जब जब मोदी सरकार किसी वास्तविक मामले में फंसती दिखती है, तब तुरंत सूत्रों के आधार पर खबरें चलनी लगती हैं।
हंसी की बात ये कि कुछ ही दिनों बाद सूत्रों के आधार वाली खबरों पर सरकार खुद ही मूत्र विसर्जन कर देती है।
जिस मीडिया को मोदी सरकार अपने बड़े बड़े मामलों की भनक तक नहीं लगने देती, वही मीडिया जब सूत्रों के आधार पर खबर चलाने लगती तो खुद ही अपना क्रेडिट खो बैठती है।
लेकिन बेशर्म इतने कि फिर से सूत्रों के आधार की खबर बताने लगेंगे।
पिछले कुछ सालों में जिस संस्थान ने अपनी विश्वसनीयता सबसे ज्यादा खोई है, वो भारतीय मुख्य धारा मीडिया है।
ये ठीक है कि मोदी प्रेस कॉन्फ्रेस नहीं करते, उनके सरकार के लोग स्पष्ट बात नहीं बताते पर ये भी सत्य है कि वो इसलिए ऐसा कर पाते हैं क्योंकि मुख्य धारा मीडिया उन्हें ऐसा करने देती है।
कोई भी बड़ा पत्रकार कभी भी मोदी शाह या गडकरी प्रधान जैसे लोगों से सबके सामने कठिन सवाल पूछ सकता था। बहुत मौके मिलते हैं।
पर गुलामों को जब पेटभर खाने को मालिक देते रहें और सोने को छत।
तो वो इससे आगे कुछ न सोच पाते।