अभिजीत दीपके ने यह बहुत ही बेहतरीन जवाब दिया सवाल करने वाले को भी इसकी उम्मीद नहीं थी
यहां अभिजीत दीपके की बात बिल्कुल सही है किसी को कोई डर ही नहीं है इसीलिए अपनी गलतियां नहीं सुधार रहें।
Ayurveda colleges teach students 5.5 years, the so-called Ayurvedic medicine and surgery (BAMS) only for them to make reels showing treatment of a terrible disease like avascular necrosis (AVN) of the hip by burning the skin of patients using sharp hot rods, while making the other patients sit around and chant religious verses and then making them applaud to this nonsense.
Still want to call these people "Doctors?"
One must be really mental to support this.
Source: https://t.co/bTANCiiHyy
मजा तो तब था जब गीता जल जाती और लोग बच जाते: शंकराचार्य
बात 100% सही है क्योंकि धर्म इंसान के लिए बनाया गया है ना कि धर्म के लिए इंसान बनाएं गये!
और स्थूल,भौतिक चीजों पर प्रकृति अपना प्रभाव छोड़े बगैर नहीं रहती
3. जादव पायेंग की कहानी, वह व्यक्ति जिसने 37 वर्षों तक असम, भारत के माजुली द्वीप पर हर दिन एक पेड़ लगाया। अब उसने न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क से दोगुने आकार का एक जंगल और वन्यजीव अभ्यारण्य बना दिया है
कौन है ये बेवकूफ़, पहले तो इसको ससपेंड करो, इनके बाप का राज है क्या, बात करने की तमीज नहीं है, ये मालिक बना घूम रहा है, अंग्रेजी बोल लेने से ये इंसान नहीं बन जायेगा..
@KraantiKumar ऐसे Parents होने चाहिए, जो अपने बच्चों की गलती को समय रहते ठीक करा सकें।
ताकि आज की गलती कल अपराध का कारण न बन जाए। https://t.co/ZOnMyhLvRX
जो भक्तिनें हिन्दू-राष्ट्र चाहती हैं और सनातन का शासन
उनके लिए खास पेशकश 👇
हालाँकि न वे समझी हैं और न समझेंगी
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सती प्रथा अंग्रेजों ने बंद करवाई थी इस प्रथा को फिर से चालू करवाना चाहिए, कुछ महिलाओं को धर्म का भूत चढ़ा हुआ है उन्हें मालूम चलना चाहिए कि धर्म के नाम पर पहले क्या-क्या होता था।
सती प्रथा की माँग कर रही है भाजपाई नेता
पति की मृत्यु के बाद ही उसकी विधवा को एक कटोरा भांग और धतूरा पिलाकर नशे में मदहोश कर दिया जाता था। जब वह श्मशान की ओर जाती थी, कभी हँसती थी, कभी रोती थी और तो कभी रास्ते में जमीन पर लेटकर ही सोना चाहती थी और यही उसका सहमरण (सती) के लिए जाना था। इसके बाद उसे चिता पर बैठा कर कच्चे बांस की मचिया बनाकर दबाकर रखा जाता था क्योंकि डर रहता था कि शायद दाह होने वाली नारी दाह की यंत्रणा न सह सके। चिता पर बहुत अधिक राल और घी डालकर इतना अधिक धुआँ कर दिया जाता था कि उस यंत्रणा को देखकर कोई डर न जाए और दुनिया भर के ढोल, करताल और शंख बजाए जाते थे कि कोई उसका चिल्लाना, रोना-धोना, अनुनय-विनय न सुनने पाए। बस यही तो था सहमरण..... " सतीप्रथा ।
सतीप्रथा से छुटकारा दिलाने वाले लोर्ड विलियम बेन्टीक और राजा राममोहन राय को सलाम।
फिर से सतीप्रथा की ओर ना चले जाय इसके लिए चौकन्ना रहना होगा।
2014 के चुनाव अभियान में चुनाव "सबका साथ, सबका विकास" और "अच्छे दिनों" का कलेवर था।
लेकिन इसकी भीतर "सहजादेsss" जैसा जुमला, "राजपरिवार" से नफरत और "पप्पूकरण" की अंतर्धारा भी थी।
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यह सब भुलाकर, 2018 में अविश्वास प्रस्ताव की बहस के दौरान, राहुल गांधी उठे और प्रधानमंत्री को गले लगाने की कोशिश की।
यह अप्रत्याशित था।
हम टीवी पर देखने वालों की तुलना में स्वयं प्रधानमंत्री के लिए कहीं ज्यादा अप्रत्याशित था।
वे स्तम्भित से बैठे रहे। राहुल ने वैसे ही बैठे पीएम को गले लगाया, लौट गए।
पीछे पीएम अजीब से नक्काल एक्सप्रेशन देते, उपहास उड़ाते दिखे।
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इस घटना को अलग कल्पना से देखिए। गले लगाने को आये राहुल को पीएम ने उतनी ही गर्मजोशी से गले लगाया।
दोनों की गले लगते, हाथ पकड़े, हंसती तस्वीरे छपी। हमारा प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता के साथ सौहार्द से खड़ा है। विपक्ष, अविश्वास प्रस्ताव हार चुका है ( केवल 42 सीट थी, हारना ही था)
तो उस तस्वीर में विजयी पीएम स्वतः ही बड़ा दिखता, छोटा तो राहुल को ही दिखना था।
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पर ये तस्वीर कटुता का वातावरण खत्म कर देती। जमीनी तौर पर दोनों दलों के समर्थकों का एक दूसरे को देशद्रोही- गद्दार कहना, और गालियां देना बन्द हो जाता।
असल महत्व के मुद्दों पर बात होने लगती। जमीनी राजनीति एकदम से बदल जाती।
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इस बार भी,राहुल ने अर्थव्यवस्था और वैश्विक हालात के संदर्भ में एक वेल क्रॉफ्ट स्पीच दी। हां, राजनैतिक तंज भी थे।पीएम ने जवाब में वही किया जिसके लिए पहचान बन चुकी है।
वही विद्वेषी व्यक्तव्य, निजी आक्षेप, सस्ते तंज और उबाऊ मोनोलॉग..
वे कह सकते थे कि विपक्षी नेताओं के अमुक अमुक बातों पर असहमति होते हुए भी, xyz चीजो पर विपक्ष के कन्सर्न से सहमत है, और समाधान के लिए abc कदम उठा चुके है।
उसी बात को कहने का दूसरा तरीका, जिसमे आप समावेशी होते है, प्रधानमंत्रीय गरिमा को मेंटेन रखते है।
पर उनसे हुआ नही।
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नही हुआ, क्योकि प्रधानमंत्री की पूरी राजनीति व्हाटअबॉउटरी और एब्यूज पर ही आधारित है।
कटुता उनकी पूंजी है, गालियां उनका हथियार। करारा जवाब मिले, तो आंसू बहाकर विक्टिम भी बन जाते है।
दरअसल, विकास के उनके तमाम दावे, प्रश्नाधीन हैं। इसलिए वे व्हाट अबॉउटरी की भाषा मे बात करते है- नेहरू होते, तो वैसा हो जाता।
इंदिरा से वे बचते हैं, तो राजीव ने ऐसा कहा, मनमोहन होते, तो वैसा हो जाता होता।
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दुख यह है कि उनकी बेसिरपैर की काल्पनिक बातों से भरे चुनावी और संसदीय व्यक्तव्य, देश मे राजनीतिक डिस्कोर्स का पैमाना बन गए हैं।
वे भारतीय राजनीतिक इतिहास में अभूतपूर्व गालीबाजी की संस्कृति के वाहक है। आज जो टीवी डिबेट, अखबार और सोशल मीडिया से सड़क तक छाई है।
इसमें किसी स्तर पर, राष्ट्रीय महत्व की कोई तात्विक बात करना सम्भव नही।
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फिर जहां अतात्विक बात हो.. वहाँ तो ट्रोल गैंग बन चुकी भाजपा का मुकाबला कठिन है। इस कठिनता को वह ताकत बना चुके है। चुनावी रूप से अपराजेय दिखते हैं।
लेकिन इसका दूसरा असर यह, की 11 सालो तक लगातार सत्ता में रहने के बावजूद, आज भी अपनी सर्वस्वीकार्यता के लिए जूझ रहे हैं।
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38% वोट से महज सरकार बनती है। पर दिल तो व्यवहार से जीते जाते हैं। इतिहास में वही मर्मस्पर्शी संस्मरण उदाहरण बनते है, जिन्हें आने वाली पीढ़ी कॉपी करती है।
इसमें बुरी तरह असफल मोदी की लेगेसी एक बड़े जनमानस को अस्वीकार है। दरअसल, उनकी लेगेसी, घुमड़ते हुए गन्दे पानी पर फेन की तरह है।
भीतर गन्दगी घटी,और फेन गायब..
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नेहरू-अटल से लेकर मनमोहन-सुषमा स्वराज तक, संसद में नोकझोक के साथ हंसी ठट्ठे और विट के साथ एक दूसरे को लाजवाब करते देखा है।
लैंडमार्क प्राइमिनिस्टर, उन्ही गरिमामयी आचरण के उदाहरण से याद किये जाते है। ऐसा कोई क्षण मोदी दौर में नही आया। कटुता के सिरमौर ने, कटुता दूर करने का हर मौका लात मार दिया।
बड़ा बनने के हर मौके में छुटपन को चुना।
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ऐसे ही अवसर की ये तस्वीर है। मोदी की लेगेसी, भारत के राजनैतिक विमर्श, और उसकी दिशा को बदल सकने वाला अवसर...
जो विपक्ष ने पैदा किया। मगर हमारा प्रधानमंत्री जिसका मखौल उड़ा रहा है।
खुद अपनी लेगेसी पर मिट्टी डाल रहा है।
🙏
@SupriyaShrinate Epic roasting in TN .
Can any state in India do this type of roasting .
FM : So much violence and murder in school and caste fight in Roads .
Reporter : Where in Manipur.
FM - Blabbers 😂😂😂