Mr. Musk, yes, no billionaire should dictate a nation’s policy - Indian or American.
India must welcome competition in satellite internet, from Indian and global providers, whoever offers the most practical and affordable last-mile solution for those in remote regions. In countries with lower per-capita incomes, satellite internet must be affordable too. High subscription fees and equipment costs risk putting it beyond the reach of ordinary households. Connectivity must bridge the digital divide, not create a new one.
India knows our networks and spectrum are strategic infrastructure, not merely commercial assets. India’s national security safeguards are non-negotiable.
Every country makes choices based on its own interests. Those in the West cannot preach free markets while practicing protectionism at home. USA imposed 100% tariffs on Chinese EVs to protect its domestic industry, just as India takes measures to protect its own domestic manufacturers. Both India and the US have restricted Huawei over security concerns. One cannot demand a level playing field from others only when it suits its own agenda.
Indians will internally debate, question and address our strengths and shortcomings as a democratic country.
Take BharatNet, India’s programme to bring broadband to village-level local bodies. We will question why, as the CAG’s 2026 audit report found, the programme is struggling to meet its original objectives. Why were only 33.2% of service-ready Gram Panchayats operational, despite ₹39,888 crore being spent? At the same time, we know to appreciate our telecom sector and regulations, which has made internet data among the world’s most affordable, bringing millions online.
India is a democracy, not a colony. We welcome the world, but we, the Indian people, will decide our own future - not Western vested interests, their double standards or any billionaire - Indian or American.
So many business people at least from Mumbai, Pune and Gujarat are no more talking flights. They are simply hitting the road. One can see numerous GJ and MH registration vehicles all over India with just one person in the driving seat. Because driving in the comfort of your own vehicle makes better economic sense than paying exorbitant Flight fares and then again hiring cabs locally.
Apologies in advance if my post hurt any institution
But this needs to be said from a common man
- Our enemies knows about our Units, Officers, their daily routine, their faces ,their ranks
Everything.
Thanks to social media..
Whether it be
- Para
- Garud
- Marcos
Everything is being posted blatantly on social media by their relatives without any fear.
Many relevant people are on TL, Hope they understand the magnitude of the situation.
Jai Hind 🇮🇳
पुलिस की नौकरी बहुत कठिन है अगर वो कम से कम एस पी के स्तर की न हो।
कांस्टेबल से दारोगा तक की नौकरी तो नरक ही है।
इंस्पेक्टर और सी ओ बहुत ज्यादा तनाव में रहते हैं।
ये ऐसी नौकरी है जो व्यक्ति को शारीरिक मानसिक और नैतिक हर तरह से मार देती है।
बद्रीनाथ धाम में संगीत समारोह ( DJ concert) को अनुमति प्रदान करना ना केवल सांस्कृतिक मर्यादाओं का उन्लंघन है अपितु धाम की पवित्रता पर भी सीधा आघात है। आदि गुरु शंकराचार्य महाराज जी द्वारा इस धाम की स्थापना हिमालयी पर्यावरण मे शांतिप��र्ण तरीके से भगवत भजन के लिए की थी उल्लेखनीय है की इस स्थान पर शंख बजाना भी मना है परंतु हम उसे भूलकर शोर शराबे वाले संगीत कार्यक्रमों का आयोजन कर भारतीय आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय मूल्यों की घोर उपेक्षा तो कर ही रहे है साँथ में इतनी ऊचाई पर हजारों लोगो के नाचने से उनके स्वास्थ पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की भी उपेक्षा कर रहे है। यह इस बात का प्रतीक है कि अब देवभूमि को बाजारू संस्कृती के रूप में परिणीत किया जा रहा है।
मैं भारतीय संस्कृति के अनुयायीयों तथा विशेषकर पूजनीय शंकराचार्यों तथा महात्माओं से यह अनुरोध करता हूँ कि वह संस्कृति के इस क्षरण को रोकने के लिए प्रभावी आवाज उठाये, मैं केंद्र एवं राज्य सरकार से भी आग्रह करूँगा कि वह ऐसे आयोजनों पर प्रतिबंध लगा कर देवभूमि की मर्यादा को बनाये रखें,
हिमालय देवात्मा है भगवान शंकर का निवास माँ गंगा का उद्गम है इसे नाच ग्रह बनाना करोड़ो भारतीयों की आस्था पर गहरा आघात है।
💥Like big, mature nations tackle with a tacit understanding of give and take.
- the details of the deal is not for public discussion.
Russia and the US have been exchanging silently and gracefully without making a noise. Their media also has a level of maturity to maintain the future possibility of deals.
The life of assets is way more important than the irrelevant public discourse on what was exchanged. Once things go public, future deals won't be possible, which is death for the assets caught in the future.
कल लखनऊ से एक पत्रकार मित्र का फोन आया। फेसबुक से जुड़े ���ैं। करीब 72-73 वर्ष के हैं। इसी मंच पर संपर्क हुआ।
उन्होंने एक सवाल किया, "..प्रिंट पत्रकारिता का भविष्य आपको क्या लगता है?"
उनसे कहा, "...मुझे तो हर आने वाला समय सुखद लगता है, क्योंकि हर वर्तमान #विनाश का होता है और हर भविष्य #सर्जन का।"
फिर उनसे कहा, दो-ढाई सौ साल लग गए #प्रिंट_पत्रकारिता को अपनी साख खोते, लेकिन यही लोकविश्वास सिर्फ 20 से 30 सालों में #इलेक्ट्रॉनिक_पत्रकारिता ने खो दिया..और देखिए, सिर्फ दस सालों में #सोशल_मीडिया की साख जमीन पर है...!
हर दिन नए इंफलयून्सर पैदा हो रहे हैं, और पुराने इंफलयून्सर मर र���े हैं..हर दिन लाखों लोग सोशल मीडिया से जुड़ रहे हैं, वहीं हजारों लोग निष्क्रिय हो रहे हैं..!
मेरे जैसा एक सामान्य समझ का व्यक्ति तय नहीं कर पा रहा है, किसको सही और किसे गलत माने? हम कुछ भो तय नहीं कर पा रहे हैं..और देखिए, इंफलयून्सर का असल धंधा #धनिया_पुदीने का क्रॉस प्रमोशन हो च���का है।
थोड़ी प्रतीक्षा करें, सफेद कागजों पर छपे काले शब्दों की विश्वसनीयता फिर लौटेगी। कब तक? यह मुझे नहीं पता। संभव है, यह हमारे-आपके जीवनकाल में हो जाए। या फिर ना हो।
आखिर में कहा, "....यह दृष्टि मुझे #सनातन_कालबोध देता है, जो वृत्ताकार है.. इस्लाम और वामपन्थ की तरह #सीधी_रेखा नहीं।"
ऐसे में एक हिन्दू कैसे हतोत्साहित हो सकता है? यदि उसका कालबोध वृत्ताकार है, जो स्वयं #महाकाल है? या तो निराशा फैला रहे हिंदुओं को महाकाल में आस्था नहीं या फिर भीतर से खोखले हो चुके हैं? मात्र दावा बचा, हम हिन्दू हैं!
विनाश और सृजन..
एक के बाद एक।
एक के बाद एक।
यही आशा है!
यही निराशा है।
एक हिन्दू कभी निराश नहीं हो सकता। और एक निराश व्यक्ति कभी हिन्दू नहीं हो सकता।
- 1020–1140, चालुक्यों बनाम परमारों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1100–1200, परमारों बनाम चौहानों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1150–1180, चालुक्यों बनाम चौहानों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1160–1180, च���हानों बनाम गहड़वालों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1200–1500, सिसोदियों बनाम राठौड़ों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1300–1400, सिसोदियों बनाम परमारों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1300–1500, सिसोदिया वंश के भीतर उत्तराधिकार के युद्ध: कोई जौहर नहीं
- 1300–1400, राठौड़ों बनाम परमारों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1350–1500, राठौड़ों बनाम भाटियों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1100–1300, कछवाहों बनाम चौहानों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1000–1200, चौहान व���श की विभिन्न शाखाओं के आंतरिक संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1100–1300, भाटियों बनाम जादौन का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1100–1150, तोमर बनाम चौहान संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1400–1500, राठौड़ों बनाम कछवाहों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
राजपूतों के बीच मुस्लिमों की किसी भी भागीदारी के बिना कम-से-कम दो दर्जन बड़े युद्ध लड़े गए। इनमें से एक भी युद्ध में किसी भी प्रकार का आत्मदाह नहीं हुआ। एक भी नहीं। न तो भारतीय और न ही विदेशी विव���णों में इसका एक भी उदाहरण मिलता है।
अब यह देखिए:
- 712–712, सिंध के राजा दाहिर बनाम मुहम्मद बिन क़ासिम: जौहर हुआ।
- 1232–1232, ग्वालियर (राजपूत) बनाम इल्तुतमिश: जौहर हुआ।
- 1301–1301, रणथंभौर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर हुआ।
- 1299–1299, जैस��मेर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर हुआ।
- 1303–1303, चित्तौड़ बनाम अलाउद्दीन खिलजी: चित्तौड़ का पहला जौहर।
- 1327–1327, कम्पिली बनाम मुहम्मद बिन तुगलक: जौहर हुआ।
- 1326–1326, जैसलमेर बनाम ग़ियासुद्दीन तुगलक: जौहर हुआ।
- 1486–1486, कुवा (कांकावती) बनाम महमूद बेगड़ा: जौहर हुआ।
- 1528–1528, चंदेरी बनाम बाबर: जौहर हुआ।
- 1535–1535, चित्तौड़ बनाम बहादुर शाह: चित्तौड़ का दूसरा जौहर।
- 1543–1543, रायसेन बनाम हुमायूँ: तीन जौहर हुए।
- 1568–1568, चित्तौड��� बनाम अकबर: चित्तौड़ का तीसरा जौहर।
- 1634–1634, बुंदेलखंड बनाम औरंगज़ेब: जौहर हुआ।
- 1710–1710, दद्दानाला बनाम मीर फ़ज़लुल्लाह: जौहर हुआ।
कोई भी जौहर का महिमामंडन नहीं करता। यह कोई उत्सव या मनोरंजन नहीं था।
हम इसका सम्मान करते हैं। नहीं, आत्मदाह का नहीं, बल्कि उस पीड़ादायक भावना का, जो इसके पीछे थी। हम इसका सम्मान इसलिए करते हैं क्योंकि इस भावना के माध्यम से हम अपने पूर्वजों की स्मृति को जीवित रखते ह��ं। जानते हैं क्यों?
क्योंकि जिन राक्षसी प्रवृत्तियों ने हमारे पूर्वजों को ऐसी चरम परिस्थितियों तक पहुँचाया था, वे आज भी हमारे बीच जीवित हैं और साँस ले रही हैं।
और उनमें ज़रा भी बदलाव नहीं आया है।
जब कोई व्यक्ति आपके स्पर्श को स्वीकार करने की अपेक्षा मृत्यु को चुनना पसंद करे, तो आखिर आप हैं क्या?
जब कोई व्यक्ति X (Twitter) पर 500-1000 लोगों को फॉलो करता है, तो उसकी फॉलोइंग लिस्ट से कोई स्पष्ट राजनीतिक या वैचारिक निष्कर्ष निकालना मुश्किल होता है।
लेकिन जब कोई व्यक्ति सिर्फ 25–30 लोगों को ही फॉलो करता हो, तो उसकी पसंद बहुत कुछ कहती है। ऐसी ��्थिति में उसकी फॉलोइंग लिस्ट को देखकर उसके वैचारिक झुकाव का अंदाजा लगाना काफी आसान हो जाता है।
तुकाराम मुंडे का, ध्रुव राठी और रामचंद्र गुहा, एन राम, the wire जैसे एकाउंट्स को फॉलो करना भी अपने आप में एक संकेत है।
इसलिए जो व्यक्ति आज आपको “प्रारंभिक केजरीवाल” जैसा दिखाई दे रहा है, उससे सावधान रहने की जरूरत है। मेरा अनुमान है कि समय के साथ वह “धूर्त केजरीवाल” के रूप में सामने आ सकता है।
बल्कि मे���ी नजर में, उस दिशा में उसका रूपांतरण शुरू हो चुका है।
मैं तो इतना नहीं समझ सकता लेकिन आप लोग ज्यादा जानकारी और अनुभवी हैं।
प्रसिद्ध दार्शनिक हर्बर्ट स्पेंसर के बारे में पढ़ रहा था कि जब उनका निधन हुआ तो एक ईसाई की तरह उन्हें दफनाया नहीं गया बल्कि उनका अग्नि दाह किया गया। वह भारतीय दर्शन से इस प्रकार प्रभावित थे कि अपनी देह को दाह संस्कार से पंचतत्व में विलीन करवाया। प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने एक हजार पाउंड देकर उनका स्मारक बनवाया था।
उनक��� पुस्तक का नाम Educarion है। उनकी एक अन्य पुस्तक का नाम अनंतता है जिसमें मृत्यु का बहुत रोचक और भयावह वर्णन किया गया है।
For the entire Indian hinterland we need a dense network of 1000 metre airstrips with a small maintenance hangar.
#UDAAN must be bush plane level affordable much like what the Russian/Ukranian/Latvian pilots run in North and Central Africa.
Self help refuelling from tractor bowsers, a flight attendant who doubles up as a loader and a pilot who ushers people in.
The average country bumpkin doesn’t need that shiny terminal , cafés , lounges and the all the complexity therewith.
The bevy of landing , parking , aero bridge and ground handling charges needs be minimised to the bare minimum.
Let Dorniers fly 30 minute hops like state buses and let them lug people , livestock and cargo on the cheap.
That would be truly liberalising aviation for the masses @RamMNK@MoCA_GoI
बचपन से किशोर होने तक मेरे प्रिय लेखक थे #मैक्सिम_गोर्की। खासकर उनके तीन खंडों की आत्मकथा..मेरा बचपन! मेरा विश्विद्यालय और मां।
इस लेखक ने मुझमें इतना आत्मविश्वास दिया कि जब कभी पिताजी पूछते थे, "...लाट साहब हो? IAS नहीं बने तो क्या करोगे? क्यों नहीं रेलवे, एजी ऑफिस य�� बैंक के लिए अप्लाई करते?"
तो पल गंवाए बिना एक उत्तर देता था, "...IAS नहीं बना तो #खलासी बनूंगा! फिर ट्रक चलाना सीख कर ड्राइवर बन जाऊंगा. देश-दुनिया घूमूंगा!" क्योंकि बचपन में गोर्की भी पानी के जहाज में पल्लेदार बन गया था।
पिताजी से एक बात और बोलता, "...दुनिया में पांच-दस अरब लोग हैं..हर पल दस-बीस लाख मर रहे हैं..कौन करता है इन मौत की परवाह? फिर मेरी चिं��ा क्यों?" यह दीगर है, 14-15 साल की उम्र में ही किताबों के बुक कवर डिजाइन कर, दीवारों पर विज्ञापन पेंट करके कमाना शुरू कर दिया था।
यह सच है, अभावग्रस्त बचपन या तो खत्म कर देता है। या फिर लोहा बनाकर छोड़ेगा। अभाव का अपमान और उपेक्षा को जिस बचपन ने भोगा है, वह बचपन शांति या पलायन का नहीं हो सकता। वह बचपन बेचैन रहता है। कुछ करने को! कुछ पाने को!
युवाओं से यह सब कहने का अभिप्राय सिर्फ इतना है, जीवन को #पराश��रित होकर मत सोचो। ना यह सोचो, जीवन बदलने का ठेका मां-बाप या सरकार का है। जीवन आपका है, इसे आप ही बदलोगे। कल जब #कांग्रेस की हुकूमत थी, तब भी जीवन में संघर्ष था। आज जब #भाजपा है, तो भी जीवन में संघर्ष है।
अपना नायक खुद चुनो। प्रभु राम को या फिर राहुल गांधी को। इसका निर्णय स्वयं करो। लेकिन ��क बात याद रखना, सोशल मीडिया पर जो #दलदल है, वह तुमको #नपुंसक बनाकर अकेला छोड़ देगा। यह सोशल मीडिया आपको #विश्वास नहीं दे रहा है।
आंदोलनरत #झारखंड के युवा जीवन के अभाव, पराजय में तप कर आए हैं। इसलिए अनुशासित हैं। मर्यादित हैं। भाषा संयमित है। विदेशों से जिमेटी या स्वेगी पर ऑर्डर से आ रही #बिरयानी के भरोसे नहीं हैं। चूड़ा-दही जिंदाबाद! ना इनके संघर्ष में कोई मसीहा जुनैद आकर खड़ा हुआ है।
मुझे यह भी पता है, झारखंड के ये युवा हारेंगे..क्योंकि #परिवर्तन मांग रहे इन युवाओं का सरपरस्त कोई जार्ज सोरोस नहीं, कोई कंपेशन इंटरनेशनल नहीं! कोई राहुल या अखिलेश नहीं! पाकिस्तान से कोई हैंडलर नहीं। कोई शबाना आजमी या नसीरुद्दीन शाह या अशोक वाजपेयी नहीं।
पर हार से #संघर्ष कभी विराम नहीं लेते। यह मानव की श���श्वत प्रकृति है।
ये हैं किशोर मंडल!
आंदोलनकारी छात्रों के लिए घर से खाना बना कर ला रहे हैं। बिरयानी नहीं, सामान्य खाना। कल देखा, एक किन्नर ने आकर 50 हजार ₹ दिए। आज सुन रहा हूं, तमाम स्वयंसेवी संस्थाओं ने लंगर खोल दिए हैं। पर शबाना, सोनाक्षी सिन्हा या नसीर अभी तक नहीं आए। और ना कभी आएंगे।
सत्तर से नब्बे के दशक तक छात्र आंदोलनों में #शिक्षा को लेकर दो नारे थे..
■ शिक्षा का #व्यवसायीकरण खत्��� करो।
■ शिक्षा को #रोजगार से जोड़ो।
सवाल आभासी पटल पर सक्रिय विद्वानों से! सवाल कारोबारी टीवी पर बैठ कर देश-दुनिया को ज्ञान दे रहे बौद्धिकों से..! सवाल #सत्ता और #विपक्ष, दोनों से। सवाल व्यापक समाज से।
■ आज आपका क्या #नारा है?
नारा यानी दिशा या ��क्ष्य!
यदि उत्तर नहीं तो #चुप रहो। हमारी चुप्पी ज्यादा हित करेगी आने वाली पीढ़ी के लिए।
@narendramodi
@RahulGandhi
सुप्रसिद्ध जगन्नाथ यात्रा का आरंभ 16 जुलाई से है, लेकिन इससे पहले ही Iskon Temple ओडिशा के बाहर #जगन्नाथजी की यात्रा निकाल र���ा है।
इस पर पुरी के राजा गजपति महाराजा दिव्यसिंह देब ने आपत्ति जताई है। महाराजा गजपति मंदिर के लिए फैसल��� लेने वाली सबसे बड़ी संस्था श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति (SJTMC) के अध्यक्ष भी हैं। महाराजा दिव्यसिंह देब ने इस्कॉन पर लोगों को गुमराह करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है।
ध्यान रहे, पुरी राजा के विरोध का आधार #माझिल_पांजी है, इसके एक निर्देश की भी अवहेलना जगन्नाथ मंदिर और पुरी राजा नहीं कर सकते।
सवाल है, हिंदुओं के धर्म अनुशासन को तोड़ कर इस्कॉन हासिल क्या करना चाहता है? इस बिंदू पर आकर बं��ाल में इस्कॉन को मिड डे मील का दायित्व दिए जाने के @SuvenduWB सरकार के फैसले पर संशय हो रहा है।
UP Governor Anandiben Patel:
🗣️ “Whether you become an IAS officer or a teacher, FIRST BECOME an EXPERT MOTHER.
— You should know how to cook food at home."
Feminists are after her. Thoughts?👇🏻