हुंडी पर गीत लिखने वाले @manojmuntashir ने जैसे ही कविता में देह देखी—नैतिकता की सीटी निकाल ली। काव्यात्मक ऊँचाई के सामने सपाट की धर-पकड़ और कामुक दृश्य पकड़ने वाला यह ट्रोलर, दरअस्ल कविता का कट-आउट संस्करण सोखने वाले दर्शक हैं—जिनकी पढ़त अश्लील है।
मैं कवि और कविता के समर्थन में हूँ जो स्तन लिखने के बाद भी कविता को वहीं नहीं छोड़ता—बची देहराशि और एक जीवन भी कम तक—ले जाता है। आप भी यह बात समझ रहे हैं तो इस लिंक पर कुशाग्र को वोट दें। इसी लिंक में कुशाग्र की कविताएँ भी हैं (वायरल कट-आउट पंक्तियां भी)
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प्रेम कोई निर्जीव, संस्कारी और फूलों से ढका हुआ अनुभव नहीं है। हाँ! उनके लिए होगा जो सोशल-कंडीशनिंग के रसायनों से निर्मित हैं और तमाम पूर्वग्रहों के पोषक और आदर्श-आचार-संहिता के अन्यन्य आज्ञापालक हैं।
कविता के हर शब्द को नैतिकता के तराजू में तौलना, कविता की हत्या है. उसका कच्चा होना ही उसे सजीव बनाता है. उसमें प्राण झोंकता है. और बिना आत्मा के कविता निर्जीव है.
हिन्दवी द्वारा कुशाग्र अद्वैत की बलि
कुछ लोग मुझे कवि मानते हैं। कुछ लोग मुझे कवि नहीं मानते हैं। लेकिन सभी लोग यह मानते हैं कि मैं लिखता हूँ। अच्छे और बुरे का निर्णय एक लगातार चलती रहने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में उतार - चढ़ाव आते रहते हैं।
कुछ महीनों पहले मैं अपनी एक कविता "माधुरी दीक्षितियों के नाम" लिखकर ट्रोल हुआ था। गलती यह हुई थी कि मैंने माधुरी की फ़ोटो लगा दी थी। जबकि मुझे बहुत सारी हीरोइनों की तस्वीर लगानी थी। इससे होता यह कि बात अकेली माधुरी पर नहीं आती, बल्कि "डायल्यूट" हो जाती। बाद में इस कविता को मेरे एक फेसबुक मित्र अरुण खामख्वाह ने अपनी वाल पर लगा दिया।
और फिर जो तांडव हुआ, वह मैं और मेरा कलेजा ही जानता है। एक दशक से अधिक की काव्य यात्रा में मैंने जितने भी शत्रु बनाए, वे सभी उस वाल पर प्रकट होने लगे। पूरा दिन उनके कमेंट्स पढ़ने में चला गया। सारी रात सो न सका।
ऊपर से यही दिखाता रहा कि मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन मन ही मन एक कंपन्न महसूस होता रहा। न निगलते बन रहा था न उगलते। लेकिन ट्रोलिंग झेलने का पूर्व - अभ्यास इतना तगड़ा था कि मेरा जीवन बहुत प्रभावित नहीं हुआ। दो दिन बाद मैंने वह कविता अपनी वाल से हटा दी।
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कुशाग्र की कविता का यह टुकड़ा पढ़ते ही मैं समझ गया था कि इस लड़के की ट्रोलिंग होगी। और वह हो भी रही है।
यह दो - तीन कारणों से है।
एक तो तमाम उम्र स्त्री के स्तनों में धंसे रहने की कल्पना करने वाले भी जब किसी कविता में स्तन शब्द देख लेते हैं, तो उनके भीतर का संस्कृति - कर्मी अचानक जाग उठता है।
दूसरा यह कि लोग बहुत निकम्मे हैं। नाकारा हैं। वे जितना व्यस्त ख़ुद को दिखाते हैं, वे हैं नहीं। इसलिए अच्छी या बेहतर वस्तु पर न जाकर उनका ध्यान ऐसी ही किसी चीज़ पर जाता है।
तीसरा कि यह प्रकाशन की गलती है। पूरी तरह गलती है। प्रकाशन / सम्पादक इस बात को क्यों नहीं समझ रहा कि थोड़े से भी नेगेटिव कमेंट्स किसी कोमल हृदय को आत्महत्या के मुहाने तक ले जा सकते हैं। हर किसी में सोशल मीडिया विवाद को, ट्रोलिंग को या नकारात्मक प्रचार को पचाने की हिम्मत नहीं होती।
मैंने कुशाग्र की पूरी कविता पढ़ी। कच्ची कविता है। स्तन शब्द टाला जा सकता था। लेकिन क्यों ही टाला जाए। यदि किसी युवा कवि से आप ऐंदृकता की परिधि में उसकी कल्पना के व्यास को छीन लेंगे तो वह कभी कोई दुस्साहस नहीं कर पाएगा। कविता के अ - रसिकों और तथाकथित राष्ट्रवादी सांसांस्कृतिक-कर्मियों को यह पता ही नहीं है कि हिंदी अतुकांत में क्या और कैसा और कितना कुछ अ - रूप, वि - रूप, स्व - रूप, नि - रूप लिखा जा चुका है।
हिंदी अतुकांत कोई ग़ज़ल नहीं है, जो कोठों पर जवान हुई हो। यह तो तब विकसित हुई जब भीतर अंधियारे का विवर अपने उच्चतम पर था। हम मोहब्बत या गुरबत / चाहत या बिंदिया / निंदिया या शहर / ज़हर या लहर के काफ़िये मिलाने जैसे बचकानेपन से कोसों दूर हैं। हमारे यहाँ उस्ताद के जूते नहीं चाटे जाते। हमारे यहाँ एक स्वतंत्र मनुष्य का निर्माण उसके ध्वन्स की शर्तों पर होता है।
जिनके लिए छंद कविता की शर्त है, ऐसे लड़बहेर न भाषा की उत्पत्ति का विकास जानते हैं न ही उन्हें सभ्यताओं के विकास और विनाश की ही कोई समझ है।
वे एक कोने में पड़े उस्तादानुसार शेर में वज़न कम या ज़्यादा करते रहते हैं और दरिया / सहरा / जाम / शाम करते हुए गिनती के नुकतों पर काफ़िया-पैमाई करते रहते हैं।
हिंदी अतुकांत दरअसल ही भीतरी अतुकांत का बाहरी तर्जुमा है। हालांकि यह वेस्ट से बेहद प्रभावित है। प्रभावित क्या है, अजी नकल ही कहिये। लेकिन नकल भी मौलिक हो जाती है यदि आपके पास निराला / शमशेर / मुक्तिबोध जैसे कवि हों।
कुशाग्र जैसे बच्चों को खुली छूट देनी होगी। आपको नहीं पसंद तो इग्नोर कर दीजिये। लेकिन कम से कम फ़तवेबाज़ी मत कीजिये।
फिर भी, मैं हिन्दवी के संपादक को एक गधा - संपादक कहूंगा जो "रिलेवेंस" में रहने के लिए अपनी ही शरण में आई प्रतिभा को सार्वजनिक हत्या के लिए चुनता है। मैं नहीं जानता हिन्दवी का संपादक किसे प्रसन्न करना चाहता है या उसकी "वामांग-माता" कौन है, जिसे वह नर-बलि चढ़ाता है। यह कोई पहली बार नहीं है। पहले भी कितने ही कवि इस घोंचू संपादक के कारण सार्वजनिक रूप से वि-वस्त्र हुए हैं।
ईश्वर! कुशाग्र को हर बला से बचाए। मेरा उससे कोई परिचय नहीं। लेकिन हिन्दवी अपने इस संपादक की अवैध हरकतों का संज्ञान ले। यह जानबूझकर उठाया हुआ क़दम है। कुशाग्र यदि स्वयं अपने संपादक के विरुद्ध नहीं बोल सकता, तो मैं तो बोल ही सकता हूँ।
मैं उस बच्चे और उस जैसे कई बच्चों की मजबूरी समझता हूँ। यह बच्चे इस भरम में हैं कि हिन्दवी से ही हिंदी - कविता का राजमार्ग निकलता है!
-मनमीत सोनी की फेसबुक पोस्ट
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