धरती का आँगन इठलाता, शस्य श्यामला भू का यौवन।
अंतरिक्ष का हृदय लुभाता।।
जौ गेहूँ की स्वर्णिम बाली, भू का अंचल वैभवशाली।
इस अंचल से चिर अनादि से, अंतरंग मानव का नाता।।
आओ नए बीज हम बोएं, विगत युगों के बंधन खोएं।
भारत की आत्मा का गौरव, स्वर्ग लोग में भी न समाता।।
भारत जन रे धरती की निधि, न्यौछावर उन पर सहृदय विधि।
दाता वे, सर्वस्व दान कर, उनका अंतर नहीं अघाता।।
किया उन्होंने त्याग तप वरण, जन स्वभाव का स्नेह संचरण
आस्था ईश्वर के प्रति अक्षय, श्रम ही उनका भाग्य विधाता।।
सृजन स्वभाव से हो उर प्रेरित, नव श्री शोभा से उन्मेषित
हम वसुधैव कुटुम्ब ध्येय रख, बनें नये युग के निर्माता।।
"सुमित्रानंदन पंत"
चीज़ों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के
कोई नियम नहीं होते
लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में
मनुष्य कर सकते हैं
बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं
कि गिरना हो तो घर में गिरो
बाहर मत गिरो
यानी चिट्ठी में गिरो
लिफ़ाफ़े में बचे रहो, यानी
आँखों में गिरो
चश्मे में बचे रहो, यानी
शब्दों में बचे रहो
अर्थों में गिरो
यही सोच कर गिरा भीतर
कि औसत क़द का मैं
साढ़े पाँच फीट से ज़्यादा क्या गिरूँगा
लेकिन कितनी ऊँचाई थी वह
कि गिरना मेरा ख़त्म ही नहीं हो रहा
चीज़ों के गिरने की असलियत का पर्दाफाश हुआ
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के मध्य,
जहाँ, पीसा की टेढ़ी मीनार की आख़िरी सीढ़ी
चढ़ता है गैलीलियो, और चिल्ला कर कहता है -
'इटली के लोगो,
अरस्तू का कथन है कि, भारी चीज़ें तेजी से गिरती हैं
और हल्की चीज़ें धीरे-धीरे
लेकिन अभी आप अरस्तू के इस सिद्धांत को
गिरता हुआ देखेंगे
गिरते हुए देखेंगे, लोहे के भारी गोलों
और चिड़ियों के हल्के पंखों, और काग़ज़ों और
कपड़ों की कतरनों को
एक साथ, एक गति से, एक दिशा में
गिरते हुए देखेंगे
लेकिन सावधान
हमें इन्हें हवा के हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा,'
और फिर ऐसा उसने कर दिखाया
चार सौ बरस बाद
किसी को कुतुबमीनार से चिल्ला कर कहने की ज़रूरत नहीं है
कि कैसी है आज की हवा और ���ैसा इसका हस्तक्षेप
कि चीज़ों के गिरने के नियम
मनुष्यों के गिरने पर लागू हो गए है
और लोग
हर क़द और हर वजन के लोग
खाये पिये और अघाए लोग
हम लोग और तुम लोग
एक साथ
एक गति से
एक ही दिशा में गिरते नज़र आ रहे हैं
इसीलिए कहता हूँ कि गौर से देखो, अपने चारों तरफ़
चीज़ों का गिरना
और गिरो
गिरो जैसे गिरती है बर्फ़
ऊँची चोटियों पर
जहाँ से फूटती हैं मीठे पानी की नदियाँ
गिरो प्यासे हल��़ में एक घूँट जल की तरह
रीते पात्र में पानी की तरह गिरो
उसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए
गिरो आँसू की एक बूँद की तरह
किसी के दुख में
गेंद की तरह गिरो
खेलते बच्चों के बीच
गिरो पतझर की पहली पत्ती की तरह
एक कोंपल के लिए जगह ख़ाली करते हुए
गाते हुए ऋतुओं का गीत
'कि जहाँ पत्तियाँ नहीं झरतीं
वहाँ वसंत नहीं आता'
गिरो पहली ईंट की तरह नींव में
किसी का घर बनाते हुए
गिरो जलप्रपात की तरह
टरबाइन के पंखे घुमाते हुए
अँधेरे पर रोशनी की तरह गिरो
गिरो गीली हवाओं पर धूप की तरह
इंद्रधनुष रचते हुए
लेकिन रुको
आज तक सिर्फ इंद्रधनुष ही रचे गए हैं
उसका कोई तीर नहीं रचा गया
तो गिरो, उससे छूटे तीर की तरह
बंजर जमीन को
वनस्पतियों और फूलों से रंगीन बनाते हुए
बारिश की तरह गिरो, सूखी धरती पर
पके हुए फल की तरह
धरती को अपने बीज सौंपते हुए
गिरो
गिर गए बाल
दाँत गिर गए
गिर गई नजर और
स्मृतियों के खोखल से गिरते चले जा रहे हैं
नाम, तारीख़ें, और शहर और चेहरे...
और रक्तचाप गिर रहा है
तापमान गिर रहा है
गिर रही है खून में निकदार होमोग्लोबिन की
खड़े क्या हो बिजूके से नरेश
इससे पहले कि गिर जाए समूचा वजूद
एकबारगी
तय करो अपना गिरना
अपने गिरने की सही वजह और वक़्त
और गिरो किसी दुश्मन पर
गाज की तरह गिरो
उल्कापात की तरह गिरो
वज्रपात की तरह गिरो
मैं कहता हूँ
गिरो
नरेश सक्सेना
पुरुष को हर किसी ने कठोर जाना पर सिर्फ उस पुरुष की पसंदीदा स्त्री ने जाना अपने पुरुष के सरल और कोमल हृदय को और उसमें छिपे अथाह प्रेम को...एक पुरुष भी बेहद प्यारा हो सकता है प्रेम में ये जाना तो सिर्फ और सिर्फ उसकी पसंदीदा स्त्री ने...❤️🥀
#वंदना
तुम्हारे दूर जाने से जैसे चेहरे पर कोई रौनक नहीं रहती, मन उदास हो जाता है, कही मन नहीं लगता...किसी से बात करने का, किसी से मिलने तक का मन नहीं करता... तुम्हें सोचते हुए पूरा दिन गुजर जाता है... आंखें जैसे बस हर जगह तुम्हें ढूंढने लगती है..ये प्रेम ही तो है..है न❤️🥀
#वंदना
हर सुबह से शाम तक मैं लोहा हूँ
हर शाम से सुबह तक मैं मोम हूँ
यह सांध्य वेला है
सूर्य ढलने-ढलने को है
चाँद उगने-उगने को है
टिमकने लगे हैं सितारे यहाँ-वहाँ
इस समय मुझे मत देखना
इस समय मैं
लोहे से मोम में बदलता हूँ।
विनोद पदरज
सुनो,
मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए बस तुम जो शांत होकर मेरी सारी बातें सुनते हो न...बिना कुछ कहे सब जान जाते हो यही पर मेरी सारी दुनियां ठहर जाती है❤️💫
#वंदना 🍁
नीचे लिखे लेख की आगे की कुछ पंक्तियां....
उन्हें पसंद होता हैं 'आप' लगाकर बोलना,
नाम के अंत में 'जी' लगाकर बोलना,
वो डुबना चाहते हैं स्त्री की
सुरमई आंखों में,
चाहिए उन्हें बस स्त्री का सुंदर मन,
तय करना चाहते हैं उसके
साथ एक लम्बा सफर ताउम्र
उसका हाथ पकड़कर❤️
#वंदना
क्रमशः..
एक दिन फेरी लगाता कोई
आएगा मोहल्ले में लेकर
बसंत-
उसकी सरकारी खिड़कियों में
नहीं पड़ेगी आवाज़
वो एक नौकरशाह है
जिनके कमरे ठंडे या गर्म रहते हैं
पर कभी नहीं रहते
बस��त।
1/2
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"मुझसे इश्क़ करने के बाद"
(बांग्लाद���शी कवि : हुमायूँ आज़ाद)
(हिंदी अनुवाद : नयना)
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मुझसे इश्क़ करने के बाद तुम्हारा कुछ भी पहले जैसा नहीं रह पायेगा।
जैसे हिरोशिमा के बाद
उत्तरी से दक्षिणी मेरु तक कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा।
1/N
जब तुम मेरे सपने से
किसी दूसरे के सपने में चली जाओगी
मैं लौट जाऊँगा
अपने एकांत में
जहाँ मैं निरंतर प्रतीक्षारत हूँ
जब तुम मेरे अनुभव से
किसी दूसरे के अनुभव में चली जाओगी
मैं लौट जाऊँगा
अपने सपनों के अमरत्व में
जहाँ कोई प्रतीक्षा
नहीं हुआ करती !
🔹जगन्नाथ प्रसाद दास
वो इतना पाषाण हो गया है कि सबसे सुखद अनुभूति अर्थात् प्रेम...स्नेह
जैसे भाव भी अब छुपाने लगा है
इनसे भय खाता है दूर भागता है...
ये हृदय है मेरा... ईश्वर!
हर क्षण उसे यूं विषम परिस्थितियों में डालकर और पत्थ�� न कर।
#आर्चिश_
लड़के के आँसू :
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फिर जब वो
अकेले रोया
तो
आंखों से आँसू नहीं
पिलपिला पस निकला।
वो
उन सारे पुराने
कुछ भुला भी दिए गए
घावों का पस।
जिसे समाज ने सहलाने नहीं दिया
जिसपे उसे रोने नहीं दिया गया।।
(वीडियो साभार : @closedcaptionss )
उसकी छवि बिल्कुल ��िव जैसी है...कभी शांत तो कभी उग्र सा... मस्तक पर तेज है उसके..हर परिस्थिति में खुद को ढाल लेता है..उसके मौन में भी जैसे न जाने कितने राज है..शिव के जैसे हरदम खुद में ध्यानमग्न रहता है और क्या ही कहूं मेरा इंतजार उसके लिए पार्वती के जैसी तपस्या सी हैं❤️🥀
#वंदना