जो व्यक्ति जितना शांत होता है वह उतना ही ध्यान से सब कुछ देखता-सुनता है वो आपके गलत व्यवहार झूठ,धोखा या गलत हरकतों को चुपचाप नोट करता है लेकिन तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देता
वो सब कुछ ईश्वर व समय के हवाले कर देता है क्योंकि ईश्वरऔर समय कभी शोर नहीं करते लेकिन न्याय जरुर करते हैं
व्यक्ति जिन अनुभवों एवं पूर्वाग्रहों के साथ बड़ा होता है वही उनके नेत्रों के आगे जीवनपर्यंत चश्मे की भाँति लगे रहते हैं। जो कुछ भी वह देखता, सुनता है एवं विचार करता है - वह सब इन्हीं मानकों के साथ अशुद्ध रूप से ही करता है। अपनी पहचान से चिपके रहकर व्यापक-दृष्टि पाना असंभव है।
सच कहूँ तो कभी-कभी ये दुनिया मुझे किसी गहरे नाटक का मंच लगती है, जहाँ पात्र असली हैं पर संवाद उधार के, भावनाएँ निर्देशित हैं और डर को सबसे सशक्त हथियार की तरह प्रयोग में लाया गया है। जैसे किसी ने बहुत सोच-समझकर कुछ आडंबर रचे हों इतने भव्य, इतने डरावने और इतने पवित्र घोषित किए गए कि उन पर प्रश्न करना भी अपराध बन जाए। इंसान जो स्वभाव से जिज्ञासु और विवेकशील है, धीरे-धीरे उन्हीं रचनाओं के सामने सिर झुकाने को विवश कर दिया गया हो।
अजीब बात देखिए कि जिन चीज़ों को “अटल सत्य” कहा जाता है, वे अक्सर सबसे ज़्यादा अस्थिर दिखती हैं। उन्हें बचाने के लिए शोर चाहिए, भीड़ चाहिए, डर चाहिए। यदि वे सचमुच आत्मा से उपजे होते, तो शायद उन्हें लाठी, नारे और दंड की आवश्यकता न पड़ती। पर यहाँ व्यवस्था कुछ ऐसी है कि डर को अनुशासन का नाम दे दिया गया है और सवाल को विद्रोह। इंसान को बताया गया कि सोचने से पहले मानना ज़रूरी है, समझने से पहले झुकना ज़रूरी है।
कई बार लगता है कि ये सब इसलिए गढ़ा गया ताकि मनुष्य अपनी सबसे बड़ी शक्ति चेतना से कट जाए। जब डर गहरा होता है, तब तर्क कमजोर पड़ जाता है। तब इंसान अपने दुःख का कारण ढूँढने की बजाय, दोष स्वीकार करना सीख लेता है। उसे समझा दिया जाता है कि उसकी पीड़ा किसी अदृश्य नियम का परिणाम है, किसी पूर्व जन्म का दंड है, या किसी ईश्वरीय योजना का हिस्सा है। इस तरह सवाल वहीं दब जाता है, जहाँ से परिवर्तन शुरू हो सकता था।
इन आडंबरों की सबसे बड़ी चाल यही है कि वे खुद को विकल्पहीन बना देते हैं। ऐसा महसूस कराया जाता है कि इनके बाहर कुछ भी नहीं, न नैतिकता, न अर्थ, न सुरक्षा। और इंसान जो स्वभाव से असुरक्षा से डरता है, उसी घेरे में रहना स्वीकार कर लेता है, भले ही भीतर से वो घुटता रहे। धीरे-धीरे वो अपनी जंजीरों को ही परंपरा, संस्कार और आस्था का नाम देने लगता है।
पर ये भी एक कड़वा सत्य है कि हर आडंबर बाहर से नहीं थोपा जाता; कई बार हम स्वयं उसे ढोते हैं। डर हमें सुविधाजनक लगता है, क्योंकि डर जिम्मेदारी से बचा लेता है। यदि सब कुछ पहले से तय है, यदि कोई और हमारे भाग्य का लेखक है, तो हमारे निर्णयों की जवाबदेही भी किसी और पर चली जाती है। शायद यही कारण है कि हम भ्रम को सच मान लेना आसान समझते हैं।
फिर भी भीतर कहीं लगातार एक आवाज़ रहती है धीमी, संयमित। वह पूछती है कि क्या सच इतना कमजोर होता है कि उसे डर से बचाना पड़े? क्या ईमानदार आस्था को आँख बंद करने की शर्त चाहिए? और क्या इंसान सचमुच इतना तुच्छ है कि उसे हमेशा किसी अदृश्य भय के सहारे नियंत्रित किया जाए?
शायद यही वो क्षण है जहाँ कल्पना और यथार्थ का फर्क साफ होने लगता है। आडंबर टूटते नहीं, पहचाने जाते हैं। गुलामी की जंजीरें तभी ढीली पड़ती हैं, जब इंसान ये स्वीकार करता है कि सोचने का अधिकार उससे छीना गया था, और वो उसे वापस लेना चाहता है। ये विद्रोह नहीं, आत्मसम्मान है। ये नास्तिकता नहीं, ईमानदारी है।
सच मानिए डर पर टिकी हर व्यवस्था अस्थायी होती है, चाहे वो कितनी ही पुरानी क्यों न हो, और जो सच भीतर से जन्म लेता है, उसे किसी सजावट की ज़रूरत नहीं होती। वो शांत होता है, सरल होता है, और इंसान को छोटा नहीं, बल्कि बड़ा बनाता है। यही वो बिंदु है जहाँ कल्पना पीछे छूटती है और इंसान पहली बार सचमुच जागता है।
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
यह कोई साधारण घटना नहीं है। इतिहास को शर्मसार करने वाला लम्हा है।
यह वह क्षण है जब इतिहास ने अपनी आँखें फेर लीं और अंतरराष्ट्रीय क़ानून ने ज़मीन पर गिरकर चुप्पी ओढ़ ली। यह गिरफ्तारी नहीं है। यह एक औपनिवेशिक छापा है, जो रात के सन्नाटे में नहीं, दिन-दहाड़े, कैमरों और सुर्ख़ियों के उजाले में अंजाम दिया गया।
एक संप्रभु देश का राष्ट्रपति अपने ही घर में, अपने ही बेडरूम में—पत्नी के साथ खींचकर बाहर निकाला जाता है। यह दृश्य किसी लोकतांत्रिक न्यायालय का नहीं, किसी साम्राज्यवादी विजय-उत्सव का है। जैसे सत्ता ने कहा हो: तुम्हारा चुनाव, तुम्हारी जनता, तुम्हारी ज़मीन—सब तभी तक मान्य हैं, जब तक वे हमें पसंद हैं।
संयुक्त राष्ट्र का चार्टर कहीं दूर किसी अलमारी में पड़ा रह जाता है। उसका अनुच्छेद संप्रभु समानता की बात करता है, मगर यहाँ समानता नहीं, केवल ताक़त बोल रही है। क़ानून नहीं चलता, टैंक चलते हैं; न्याय नहीं चलता, हवाई जहाज़ चलते हैं। न्यूयॉर्क की ओर उड़ान भरता यह अपमान केवल एक व्यक्ति को नहीं, एक पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बंधक बनाकर ले जाता है।
यह ‘कानून का राज’ नहीं है। यह शक्ति का राज है। वह शक्ति जो तय करती है कि कौन लोकतांत्रिक है और कौन तानाशाह; कौन मित्र है और कौन अपराधी। वही शक्ति जो कुछ देशों में राजशाही को स्थिरता कहती है और कुछ देशों में चुनी हुई सरकारों को अपराध। लोकतंत्र यहाँ एक शब्द नहीं, एक बहाना है, जिसे भू-राजनीति की ज़रूरत के हिसाब से मोड़ा जाता है।
आज वेनेज़ुएला है। कल कोई और होगा। जब किसी एक देश को यह अधिकार दे दिया जाए कि वह दूसरे देश के राष्ट्रपति को उठा ले तो दुनिया राष्ट्रों का समाज नहीं रहती। वह गिरोहों का मैदान बन जाती है। तब संयुक्त राष्ट्र केवल एक इमारत होता है, क़ानून केवल एक किताब और न्याय केवल भाषणों की सजावट।
सबसे शर्मनाक यह नहीं कि यह हुआ। सबसे शर्मनाक यह है कि यह खुलेआम हुआ। बिना झिझक, बिना शर्म, बिना किसी अंतरराष्ट्रीय सहमति के। जैसे इतिहास से कहा गया हो: देखो, हम कर सकते हैं।
और इतिहास देख रहा है चुपचाप, भारी मन से। यह दर्ज़ करते हुए कि इस दिन क़ानून चुप था, लोकतंत्र झुका हुआ था, और साम्राज्यवाद मुस्कुरा रहा था।
यदि यही न्याय है तो अराजकता को स्वीकार कर लेना ज़्यादा ईमानदार होगा। क्योंकि न्याय वही होता है, जो सब पर लागू हो—
वरना वह न्याय नहीं, सिर्फ़ ताक़त की कविता है, जिसे बंदूक की स्याही से लिखा गया है। गुंडों के भी कुछ उसूल होते हैं; लेकिन यहाँ तो वह भी नहीं है।
#Venezuela #venezuelalibre #venezuelainvasion
कामयाबी और हमारी बढ़ती उम्र
एक बार Quora पर किसी ने सवाल पूछा, "मेरी उम्र चालीस साल है, क्या अब भी खुद को युवा मान सकता हूं?" इस सवाल पर एक शख्स ने जो जवाब दिया, वह बहुत से लोगों को एक नई सोच दे सकता है।
उस शख्स का कहना था: "आपकी उम्र चालीस साल है। अगर आप 20 साल के एक लड़के से पूछेंगे, तो आप डायनासोर हैं। और अगर मेरी 85 साल की दादी से पूछेंगे, तो आप अभी दूध पीते बच्चे हैं।"
उम्र बढ़ने और साल दर साल बीतने के बाद, हर इंसान को लगने लगता है कि शायद वह जीवन में कुछ नहीं कर पाया। यहां तक कि 25 साल की उम्र में भी यह ख्याल आता है कि मैंने अपना जीवन बर्बाद कर दिया। फिर जब 35 के होते हैं, तो लगता है कि 25 की कम उम्र में तो मेरे पास बहुत वक्त था। यही ख्याल इंसान के दिमाग में 40 साल की उम्र में भी आता है कि मैंने तो अपनी पूरी जवानी बर्बाद कर दी।
जबकि हकीकत यह है कि उस वक्त भी उस इंसान के सामने जीवन के 25 साल ऐसे होते हैं, जब वह पूरी ऊर्जा के साथ खुद को एक काम में खपा सकता है।
सच तो यह है कि 40-45 की उम्र तक, जब आप बहुत सारे काम करते हुए कहीं पहुंचे नहीं होते, तब तक भी आप बहुत सारा अनुभव जुटा चुके होते हैं। बस आपको तब भी खुद से ये पूछते रहना पड़ता है कि वह एक काम कौन सा है, जिसमें आपको डूब जाना है। जिस पल आपको वह चीज़ मिल जाती है, तब तक टुकड़ों-टुकड़ों में अलग-अलग कामों से जुटाया अनुभव आपकी ऐसी ताकत बनता है, जो एक 25 साल के लड़के में नहीं होती।
वैसे भी, अलग-अलग कामों के लिए बूढ़े और जवान की परिभाषा अलग-अलग होती है। एक 18 साल का जिमनास्ट अपने खेल में बूढ़ा मान लिया जाता है, जबकि एक 55 साल का नेता राजनीति में जवान होता है। एक 25 साल का क्रिकेटर अपनी फील्ड में युवा होता है, लेकिन 24 साल का शख्स कमांडो ट्रेनिंग के लिए उम्र पार कर चुका होता है। एक 50 साल का एक्टर अपने काम में उम्रदराज़ होकर कम valuable होने लगता है, वहीं 50 साल का एक स्क्रिप्ट राइटर उम्र और तजुर्बा बढ़ने के साथ और महंगा होता जाता है।
बाहुबली के राइटर विजयेंद्र प्रसाद ने तो बाहुबली 1, बाहुबली 2 और RRR जैसी अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी फिल्में तब लिखीं, जब वह 70 साल की उम्र पार कर चुके थे। हॉलीवुड में Clint Eastwood ने सबसे ज़्यादा नियमित काम 60 साल की उम्र के बाद किया। वहीं, उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के सबसे कामयाब और बड़े उपन्यास उनकी ज़िंदगी के आखिरी वक्त में आए।
इसलिए, आपकी उम्र कम है या ज़्यादा, यह तो कोई मायने नहीं रखता। बस, आपको अपने लिए एक ऐसा काम तलाशना है, जिसमें आप पूरी तरह से डूब सकें।
जैसा कि विवेकानंद जी ने कहा था, "जीवन का मतलब ही यही है कि खुद के लिए कोई एक काम पकड़ना और अपना सर्वस्व उसमें झोंक देना।"
जीवन के थोड़े-बहुत अनुभव से मैं बता सकता हूं कि ज़िंदगी में कुछ भी करने के लिए पैसा, आपकी पृष्ठभूमि या आपकी उम्र कभी वजह नहीं होती। जो लोग ज़िंदगी में कुछ बड़ा नहीं कर पाते, उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि वे कभी अपनी conviction को परखते नहीं और हारने के डर के कारण self-doubt से घिरे रहते हैं।
फिर उम्र बीत जाने पर आपको लगता है कि कुछ न कर पाने की तकलीफ तो हार जाने के उस हवाई डर से कहीं बड़ी है। अब यह हमें तय करना है कि हार जाने के उस हवाई डर से freeze होकर एक भी कदम न उठाएं या सोचना बंद कर पहला कदम उठाएं।
और वह पहला कदम उठाने के लिए पहली जनवरी से बड़ी प्रेरणा और कुछ नहीं। आप सबको नए साल की अनंत शुभकामनाएं। और जिन लोगों ने मुझे WhatsApp पर broadcast list में डालकर नए साल की शुभकामनाएं भेजी हैं, उन्हें भी Happy New Year!
-Neeraj Badhwar
"स्वच्छता के 'ताज' में लाशों का दाग।"
प्रिय कैलाश विजयवर्गीय जी, @KailashOnline
यह खत मैं उस इंदौर की तरफ से लिख रहा हूँ, जिसे आपने कागजों पर तो 'नंबर वन' बना दिया, लेकिन हकीकत की जमीन पर उसे श्मशान में तब्दील कर दिया। आज भगीरथपुरा के उन 8 मृतकों की चिताओं की राख मिली हुई है, जिन्हें आपके 'सिस्टम' ने गटर का पानी पिलाकर मार डाला।
कैलाश जी, जब सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलता है, तो इंसान को जनता का दर्द 'नाटक' और उनके सवाल 'बेतुके' लगने लगते हैं। 8 लोग मर गए, सैकड़ों अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं, और आपके लोगों के मुंह से क्या निकला? "कुछ मौतें नेचुरल होती हैं।"जरा उस मां की आंखों में देखिये जिसने अपना जवान बेटा खोया है और पूछिये कि क्या सीवर मिला हुआ जहरीला पानी पीकर मरना 'नेचुरल' है?
यह प्राकृतिक मृत्यु नहीं, यह 'संस्थागत हत्या' है। यह आपके उस निकम्मे प्रशासन का पाप है जो पाइपलाइन और सीवर लाइन का फर्क भूल गया। जब 'अमृत' की जगह नलों से 'विष' बहने लगे, तो समझ लीजिये कि सुशासन की अर्थी उठ चुकी है। और जब मीडिया आपसे सच की बात करे, तो आप गुंडों की भाषा बोल रहे हैं? "फोकट के प्रश्न", "घंटा"...?
यह शब्दावली एक जन-सेवक की नहीं, एक ऐसे 'दंभी शासक' की है जिसे लगता है कि कुर्सी उसके बाप की जागीर है। जिस जनता ने आपको सिर-आंखों पर बिठाया, आज आप उसी को 'घंटा' दिखा रहे हैं? याद रखियेगा, लोकतंत्र में जब जनता का 'घंटा' बजता है, तो बड़े-बड़े तख्त ताश के पत्तों की तरह बिखर जाते हैं।
आपका यह अहंकार उस गंदे पानी से भी ज्यादा जहरीला है जो इंदौर के नलों में बह रहा है। दिल्ली में बैठे 'प्रधान सेवक' ने कहा था–"मुझे माँ गंगा ने बुलाया है।" कसम गंगा की खाई थी, और इंदौर को क्या दिया? गटर का पानी! 'हर घर नल' योजना का ढोल पीटने वालों, आज इंदौर का हर नल आपकी नाकामी का स्मारक बनकर खड़ा है। यह योजना 'हर घर जल' नहीं, बल्कि 'हर घर छल' साबित हुई है। आप दुनिया को 'विश्वगुरु' बनाने चले थे, लेकिन अपनी ही जनता को जहर पिलाकर आज 'विष-गुरु' बन बैठे हैं।
इंदौर ने आपको सब कुछ दिया। पिछले 20 साल से भाजपा का राज है। सांसद आपका, सभी 9 विधायक आपके, महापौर आपका, मंत्री आप और मुख्यमंत्री भी इंदौर के प्रभारी। सत्ता का ऐसा पूर्ण वर्चस्व होने के बावजूद, अगर जनता साफ पानी के लिए तरस रही है और जहर पीकर मर रही है, तो लानत है ऐसे विकास पर!
यह 20 साल का 'सुशासन' नहीं, यह 20 साल का 'विश्वासघात' है। मुआवजा के 2-2 लाख रुपये फेंककर आप अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते। लाशों की कीमत लगाना बंद कीजिये।
आज इंदौर आपसे 'फोकट' के प्रश्न नहीं पूछ रहा, वह आपसे अपने 'जीवन के अधिकार' का हिसाब मांग रहा है। अपनी जुबान और अपने प्रशासन, दोनों की गंदगी साफ कीजिये, वरना यह जनता है–यह अर्श पर बिठाना जानती है, तो फर्श पर पटकना भी खूब जानती है। इतिहास गवाह है, रावण का अहंकार नहीं टिका, तो आपकी यह 'घंटा' वाली हेकड़ी कितने दिन टिकेगी?
ख़त लिखने वाला लड़का।
चाय इश्क़ और राजनीति।
कभी-कभी ज़िंदगी वो सबक सिखा देती है जो किसी किताब में नहीं मिलते!! लोग बदलते हैं और कुछ तो ऐसे कि कल तक जो आँखों का सुकून थे आज उन्हीं को देखकर आंखे रो देती हैं!! इसलिए अब ये तय कर लो कि ना किसी की मौजूदगी पर ज़्यादा ख़ुश होना है और ना किसी के जाने पर टूटना है..!!
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इंसान अक्सर defense mechanism का इस्तेमाल करता है,
मतलब जब इंसान के अंदर आत्मसम्मान की कमी होती है, वो कमजोर महसूस करता है, या उसे लगता है कि लोग उसे इग्नोर कर रहे है तो वो दूसरे लोगों की बुराई करके, चुगली करके खुदको मजबूत दिखाने को कोशिश करता है।