मैं जब भी यथार्थ का पीछा करता हूँ
देखता हूँ वह भी मेरा पीछा कर रहा है मुझसे तेज़ भाग रहा है
घर हो या बाज़ार हर जगह उसके दांत चमकते हुए दिखते हैं
अंधेरे में रोशनी में
घबराया हुआ मैं नींद में जाता हूँ तो वह वहां मौजूद होता है
एक स्वप्न से निकलकर बाहर आता हूँ
मैं जब भी यथार्थ का पीछा करता हूँ
देखता हूँ वह भी मेरा पीछा कर रहा है मुझसे तेज़ भाग रहा है
घर हो या बाज़ार हर जगह उसके दांत चमकते हुए दिखते हैं
अंधेरे में रोशनी में
घबराया हुआ मैं नींद में जाता हूँ तो वह वहां मौजूद होता है
एक स्वप्न से निकलकर बाहर आता हूँ
एक निरीह पथिक निज मग का
मैं न सुयश-भिक्षुक इस जग का,
अपनी ही जागृति का स्वर यह, बन्धु, और कुछ गा न रहा मैं।
सोच रहा, समझा न रहा मैं।
रामधारी सिंह दिनकर
सोच रहा, कुछ गा न रहा मैं।
निज सागर को थाह रहा हूँ,
खोज गीत में राह रहा हूँ,
पर, यह तो सब कुछ अपने हित, औरों को समझा न रहा मैं।
वातायन शत खोल हृदय के,
कुछ निर्वाक खड़ा विस्मय से,
उठा द्वार-पट चकित झाँक अपनेपन को पहचान रहा मैं।
ग्रन्थि हृदय की खोल रहा हूँ,
उन्मन-सा कुछ बोल रहा
मन का अलस खेल यह गुनगुन, सचमुच, गीत बना न रहा मैं।
देखी दृश्य-जगत की झाँकी,
अब आगे कितना है बाकी?
गहन शून्य में मग्न, अचेतन, कर अगीत का ध्यान रहा मैं।
चरण-चरण साधन का श्रम है,
गीत पथिक की शान्ति परम है,
ये मेरे संबल जीवन के, जग का मन बहला न रहा मैं।
@ABPNews@romanaisarkhan अगर हम सच में जीत रहे हैं तो हमें हमारी जीत पर क्या मिला?.@PMOIndia. और तो और जब हम पूरी तरह से सक्षम हैं अपने दुश्मनों को जवाब देने में तो किसी ओर के कहने पर हम क्यों पीछे हटे.....जिनके कहने पर हम लौट आए उन्होंने जिम्मेदारी ली क्या कि आगे इस तरह की कोई घटना नहीं होगा,पूछिए उनसे