रात को नींद नही आती तब आभास होता है की सुकून की नींद मिलना कितना महत्वपूर्ण है, रात को जब कोई बात करने वाला एक इंसान नही मिलता तब आभास होता है की चारो तरफ लगी भीड़ में से एक इंसान को महत्व देना कितना महत्वपूर्ण है। ज़िन्दगी को सीरियस ना लेने का और रात में गलतियों का 1/2
खुद को सही साबित करने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगाना सबसे बड़ी भूल है। गलत लोग अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं, और सच्चा इंसान खुद को खत्म कर लेता है।
अक्सर किसी इंसान की कहानी में खुद सही और सामने वाले गलत होते है, पर इसका मतलब ये नहीं है कि हर कहानी सुनाने वाला गलत हो, कुछ लोग किस्मत और लोगो के मारे भी होते है, वो लोग सच्चे होते हुए भी झूठे साबित कर दिए जाते है और वो आसमान की तरफ भगवान को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर सकते।
प्रेम" के किसी जगह को छोड़कर जाने पर वो जगह फिर उतनी ही खूबसूरत नहीं लगती जितनी वो "प्रेम" के साथ होने पर लगती थी,
सिर्फ एक इंसान और उसके लिए ढेर सारा प्रेम ,
बेकार सी जगह के लिए भी हमारा नजरिया बदल देता है।
रोमांटिक फिल्मों ने प्रेम की परिभाषा बिगाड़ दी है। फ़िल्में सिर्फ 'प्रपोजल' और 'शारीरिक जुड़ाव' तक खत्म हो जाती हैं, उसके बाद के असल जीवन का संघर्ष, बातचीत और साथ निभाना कभी नहीं दिखातीं। इसलिए युवा पीढ़ी स्क्रीन की दुनिया को ही असली प्यार मान बैठती है।
आसपास इतनी भीड़ है लेकिन कभी कभी लोगों की एक hug को भी बाहें तरस जाती है।
गले मिलना बहुत simple process होकर भी बहुत मुश्किल से मिलता है।
कुछ लोग बिना गले मिले ही जिंदगी भी निकाल देते है।
अगर कुम्हार से मिट्टी बोले कि
तुम मुझे बदल नहीं सकते हो
मैं अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से जिऊंगी
तो फिर कुम्हार द्वारा मिट्टी को चकरी पर बैठाकर जबरदस्ती गोल गोल घुमा देना harrasment कहलाएगा?
क्या कुम्हार पर case किया जाना चाहिए?
जबकि बिखरी मिट्टी को मिलाकर उसने खूबसूरत बनाया,
दुनिया का नियम है कि वह आपको अपने रंग में ढालना चाहती है। समाज, दोस्त, रिश्तेदार सब अपनी शर्तों पर आपको चलाना चाहते हैं।
इसलिए अपनी आत्मा की मौलिकता को बचाने के लिए लोगो से दूरी बनाना ही एकमात्र रास्ता बचता है।
मन में यह सवाल उठना कि
मैं zindagi में कर क्या रहा हूँ?
दरअसल आपके अंदर के इंसान के ज़िंदा होने का सबूत है जो एक कीड़ा जैसी जिंदगी जीने से इनकार कर रहा है।
सबसे खराब रिश्ता वो होता है जिसमे दोनों मे से किसी एक का रिश्तों से भरोसा उठ चुका होता है, और दूसरा इंसान उस feelingless इंसान को अपना soulmate समझ लेता है,
फिर असली युद्ध शुरू होता है जहाँ आखिर मे दोनों के ही हारने के chances होते है।
अपने मन पर किसी और का बोझ लाद लेने की क्षमता नहीं बची मेरे अंदर।
मुझे खुद को समझने के लिए, अपने मन की उलझनों को सुलझाने के लिए, एकांत आवश्यक है। इसलिए मैने लोगो से दूरी बना ली है।
वैसे भी अपनी आत्मा के करीब रहने की कोशिश हमेशा दूसरों से दूरी बनाने की मांग ही रखती है।
जीवन में एक मोड ऐसा आता है जब सवाल सिर्फ आराम का नहीं रह जाता है वह हमारे अस्तित्व के मूल तक पहुँच जाता है।
तब लगभग हर इंसान के मन में ये सवाल पनपता है कि
क्या मैं सच में जी रहा हूँ, या सिर्फ जीवन को निभा रहा हूँ?
या फिर मैं कर क्या रहा हूं? रोज रोज वहीं same routine