जो व्यक्ति आपके,बुरे समय में साथ देने की बजाय आपकी कमिया गिनाने लग जाए।
तब समझ जाये की।
उस व्यक्ति से ज्यादा मतलबी,स्वार्थी कोई है ही नहीं।
तुरन्त उससे दूर हो जाये।
-गुरु चाणक्य
जिस प्रकार अग्नि को मस्तक पर धारण करने पर भी वह मस्तक को जलाती ही है।
उसी प्रकार नीच-दुष्ट आदमी को कितना भी सम्मान दो।
वह सदैव आपको दुख-कष्ट ही देगा।
-गुरु चाणक्य
श्रीमद्भागवत गीता जयंती मार्गशीर्ष मास के 11वें दिन (मोक्षदा एकादशी) को मनाया जाता है।
जो कि 3.12.22 को पड़ रहा है।
इस दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के उपदेश दिया था।
जो हिन्दू धर्म का पवित्र एवं पूजनीय ग्रन्थ है।
जिसमे 18 अध्याय,कुल 700 श्लोक है।
जिसके लेखक महर्षि वेदव्यास हैं
जब आदमी में शक्ति-समार्थ नहीं होता है,तो वह साधू बन जाता है। धनहीन घोर गरीबी में रहने वाला मनुष्य,ब्रह्मचारी बन जाता है।
रोगी मनुष्य,प्रभु की भक्ति मे लीन हो जाता है।
बुजुर्ग स्त्री,पति के प्रति समर्पित हो जाती है।
-गुरु चाणक्य
जो हमे मिलता है।
उसे हमे उसी प्रकार लौटना चाहिये।
अर्थात कोई हमारी मदद करता है।
तो हमे भी उसकी मदद करनी चाहिये।
अगर कोई हमारे साथ दुष्टता,गलत व्यवहार आदि करता है।
तो हमे भी उसके साथ वैसे ही करना चाहिये।
इसमें कुछ भी अनुचित नही होगा।
न पाप लगेगा।
-गुरु चाणक्य
कठोर अहंकार युक्त वाणी,अग्नि की जलन से भी ज्यादा तेज जलाती है।
ज्यादा तीव्र दुःख देती है।
किसी व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु उसकी वाणी होती है।
-गुरु चाणक्य
जिस प्रकार अग्नि को मस्तक पर धारण करने पर भी वह मस्तक को जलाती ही है।
उसी प्रकार नीच-दुष्ट आदमी को कितना भी सम्मान दो।
वह सदैव आपको दुख-कष्ट ही देगा।
-गुरु चाणक्य
जिसका ज्ञान किताब तक ही रह गया है अर्थात किताबी कीड़ा बन गया है।
जिसने अपनी सम्पति किसी दूसरे को सौप दिया है।
जरूरत पड़ने पर इन दोनों में से कोई भी उसके कभी काम नही आयेगा ।
-गुरु चाणक्य
छात्र जीवन मे,इन निम्नलिखित बातों का त्याग कर देना चाहिए,
1. काम।
2. क्रोध।
3. लोभ।
4. स्वादिष्ट भोजन की अपेक्षा।
5. शरीर का शृंगार।
6.अत्याधिक जिज्ञासा।
7.अधिक निद्रा।
8.शरीर निर्वाह के लिए अत्याधिक प्रयास।
-गुरु चाणक्य
राज परिवारों के लोगो से शिष्टाचार सीखे।
विद्वान पंडितो से बोलने की कला सीखे।
सट्टेबाज जुआरियो से झूट बोलना सीखे।
स्त्रियों से छल करना सीखे।
-गुरु चाणक्य
विद्या-ज्ञान परदेस मे हमारा मित्र है।
धर्मपत्नी घर पर हमारी मित्र है।
औषधि बीमार मनुष्य की मित्र है। मरते वक्त,जो पुण्य कर्म पूरे जीवन मे किया है।
वही परलोक में हमारा मित्र है।
-गुरु चाणक्य