बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष @madanrrathore, आपने विश्व आदिवासी दिवस मनाने वालो को भेड़चाल कहकर घोर अपमानित किया है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा घोषित विश्व आदिवासी दिवस का संबंध भारत से नही है तो विश्व योग दिवस और विश्व महिला दिवस भी तो संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा घोषित किये हैं। फिर तो इनका संबंध भी भारत से नही होना चाहिए।
पूरे आदिवासी समाज व आदिवासी की कद्र करने वाले उस प्रत्येक व्यक्ति व संगठन को आपने भेड़चाल चलने वाला कहकर अपमानित किया है। उसका जवाब जरूर मिलेगा आपको।
#मदन_राठौड़_माफी_मांगो
धर्म और धर्म की आड़ में जितनी भी संस्कृति चलती है वह मानव जीवन के लिए वेपन की तरह काम करती! वैसे मानव जीवन को एकसार करने वाली संस्कृति प्रकृति है।
यह कथन धर्मशास्त्र को अपना आईना दिखाने के लिए कितना सार्थक है?
धर्मेंद्र प्रधान को ग्लोबल सोशल मीडिया कंपनी मेटा खा गयी।
ओड़िसा के एक सीधे-सादे, ईमानदार, कर्मठ आदमी के साथ अन्याय हुआ है।
पोस्ट लगातार वायरल करके मेटा ने प्रधान के ख़िलाफ़ देश में माहौल खड़ा कर दिया। ऐसे वायरल पोस्ट के क्रिएटर्स को करोड़ों की आमदनी कराई गई। प्रधान के खिलाफ रील बनाना बड़ा बिज़नेस हो गया था। विपक्ष जिस लहर पर सवार हुआ, वह लहर सोशल मीडिया में बनी थी।
अब मेटा के सॉरी बोलने का क्या फ़ायदा? नुक़सान हो चुका है।
ये भी तब हुआ जब प्रधान, पेपर लीक के बिना, नीट का रि-एग्ज़ाम सफलता पूर्वक करा चुके थे। प्रधान ने अफ़सरों और कोचिंग माफिया के नेक्सस को आख़िरकार कंट्रोल कर लिया था। पेपर सेटर टीचरों को लॉकडाउन में रखने की शुरुआत हो चुकी थी।
अगले साल कंप्यूटर से नीट कराने की घोषणा हो चुकी थी।
जब समाधान हो चुका था, तब ख़ासकर इंस्टा के ज़रिए, माहौल बिगाड़ा गया। बेचारे युवा फ़ोमो और MIA के शिकार बने।
मैं निजी तौर पर धर्मेंद्र प्रधान जी की किसी महत्वपूर्ण भूमिका में वापसी की कामना करता हूँ।
वे यूजीसी के षड्यंत्रकारियों से भी लड़ रहे थे, जो सामाजिक कटुता फैलाने में लगे थे, ताकि प्रधान की बदनामी हो।
वे बहुत कठिन जगह पर थे। कांग्रेस के जमाने का मंत्रालय का तंत्र टूटा नहीं है।
@dpradhanbjp@narendramodi
शिक्षा व्यवस्था की बड़ी चुनौती हमारे शैक्षणिक संस्थानों की autonomy और academic freedom का लगातार कमजोर होना है।
विश्वविद्यालय सिर्फ़ degree देने की जगह नहीं होते। वे नए विचारों, scientific temper, शोध और स्वस्थ बहस के केंद्र होते हैं। वे संकीर्ण सोच, अंधश्रद्धा या किसी एक विचारधारा को थोपने की जगह नहीं होते।
लेकिन मोदी सरकार के प्रयासों का उद्देश्य शिक्षा को इस तरह ढालना है कि छात्र सवाल पूछने वाले नागरिक नहीं, बल्कि बिना सोचे-समझे RSS की विचारधारा को स्वीकार करने वाले बन जाएँ।
जब विश्वविद्यालयों में Vice-Chancellors और अन्य शीर्ष पदों पर योग्यता के बजाय RSS की पसंद को प्राथमिकता दी जाती है, तो नुकसान सिर्फ़ एक विश्वविद्यालय का नहीं, बल्कि पूरे देश की उच्च शिक्षा और knowledge ecosystem का होता है।
Inqlaab Ne tumhare ahankar ko ghutnon per La Diya Hai, pratiyogi Pariksha Di ya nahin Di usse fark nahin padta hai, fark padta hai UN mein sahas Hai Kisi ke ghamand ko chaknachur karne ka!
मोदी 25 साल से पदों पर लगातार इसलिए हैं कि वे ठंडा करके खाते हैं. जिद्दी नहीं हैं, इगो पर नहीं लेते. दो कदम आगे जाने के लिए एक कदम पीछे हट सकते हैं. उनके लिए राष्ट्र व जनता सर्वोपरि हैं. पश्चिम के दर्शन से उनको समझना हो तो एडमंड बर्क आपकी मदद करेंगे.
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Modi Method, on Display Again
Change what must be changed to preserve what is worth preserving.
We inherit institutions as trustees, not merely for ourselves but for future generations. Don't let ideology drive the bus. Be pragmatic.
Truly Burkean.
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जंतर-मंतर पर आज संघर्ष की थकान नहीं, जीत की मुस्कान दिखी।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद युवाओं ने नाच-गाकर, गीतों और नारों के साथ अपनी खुशी ज़ाहिर की।
मगरूरों के देश में,जमीर का कोई काम नहीं।
हम सत्ता के मगरूर हैं,इस्तीफे नहीं,देशद्रोही, नक्सलवाद, आतंकवाद —हमारी ढाल हैं।
मजाल है किसी की हमें हटा दे,भले तुम भूख से तड़पकर मर जाओ।परवाह नहीं हमें तुम्हारी,न आने वाली पीढ़ियों की।