Where are you, @RahulGandhi?
Congress is in power in Telangana. Telangana people are protesting against the Congress government for cutting down trees in KBR National Park.
We will all pool funds and match the payment made by China for you to voice against the Nicobar Project if you stand by these people protesting in Hyderabad.
Pinky promise.
हिंदी साहित्य में एक कहानी बहुत मशहूर है — प्रेमचंद के फटे जूते।
लेकिन यह सिर्फ जूतों की कहानी नहीं है, यह एक लेखक की गरीबी, ईमानदारी और आत्मसम्मान की कहानी है।
Munshi Premchand जब किसी कार्यक्रम या सभा में जाते थे, तो अक्सर उनके पैरों में फटे हुए जूते होते थे। जूते इतने पुराने कि तलों में छेद थे, किनारे उधड़े हुए थे। लोग उन्हें देखते, कुछ दया करते, कुछ मज़ाक उड़ाते, और कुछ सोचते — इतना बड़ा लेखक और ऐसे जूते?
लेकिन प्रेमचंद उन जूतों को बदल नहीं पाए…
क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे।
प्रेमचंद ने अपनी ज़िंदगी में कभी लेखन को व्यापार नहीं बनाया। उन्होंने सच लिखा, समाज लिखा, शोषितों की आवाज़ लिखी। और इसी ईमानदारी की कीमत उन्होंने गरीबी से चुकाई। कई बार घर में खाने को नहीं होता था, इलाज के पैसे नहीं होते थे — लेकिन लेखन कभी झूठा नहीं हुआ।
इसी घटना पर व्यंग्यकार Harishankar Parsai ने बहुत तीखी और मार्मिक बात कही थी।
परसाई ने लिखा (भावार्थ में):
“लोग प्रेमचंद के फटे जूतों पर हँसते हैं,
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि
जूते क्यों फटे थे?
जूते इसलिए फटे थे क्योंकि
प्रेमचंद ने उन्हें बदलने से ज़्यादा
अपने ज़मीर को बचाना ज़रूरी समझा।”
परसाई आगे कहते हैं कि समाज को लेखक की सच्चाई से कोई मतलब नहीं, उसे बस दिखावा चाहिए। अगर प्रेमचंद चमचमाते जूते पहन लेते, समझौता कर लेते, सत्ता की तारीफ़ लिख देते — तो शायद उनके जूते नहीं फटते।
लेकिन फिर प्रेमचंद भी नहीं रहते।
फटे जूते इस बात का सबूत थे कि यह आदमी बिकता नहीं है।
ये जूते गवाही थे उस ईमानदारी की, जो भूखी रह सकती है — लेकिन झुक नहीं सकती।
आज प्रेमचंद अमर हैं।
उनके जूते नहीं बचे,
लेकिन उनकी सोच, उनकी कलम और उनका सच —
आज भी जिंदा है।
और शायद इसीलिए,
फटे जूते पहनने वाला वह आदमी
चमचमाते जूतों वालों से कहीं बड़ा था।
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When the entire world is moving towards 4 days a week, only we are deprived of the much needed 5 days banking… RBI, state government, insurance sector is having 5 days a week.. It’s high time that bankers should also be given 5 days a week.
#Implement5DayBanking
दोस्तों एनसीआईबी मुख्यालय द्वारा संचालित “आपका अधिकार - आपका हथियार” मिशन के तहत आज हम इस लेख के माध्यम से जानने का प्रयास करेंगे कि अगर पुलिस एफआईआर दर्ज न करे तो हम क्या करे ?
ध्यान दे कि, पुलिस अधिकारियों को जनता से शिष्टतापूर्वक व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। अगर पुलिस एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करे , दुर्व्यवहार करे , रिश्वत मांगे या बेवजह परेशान करे, तो इसकी शिकायत जरूर करनी चाहिए।
क्या है एफआईआर
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किसी अपराध की सूचना जब पुलिस को दी जाती है तो उसे एफआईआर कहते हैं। यह सूचना लिखित में होनी चाहिए या फिर इसे लिखित में परिवतिर्त किया गया हो। एफआईआर भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अनुरूप चलती है। एफआईआर संज्ञेय अपराधों में होती है। अपराध संज्ञेय नहीं है तो एफआईआर नहीं लिखी जाती।
आपके अधिकार
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• अगर संज्ञेय अपराध है तो थानाध्यक्ष को तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट ( एफआईआर ) दर्ज करनी चाहिए। एफआईआर की एक कॉपी लेना शिकायत करने वाले का अधिकार है।
• एफआईआर दर्ज करते वक्त पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं लिख सकता, न ही किसी भाग को हाईलाइट कर सकता है।
• संज्ञेय अपराध की स्थिति में सूचना दर्ज करने के बाद पुलिस अधिकारी को चाहिए कि वह संबंधित व्यक्ति को उस सूचना को पढ़कर सुनाए और लिखित सूचना पर उसके साइन कराए।
• एफआईआर की कॉपी पर पुलिस स्टेशन की मोहर व पुलिस अधिकारी के साइन होने चाहिए। साथ ही पुलिस अधिकारी अपने रजिस्टर में यह भी दर्ज करेगा कि सूचना की कॉपी आपको दे दी गई है।
• अगर आपने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है , तो पुलिस को एफआईआर के साथ आपकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है।
• एफआईआर दर्ज कराने के लिए यह जरूरी नहीं है कि शिकायत करने वाले को अपराध की व्यक्तिगत जानकारी हो या उसने अपराध होते हुए देखा हो।
• अगर किसी वजह से आप घटना की तुरंत सूचना पुलिस को नहीं दे पाएं , तो घबराएं नहीं। ऐसी स्थिति में आपको सिर्फ देरी की वजह बतानी होगी।
• कई बार पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले ही मामले की जांच - पड़ताल शुरू कर देती है , जबकि होना यह चाहिए कि पहले एफआईआर दर्ज हो और फिर जांच - पड़ताल।
• घटना स्थल पर एफआईआर दर्ज कराने की स्थिति में अगर आप एफआईआर की कॉपी नहीं ले पाते हैं , तो पुलिस आपको एफआईआर की कॉपी डाक से भेजेगी।
• आपकी एफआईआर पर क्या कार्रवाई हुई , इस बारे में संबंधित पुलिस आपको डाक से सूचित करेगी।
• अगर थानाध्यक्ष सूचना दर्ज करने से मना करता है , तो सूचना देने वाला व्यक्ति उस सूचना को रजिस्टर्ड डाक द्वारा या मिलकर क्षेत्रीय पुलिस उपायुक्त को दे सकता है , जिस पर उपायुक्त उचित कार्रवाई कर सकता है।
• एएफआईआर न लिखे जाने की हालत में आप अपने एरिया मैजिस्ट्रेट के पास पुलिस को दिशा - निर्देश देने के लिए कंप्लेंट पिटिशन दायर कर सकते हैं कि 24 घंटे के अंदर केस दर्ज कर एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई जाए।
• अगर अदालत द्वारा दिए गए समय में पुलिस अधिकारी शिकायत दर्ज नहीं करता या इसकी प्रति आपको उपलब्ध नहीं कराता या अदालत के दूसरे आदेशों का पालन नहीं करता , तो उस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के साथ उसे जेल भी हो सकती है।
• अगर सूचना देने वाला व्यक्ति पक्के तौर पर यह नहीं बता सकता कि अपराध किस जगह हुआ तो पुलिस अधिकारी इस जानकारी के लिए प्रश्न पूछ सकता है और फिर निर्णय पर पहुंच सकता है। इसके बाद तुरंत एफआईआर दर्ज कर वह उसे संबंधित थाने को भेज देगा। इसकी सूचना उस व्यक्ति को देने के साथ - साथ रोजनामचे में भी दर्ज की जाएगी।
• अगर शिकायत करने वाले को घटना की जगह नहीं पता है और पूछताछ के बावजूद भी पुलिस उस जगह को तय नहीं कर पाती है तो भी वह तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच - पड़ताल शुरू कर देगा। अगर जांच के दौरान यह तय हो जाता है कि घटना किस थाना क्षेत्र में घटी , तो केस उस थाने को ट्रांसफर हो जाएगा।
• अगर एफआईआर कराने वाले व्यक्ति की केस की जांच - पड़ताल के दौरान मौत हो जाती है , तो इस एफआईआर को डाईरंग डिक्लेरेशन की तरह अदालत में पेश किया जा सकता है।
• अगर शिकायत में किसी असंज्ञेय अपराध का पता चलता है तो उसे रोजनामचे में दर्ज करना जरूरी है। इसकी भी कॉपी शिकायतकर्ता को जरूर लेनी चाहिए। इसके बाद मैजिस्ट्रेट से सीआरपीसी की धारा 155 के तहत उचित आदेश के लिए संपर्क किया जा सकता है।
इसलिए निडर होकर हिम्मत से काम लें। अगर आप निडर रहेंगे तो भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढेंगे। अगर डरेंगे तो आपके द्वारा किए गए असंज्ञेय अपराध के लिए भी आप रिश्वत दे देंगे तथा अनावश्यक डरेंगे और आपके विरुद्ध कोइ संज्ञेय अपराध भी हुआ होगा तो भी जानकारी के अभाव में अपराधी पैसे लेकर छोड़ दिया जाऐगा।
~ सादर : @NCIBHQ
ये भी चुनाव का मुद्धा होना चाइये, लेकिन अफसोस है, जनता को भी अपने स्वार्थ और अज्ञानता मैं कुछ दिखाई नहीं देता।
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To know your own emptiness, you must look at it, but you cannot look at it if your mind is all the time seeking a distraction from the fact that it is empty.
"चैट जीपीटी" पर आचार्य प्रशांत का लेख, अमर उजाला में!
ए.आई क्रिएटिव (सृजनात्मक ) नहीं हो सकती। वो जो कुछ भी कर रही है, वो दिखती भी हो भले कि नया जवाब दे दिया, कहानी लिख दी वो क्रिएटिव नहीं है, है तो रिपिटेटिव (दोहराया गया) ही हां, वो स्मार्टली रिपिटेटिव है तो इसलिए आपको क्रिएटिव लग सकती है, पर वो वास्तव में क्रिएटिव नहीं होती।
और मनुष्यों में जितने आध्यात्मिक मूल्य होते हैं, सिर्फ़ वही हैं जिनको मशीन कभी नहीं पकड़ सकती।