चैनलों की डिबेट देखना भाजपा समर्थकों का जानकार वर्ग भी छोड़ चुका है,विपक्ष समर्थक बहुत पहले न्यूज चैनल देखना बंद कर चुके हैं। चैनलों में काम करने वाले भी घर में कोई चैनल नहीं देखते। सवाल ये है कि फिर विपक्षी पार्टियों के प्रवक्ता पहले से दिशा तय वाली डिबेट्स और कुख्यात एंकर्स के शो में हिस्सा क्यों लेते हैं?
डिबेट्स प्रवक्ताओं को चर्चा में बनाए रखती हैं, वो अपनी पार्टी के प्रति समर्पित दिखते है गोदी चैनल के होस्टाइल माहौल को झेलने के क्रम में, पार्टी में वेल्यू बढ़ती है उनकी इसलिए सह लेते हैं थोड़ा सा ही नहीं ज्यादा सा भी।
प्रवक्ताओं का तो समझ में आता है पर पार्टियां क्यों भेजती हैं प्रवक्ता? वो बहिष्कार क्यों नहीं करती इन चैनल्स का? जो दर्शक अब भी इन डिबेट्स को देख रहे हैं वो या बहुत पहले ब्रेनवॉश हो चुके पेंशन उठा रहे व्हाट्सअप अंकल हैं या जिन्हें मानसिक अफीम की लत लग चुकी है और जिन्हें एड्रीनेलिन का मजा लेना है ज़हरीली बहस से। इनमें से एक व्यक्ति भी विपक्ष की किसी पार्टी को कभी वोट नहीं देने वाला तो ऐसे पूर्वाग्रही दर्शक वर्ग में विपक्ष का प्रवक्ता अपनी पार्टी का पक्ष रख कर क्या हासिल कर लेगा?
डिबेट ही नहीं चैनलों के कॉनक्लेव क्या हैं आपने कभी सोचा? कॉन्क्लेव विशुद्ध रूप से कमर्शियल एक्टिविटी हैं जिन्हें रेवेन्यू के लिए प्लान किया जाता है। मार्केटिंग टीम स्पांसर लाती है, ब्रांड टीम इवेंट एक्जीक्यूट करती है, एडिटोरियल टीम और गेस्ट कोऑर्डिनेशन टीम(टीवी के संदर्भ में) राजनीतिक दलों के नेताओं का आना सुनिश्चित करती है। सवाल ये है कि जो चैनल विपक्षी दलों को बदनाम करने में साल भर लगे हैं उनके कॉन्क्लेव में विपक्ष के नेता क्यों जाते हैं? चैनल का रेवेन्यू विपक्षी दलों की जिम्मेदारी तो है नहीं।
सोचना विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं को होगा, उनके आसपास वाले सिर्फ उन्हें खुश करने के बारे में सोच रहे हैं पार्टी के हित के बारे में नहीं और इससे ज्यादा वो सोच भी नहीं सकते, इतना ही आता है उन्हें।
भारत का यूजर इधर अमरीकियों संग कदमताल करता है https://t.co/5XMrJngSBZ पर.. कभी कभी तो वो भारत के यूजर से ज्यादा देर साइट पर बैठा रहता है. ये क्या चक्कर है?
जो भी हो न्यूजमैन जी के पाठक दुनिया भर फैले हुए हैं और ये चार्ट महज बीस बाईस दिनों में हमारे कंटेंट की स्वीकार्यता की बानगी भर है...
बहुत शुक्रिया. ❣️🙏🏻
शासक और जनता का रिश्ता भिन्न ही रहा है. यहां शासक का चरित्र भी पहचाना जा सकता है और जनता की निरंतर चलने वाली बेबसी भी.. "नेक्सस" शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल, दर्जा चार से ही जब पढ़ाया जाने लगेगा तो दुनिया ज्यादा बेहतर विचार की ओर प्रेरित होगी. बाकी तो लाला की, लाला के लिए, लाला द्वारा वाली बात है खाली..
ए झारखंड के युवा नेता.. खाना खा ले पगले, तेरी भूख से शासक की दावत का रंग नहीं बदलता. तेरा साहस अब हमने देख लिया है.. मस्त कोकोनट वाटर पीकर अब टकटका हो जा.
सुप्रिया सुले की बेटी के वैवाहिक कार्यक्रम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे जी ने मोदी जी के मजे ले लिए।😂
नरेंद्र मोदी जी - और प्रियंका कैसी हैं आप?
प्रियंका गांधी - अच्छी हूं सर! आप कैसे हैं?
नरेंद्र मोदी जी - मैं तो वैसा ही हूं। 😀
खड़गे जी - भाई साहब थोड़ा सा बदल गए हैं। 😂
नरेंद्र मोदी जी - अच्छा 😂😂
खड़गे जी ने अपने दिल की बात कह दी जो सदन में कहते नहीं बनता था।😀
नरेंद्र मोदी के विकास की खूबी है कि वो तुरंत दिखने लगता है। यहाँ तो पूरे पच्चीस दिन हो गए हैं।
तिरसठ किलोमीटर की ये सड़क केवल साढ़े चार हज़ार करोड़ में बनी है।
(कानपुर से @sanjaypandeyji की रिपोर्ट और वीडियो)
मिसेज गांधी वर्सेज गिरिराज में किसकी लेखनी में ज्यादा दम है!
सही आंकलन करने वाले को दो बिम बार का टिकिया और एक प्लास्टिक का मग्गा रॉकफेलर माघ मेला फंड से पूर्णिमा की रात सरयू नदी के किनारे भव्य कार्यक्रम में दिया जाएगा, माघ मास में..
अरे उसने छब पा ली अपने ईश्वर में..
कहां इतना लोड लेते हो भाई! खाली राजनीति.. कभी कला की भी बात करो!
दिनभर षड्यंत्र कि कैसे सरकार गिर जाए बस, मानों कल ही अंबानी-अडानी के शेयर लूट बाकी तो बस जनता को ही बांटने वाले हों और बस यही मसला बीच में अटका हो! गज़ब है.. नृत्य में भी तुमने पार्वती ढूंढ ली!
किसने देखा था कि पार्वती ऐसे ही दिखती थी? ई तो कलजुगी नागिन दिक्खे भोले! धुन बदल ल्यो तो शकीरा शकीरा हो जाएगा मामला.
नाचने दो उसे.. उसके जीवन का नाच है.
दक्ष चौधरी रिद्धिमा पिंकी चौधरी अभिषेक ठाकुर कहाँ है वो धर्मरक्षक ?
माता पार्वती का वेश बनाये महिला ट्रेक्टर के बोनट पर नाच रही है।
क्यों नहीं कहते अब कि ईश्वर आराधना के लिए है किसी के मनोरंजन के लिए नहीं।
पहाड़, ट्रैकिंग, हिमालय. ये सब कभी उतने चौंकाये नहीं. लेकिन ऐसे ही कुछ साल पहले निर्मल पुर्जा को फॉलो करने लगा और फिर करता ही गया. क्या जुनून था इस इंसान में. 42 साल में वो सब कर गया, जिसके बारे में दुनिया सोचती थी एयर वो करना चाहते थे.
मोटेशाह (मोंटेशा बाद में अपभ्रंश हो गया) यो अशनीर ग्रोवर भी मेरे विचार के समर्थन में दिख्खे.. खालिस कैप्टलिस्ट आदमी है भई!
चलो, @Ashneer_Grover साथ में कोर्ट चलेंगे भाई तब हैं. तेरे लिए पगले गांव से चूड़ा लाएगा मैं भाई.. पेशी में न जाने कब देर हो जाए.🤐
नोट: प्रिंट शॉट है अब तो जज को समर्थन दिखाने वास्ते.. गर जज बिके न तो राजनीतिक समर्थन माना जाएगा.
@Shibasishsarkar At least, here you’re sweating for your own gains.
These days, there seem to be far too many parasites around
who mistake smiling at someone else’s embarrassment for an achievement. 🐷