ये मेरे बचपन के मित्र की व्यथा है जो मैं नीचे लिख रहा हूँ।
आज मैं बहुत दुःख के साथ रॉबिंस कुमार की बात बता रहा हूँ, जो CRPF में सीटी/जीडी के पद पर GC मोकामा घाट, बिहार में पोस्टेड हैं। इससे पहले गुमला, झारखंड में तैनात थे। 25 फरवरी 2021 को परिचालनिक ड्यूटी के दौरान तलाशी अभियान के दौरान नक्सलियों द्वारा लगाया गया, प्रेशर IED के फटने से गंभीर रूप से घायल हो गए।
बाद में चिकित्सा के दौरान दोनों पैरों को घुटने के ऊपर काटना पड़ा, अब 100% डिसेबल की कैटेगरी में आ गए। स्वस्थ होने के उपरांत GC मोकामा घाट, बिहार में ड्यूटी कर रहे हैं।
इस ड्यूटी के दौरान अनेक समस्याएँ आईं, अपना कर्तव्य समझ कर किसी से कोई शिक़ायत नहीं की। मेरे समझाने पर भी यही कहते रहे कि यदि बार-बार किसी से कहूँगा तो सैनिक होने का मतलब क्या है, थोड़ा-बहुत तो चलता है।
2021 के बाद मेडिकल रिव्यू या ओपिनियन के कारण तीन बार पटना, एक बार मुज़फ्फरपुर जाना पड़ा। सुविधा नहीं के बराबर ही मिली, फिर भी कोई शिक़ायत नहीं की। कल रॉबिन्स को मेडिकल स्क्रीनिंग के लिए GC प्रयागराज भेजा गया। वहाँ स्क्रीनिंग हो गई, पर वापस कब जाना है, पता नहीं है।
दोनों पाँव घुटने से ऊपर से कटा हुआ है। कोई अटेंडर नहीं मिलता, कोई बात नहीं। परिवार से कोई न कोई सदस्य हर जगह साथ जाता ही है। परंतु, वहाँ पर बहुत समस्या हो रही है।
जैसे कि कोई व्हील चेयर नहीं मिला, टॉयलेट दिव्यांग जन के अनुसार नहीं है, कोई बेड नहीं दिया गया, पानी की समस्या है। और भी बातें हैं, जो हमारे-आपके जैसे सामान्य लोग समस्या मानेंगे ही नहीं।
अब ये आम जवान नहीं हैं, इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए। फिर भी इनकी पत्नी स्वयं मोकामा GC के DIG साहब और DC (ADM) साहब से मिल कर सारी समस्याओं के बारे में बताया। वहाँ से प्रयागराज GC को फ़ोन भी किया गया, परंतु अभी तक कोई समाधान नहीं हुआ।
रॉबिन्स कहते हैं: मैंने अपने जीवन में ये सब कभी नहीं सोचा पर क्या करूँ? अब शारीरिक और मानसिक पीड़ा असहनीय है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मेडिकल बोर्ड पेंशन भेज दें।
उनकी पीड़ा को हर कोई समझ नहीं सकता, फिर भी वो किसी से कोई शिकायत नहीं करते। मैं मित्र हूँ, मैंने उसके साथ पढ़ाई की, खेला हूँ और उसके घर सदैव आता-जाता रहता हूँ। मैं यदि एक ट्वीट भी न कर सकूँ तो मुझे स्वयं पर लज्जा आती है।
सच यह है कि रॉबिन्स कुमार मेडिकल, रिव्यू, ओपिनियन और ड्यूटी के कारण बहुत परेशान हो चुके हैं। इतना सब होने के बाद भी आज तक, न एक व्हील चेयर मिला, न अच्छा प्रोस्थेटिक लेग। मैंने एक बार कहा कि क्राउड फंडिंग करते हैं तो स्वाभिमान के कारण मना कर दिया कि स्वयं कमा कर ले लूँगा।
मैंने पता किया कि ऐसे कृत्रिम पाँव की कीमत कितनी है, तो मेरा दिमाग हिल गया। ऑफिसर होता तो संभवतः अलग तरह से सब कुछ होता, पर जवान है, तो वह ड्यूटी पर दोनों पाँव गवा कर भी तंत्र की उपेक्षा झेल रहा है। मित्र के कटे पाँव देखता हूँ तो गौरव और पीड़ा दोनों ही होती है। फिर यह सब जान कर पूरे तंत्र को ले कर लज्जा होती है कि कहीं बुलाया गया हो तो बेसिक सुविधा तो दे दो!
मैं यहाँ @PIBHomeAffairs@AmitShahOffice@narendramodi@PMOIndia आदि को टैग कर रहा हूँ। यदि मेरे किसी पाठक की जान-पहचान किसी ऐसे जगह पर है, जहाँ से समाधान हो जाए, तो कृपया बात को वहाँ तक पहुँचा दें।
वो तंत्र से हार कर नौकरी छोड़ना चाहता है, पर सिस्टम उसे वह भी करने नहीं दे रहा। पिछली बार इन्हीं के लिए, हर डाकूमेंट होने के पश्चात भी एक डिसेबल फ्रेंडली कार लेने के लिए नाकों चने चबाने पड़े थे, वह भी आप सबको याद ही होगा। सहायता कीजिए।
@Profdilipmandal@JayShah तू कब लेगा ये जोखिम जब जिन जिहादियो की तू पैदाइश है वो जब हमारे दलितो पर अत्याचार एवं बलात्कार करते है
मुँह से चीख नही निकलती तुझ जैसे सुअरो के
Kamal Hassan, we all know you are a converted Christian, and you should speak about the illegal things in Jerusalem and its associates.
You have nothing to do with our Hinduism (Sanathana Dharma).