जिस दिन आप कालिदास, भास, भवभूति, विशाखदत्त, बाणभट्ट की दुनिया में प्रवेश करते हैं, उस दिन समझ आता है कि असली ड्रामा तो हमारे भारत में लिखा गया है. इनके आगे हज़ार शेक्सपियर पानी भरते हैं. और फिर अफ़सोस भी होता है कि काश बचपन में थोड़ा मन से संस्कृत पढ़ लिए होते तो आज मालविकाग्निमित्रम के हिंदी अनुवाद से काम नहीं चलाना पड़ता. स्वप्नवासवदत्ता जैसे बेजोड़ नाटक का मर्म कहीं ज़्यादा समझ आता. मुद्राराक्षस में चाणक्य की चाल ज़्यादा समझ आती.
काश शिशु मंदिर बाले आचार्य जी ने दो छड़ी ज़्यादा लागाई होती कि पढ़ लो भाई.. संस्कृत साहित्य पढ़े बिना ख़ुद को लेखक कहना पाप है. 🙃