चंदा चोरी के मुद्दे पर कुछ चाटुकारो ने पप्पू यादव जी का घर घेर लिया था अब पप्पू यादव जी के साथ बाबाओं ने प्रधानमंत्री आवास का घेराव किया तो दिल्ली पुलिस गिरफ्तार कर लिया।
I am also guilty of such things. Bachpan mei 40 ki pepsi kharid karke ghar pe 70 ki bta deta tha.
The similarity is uncanny.
#amitkilhor#kilhor#bicycle#mattasports
🚨🚨 Hindutva group attacked ARAMBAGH CHURCH DURING SUNDAY WORSHIP IN WEST BENGAL. The Pastor's and local believer's Clothes were Torn off. Now, what if all Christian Countries did this to Hindus?
बच्चे अपने स्कूल से गांव तक जर्जर पड़े रोड को बनवाने तिरंगे लेकर DM दफ्तर पहुंच गए।
DM कह रहे हैं “हद हो गया है निकलिए, हमारे घर बच्चे नहीं है।”
बच्चे तो होंगे DM “साहेब” लेकिन उनको प्रदर्शन की ज़रूरत कहाँ पड़ती होगी! सरकारी स्कूल में पढ़ते होंगे आपके बच्चे?
UP हो या बिहार प्रशासन का रवैया बिल्कुल “बाबू साहब” जैसा है।
सदन सिर्फ भाजपा - कांग्रेस का नहीं है
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर यूनिवर्सिटी लखनऊ दलित छात्रों के भी मुद्दे पर चर्चा होगी! @BhimArmyChief@BbauSocialmedia
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (संशोधन) विधेयक, 2026- गृह मंत्री अमित शाह के नाम से लाया जा रहा है, जो लगातार सदन से गायब हैं।
आप उन्हें तुरंत सदन में बुलवाइए।
पिछले कुछ समय से देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं, जिन्हें केवल बच्चों का प्रदर्शन कहकर खारिज कर देना बहुत बड़ी भूल होगी। ये बच्चे अभी राजनीति की किताबें पूरी तरह पढ़ भी नहीं पाए हैं, लेकिन उन्होंने शायद लोकतंत्र का सबसे जरूरी पाठ समझ लिया है , सवाल करना।
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में लगभग 300 स्कूली बच्चे अपने अभिभावकों के साथ करीब 6 किलोमीटर पैदल चलकर जिलाधिकारी कार्यालय पहुँचे। उनकी मांग कोई बड़ी राजनीतिक मांग नहीं थी। वे अपने स्कूल तक जाने वाली खराब सड़क और बरसात में होने वाले जलभराव से परेशान थे।
महाराष्ट्र में स्कूल बसों के मनमाने किराये को लेकर भी परिवहन व्यवस्था को नियंत्रित करने की जरूरत सामने आई है। वहीं त्रिपुरा में कॉलेज छात्रों ने सरकारी निर्धारित किराये से अधिक वसूली और छात्र किराये को आधा करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया।
राजस्थान में छात्राओं ने शिक्षकों की कमी के कारण पढ़ाई प्रभावित होने पर धरना दिया। और राजस्थान के ही सवाई माधोपुर में छात्राओं के साथ कथित अमानवीय व्यवहार के बाद परिवारों और ग्रामीणों ने स्कूल के बाहर प्रदर्शन किया; इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी संज्ञान लिया।
तमिलनाडु के करूर में तो सरकारी स्कूल की बच्चियों से शौचालय साफ करवाने का वीडियो सामने आने के बाद सवाल उठे कि आखिर जिन बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजा जाता है, उनसे व्यवस्था की गंदगी साफ क्यों करवाई जा रही है।
इन घटनाओं को अलग-अलग घटनाएँ समझना शायद आसान है, लेकिन इनके भीतर एक साझा कहानी दिखाई देती है।
एक ऐसी पीढ़ी की कहानी, जो अब चुप रहने को तैयार नहीं है।
जिस बच्चे के हाथ में कल तक केवल किताब, पेंसिल और टिफिन था, आज उसी हाथ में तख्ती है। जिस बच्चे को हम अक्सर यह कहकर चुप करा देते हैं कि “तुम अभी छोटे हो, तुम्हें क्या पता?” वही बच्चा अब पूछ रहा है, सड़क क्यों नहीं बनी? शिक्षक क्यों नहीं हैं? शौचालय साफ क्यों नहीं है? हमारे आने-जाने का किराया इतना क्यों है? हमें बुनियादी सुविधाएँ क्यों नहीं मिलतीं?
ये सवाल छोटे लग सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र में सवालों का आकार नहीं होता, उनका अर्थ होता है।
सत्ता अक्सर यह भ्रम पाल लेती है कि जनता सवाल करना भूल चुकी है। कुर्सियाँ इतनी ऊँची हो जाती हैं कि नीचे खड़े लोगों की आवाज़ सुनाई देना बंद हो जाती है। लेकिन इतिहास का एक विचित्र नियम है जब बड़े सवाल पूछने से डरने लगते हैं, तब कभी-कभी बच्चे छोटे सवालों से व्यवस्था की नींव हिला देते हैं।
इन बच्चों के पास न कोई बड़ा राजनीतिक मंच है, न सत्ता का संरक्षण, न भाषणों की भारी-भरकम शब्दावली। उनके पास केवल अपना अनुभव है। और अनुभव से निकला सवाल अक्सर किसी भी राजनीतिक भाषण से ज्यादा ताकतवर होता है।
विडंबना देखिए जिन बच्चों को संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकार पढ़ाए जाते हैं, वही बच्चे जब उन अधिकारों की जमीन पर उतरकर सवाल करते हैं तो व्यवस्था को बेचैनी होने लगती है।
शायद सत्ता को यह समझ लेना चाहिए कि पीढ़ियाँ केवल उम्र से बड़ी नहीं होतीं, सवालों से बड़ी होती हैं।
यह वही पीढ़ी है जिसे मोबाइल और इंटरनेट ने दुनिया को बहुत करीब से देखने का मौका दिया है। वह जानती है कि किसी दूसरे शहर का बच्चा अपने अधिकार के लिए आवाज उठा सकता है, तो वह भी उठा सकता है। वह यह भी समझ रही है कि सरकार जनता के लिए होती है, जनता सरकार के लिए नहीं।
इसलिए इन बच्चों की आवाज को केवल सड़क, बस, शिक्षक या शौचालय की मांग मत समझिए। यह दरअसल नागरिक चेतना के जागने की आवाज है।
और सत्ता के नशे में बैठे लोगों के लिए शायद इससे बड़ा कोई राजनीतिक संदेश नहीं हो सकता कि जिस पीढ़ी को वे अभी “बच्चे” समझ रहे हैं, वही पीढ़ी धीरे-धीरे सवालों की भाषा सीख रही है।आज वे सड़क मांग रहे हैं।कल वे व्यवस्था का हिसाब मांगेंगे।आज वे शिक्षक मांग रहे हैं।कल वे शिक्षा की नीति पर सवाल करेंगे।आज वे शौचालय और बस का किराया पूछ रहे हैं।
कल वे पूछेंगे हमारे हिस्से का लोकतंत्र कहाँ है?
और तब शायद सबसे मुश्किल काम सवालों को दबाना नहीं, बल्कि उनका जवाब देना होगा।क्योंकि लाठी से आवाज कुछ देर के लिए रोकी जा सकती है, सवाल को खत्म नहीं किया जा सकता।और जब एक पूरी पीढ़ी सवाल करना सीख जाए, तो फिर सत्ता को जवाब देना ही पड़ता है।
सवाल कर रहे देशभर के सारे बच्चे को शुभकामनाएं।
Remembering the Father of the India's Space Program Dr #VikramSarabhai on his birth anniversary. He was a great institution builder & a creator & cultivator of institutions. He was a rare combination of a scientist, an innovator, industrialist & a Visionary.
VC: @isro
@indane_gas need to note that despite several missed call in last few weeks, they have neither send the gas nor registered our request. Local Vendor is AlokGasAgency, Model Town, Delhi 110009.
@OfficeofHSP
"एक दम हद हो गई, हम लोगों के घर भी बच्चे हैं"
हमीरपुर, यूपी में रोड बनवाने के लिए स्कूली बच्चे DM दफ्तर पहुंचे तो इंस्पेक्टर ने धमकाकर उन्हें ना सिर्फ भगाया बल्कि वर्दी का धौंस भी दिखाया!!
#Casteism On August 8, a public meeting addressed by Congress President Mallikarjun Kharge was held at Ramlila Maidan in Haldwani, Uttarakhand.
Reports that the venue was later subjected to “purification” through a yajna, havan and sprinkling of Ganga water are deeply disturbing.
Kharge is a Dalit. He has wealth, political power, status and one of the country’s highest political positions. Yet even he is not immune to caste prejudice.
This exposes the lie that “casteism does not affect rich Dalits.” If a place is considered to need purification after a Dalit leader speaks there, the issue is not poverty – it is caste.
You may become rich, powerful and influential, but caste prejudice can still follow you.
'assistant professor' is probably one of the most toxic white-collar jobs in India right now, both public & pvt institutions included. The number of breakdowns & attrition rate esp in tier 2 & 3 layers of academia is mind-boggling.
Do read (DM for non-paywall link)