानून, अगर रामायण के तमाम पात्रों पर बराबरी से लागू होता..
तो श्रीराम हों या शंबुक..किसी को अत्याचार न झेलना पड़ता।
न करने की इजाजत होती।
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जहाँ श्रीराम के बायें हाथ का धनुष, एक्सेप्शन हो। अभय मुद्रा में उठा, खुला आशिर्वाद देता हुआ हाथ ही नॉर्म हो।
जहां नागरिक अभय से जिये।
जिस राज्य में कोई अत्याचार न हो।
हुआ तो दोषी दंडित हो।
जहां समता हो,
राजा-प्रजा, प्रजा-प्रजा में बराबरी हो।
नहीं है, तो समता की दिशा में प्रयास हो।
जहां की व्यवस्था, शोषण के विरूद्ध आवाज का सहारा बनती हो, संवैधानिक उपचार देती हो। अधिकार देती हो।
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जब सरकार, उसके कारिंदे चौक चौराहे में, सचिवालयों और मंत्रालयों मे यही न्याय, अभय, और रामसुलभ संवेदना के साथ सुनिश्चित करने के लिए सन्नद्ध हो।
यही राम राज्य की परिभाषा है न..
या नही??