*नौकरी की आस में 210 दिन से डीएड अभ्यर्थियों का आंदोलन जारी: अब नियुक्ति की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर से भरी हुंकार, केंद्र और राज्य के शिक्षा मंत्रियों से मांगा इस्तीफा*
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जब कोई युवा नौकरी की मांग लेकर 206 दिनों तक आमरण अनशन पर बैठा रहे और फिर दंडवत् प्रणाम करते हुए विधानसभा तक जाने को मजबूर हो जाए तो सवाल केवल भर्ती का नहीं व्यवस्था की संवेदनशीलता का भी बन जाता है। यदि वास्तव में न्यायालय के आदेश हैं और रिक्त पद मौजूद हैं तो देरी किस बात की है? अगर आदेशों पर अमल नहीं हो रहातो संविधान और न्यायपालिका की गरिमा का क्या अर्थ रह जाता है? दूसरी ओर यदि सरकार के पास कोई कानूनी या प्रशासनिक बाधा है तो उसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं किया जाता? लोकतंत्र में युवाओं को बैरिकेड और पुलिस नहीं संवाद और समाधान मिलना चाहिए। 206 दिनों का संघर्ष किसी भी सरकार के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
मैं एक महिला हूँ शादी के बाद मैंने 2023 शिक्षक भर्ती का एग्जाम दिया जो मेरे लिए कठिन था लेकिन मैंने परिश्रम से परीक्षा पास किया।
सुशासन तिहार में हम भाजपा सरकार से अनुरोध करते हैं कि हमारी पीड़ा को समझें और हम सभी डीएड अभ्यर्थियों को नियुक्ति दें।
-छत्तीसगढ़ में नौकरी के लिए आस लगाए डीएड अभ्यर्थी।
नियुक्ति को लेकर हम 158 दिन से धरने पर बैठे हुए है, हम हर प्रकार के प्रदर्शन कर चुके है सरकार को मनाने।
कोर्ट से हमे न्याय मिल चुका है, लेकिन सरकार से नहीं मिल रहा। हमारी बातों को अनसुना किया जा रहा।
-छत्तीसगढ़ की युवा।
संवेदनहीन भाजपा सरकार में डीएड अभ्यर्थी जल समाधि लेने को मजबूर...
राजधानी में 98 दिनों से आंदोलन कर रहे डीएड अभ्यर्थी 2300 पदों पर भर्ती की मांग को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन सरकार सुनने को तैयार नहीं है और हालात इतने बिगड़ चुके हैं
रायपुर में डीएड अभ्यर्थियों का उग्र होता आंदोलन कई गंभीर सवाल खड़े करता है। साढ़े तीन महीने से आमरण अनशन, खून से पत्र, अंगारों पर चलना और अब जल समाधि की कोशिश क्या यही तरीका बचा है अपनी बात सुनाने का? सरकार से सीधा सवाल है आखिर इन अभ्यर्थियों की मांगों पर फैसला क्यों नहीं हो रहा? अगर इनके पक्ष में कोर्ट के आदेश हैं, तो नियुक्ति में देरी किस आधार पर? बार-बार आश्वासन देकर टालना क्या युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जो युवा कल बच्चों को पढ़ाएंगे, वे आज खुद असुरक्षा और अनिश्चितता में जी रहे हैं। महिला अभ्यर्थियों की भागीदारी इस संघर्ष की पीड़ा को और गहरा करती है। अब वक्त है कि सरकार संवेदनशीलता दिखाए, क्योंकि यह सिर्फ नौकरी नहीं, प्रदेश के भविष्य का सवाल है।
#Chhattisgarh
माननीय मुख्यमंत्री @vishnudsai जी और माननीय शिक्षा मंत्री @GajendraYdvBJP जी.. क्या सच में हम युवाओं के लिए इतने बुरे दिन आ गए है जो अपने अधिकार व न्याय के लिए लड़ना पड़ेगा, आप को हमारे मुखिया हो आप से ही उम्मीद है... जल्द से जल्द हमे सहायक शिक्षक पद पर नियुक्ति दो।
बर्बर भाजपा सरकार में 88 दिनों से अभ्यर्थी सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं।
नौकरी की मांग कर रहे युवाओं को सुनने की बजाय डबल इंजन सरकार कभी इन्हें जेल भेज देती है तो कभी साय सरकार की पुलिस इनके साथ बर्बरता की हदें पार कर देती है।
दमन की इंतेहा!!!
विधानसभा में अपने हित के सवाल का जवाब सुनने के लिए जाना भी अब अपराध बन चुका है।
विधानसभा की दहलीज पर कदम रखते ही डीएड अभ्यर्थियों को पकड़कर जेल भेज दिया गया।
युवा सवाल करे तो हथकड़ी,
हक माँगे तो धाराएँ,
और न्याय की जगह दमन!