ज़िन्दगी बेरंग सी है
क्या करूं मैं इस बसंत का
एक मुद्दत हुई है तुझे देखे
क्या करूं मैं इस तन्हाई का
चला हूं बदहवास सा
क्या करूं मैं इस बैचेनी का
न पतवार है न साहिल है
क्या करूं मैं इस कश्ती का
-योगेश कुमार "दौलटा"
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