@HajiNizamuddin3@Sajid7642 बात ताज़िया और मूर्ति की है ही नहीं अपनी अपनी अक़ीदत है आप ये देखिए कि आज अगर ताज़ियादारी न होती तो यज़ीद कमीना भी तारीख़ के पन्नों में चुप जाता,जो यज़ीद को अपना नाजायज़ बाप मानते हैं वो तक अपने बच्चों का नाम यज़ीद नहीं रखते हैं
@BHEEM_BAUDH अशिक्षा और अंधभक्ति और ग़रीबी और बेरोज़गारी ये सारी हरकतें करने पर मजबूर करती हैं बाक़ी मोहर्रम तो इमाम हुसैन का ग़म मानने के लिए हैं न कि अपने को काटने के लिए