Dear @MoHFW_INDIA, If key indicators like anaemia, mortality, sex ratio, sanitation, and cancer screening are no longer highlights in the factsheet, what datasets will give the same district-level and socio-eco insight? Transparency matters. Accountability begins with measurement
@arvindsubraman
You argue that labour repression didn’t stop Chinese consumers from gaining. But the real question is without that repression and artificially cheap labour, would China’s growth have been this fast in the 1st place? how sustainable is a model that depends on it?
@arvindsubraman
You argue that labour repression didn’t stop Chinese consumers from gaining. But the real question is without that repression and artificially cheap labour, would China’s growth have been this fast in the 1st place? how sustainable is a model that depends on it?
@ShamikaRavi जी ने कहा था कि PPP terms में China का household consumption India से सिर्फ 1.5x ज्यादा है। Constant USD में gap 4x दिखता है, लेकिन QoL और actual consumption capacity compare करने के लिए PPP ज्यादा प्रासंगिक माप है। वितरण और democracy का role भी उतना ही जरूरी है।
@ShamikaRavi जी ने कहा था कि PPP terms में China का household consumption India से सिर्फ 1.5x ज्यादा है। Constant USD में gap 4x दिखता है, लेकिन QoL और actual consumption capacity compare करने के लिए PPP ज्यादा प्रासंगिक माप है। वितरण और democracy का role भी उतना ही जरूरी है।
इन टुकड़े टुकड़े गैंग्स वाले के हिसाब से, प्रधानमंत्री, नरमुंडों की माला गले में पहन के हाथों में खडग और पाश लेकर अट्टहास करते हुए रणभूमि में युद्ध का बिगुल फूंकते हुए कूद पड़ें।
हो सकता है भारत सरकार सर्वसम्मति से यह कदम उठाना चाहती हो।
इसीलिए कांग्रेस पार्टी को एक रेजोल्यूशन पास करके अमरीकी सरकार को हत्यारा घोषित करना चाहिए।
राहुल गांधी जिन जिन अमरीकी यूनिवर्सिटीज में जाकर लोकतंतर बचाओ रैली करते हैं, उनका पुतला आप जलाओ
और सबसे पहले कांग्रेस पार्टी के चाचा सैम पात्रोदा को बोलो भारत वापस आए
@OfcNitinNabin
अमूल पर हमला करने वालों को पहले अमूल के इतिहास को पढ़ लेना चाहिए
आज कुछ लोग अमूल के उस विज्ञापन पर आपत्ति जता रहे हैं जिसमें प्रधानमंत्री के रूप में 4400 दिन पूरे करने पर नरेंद्र मोदी को बधाई दी गई है।
लेकिन यह आलोचना या तो जानकारी के अभाव से पैदा हुई है, या फिर जानबूझकर तथ्यों की अनदेखी करके की जा रही है।
अमूल कोई राजनीतिक दल नहीं है। अमूल भारत का एक ऐसा ब्रांड है जिसने पिछले छह दशकों से देश की सामूहिक भावनाओं, राष्ट्रीय घटनाओं, उपलब्धियों, सफलताओं, चुनौतियों और जनमानस की प्रतिक्रियाओं को अपने प्रसिद्ध टॉपिकल विज्ञापनों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।
जब भारत ने क्रिकेट विश्व कप जीता, अमूल ने उसका उत्सव मनाया।
जब वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कीं, अमूल ने उन्हें सलाम किया।
जब कोई ऐतिहासिक निर्णय हुआ, अमूल ने उस पर अपनी रचनात्मक टिप्पणी दी।
जब किसी नेता, कलाकार, खिलाड़ी या राष्ट्रीय व्यक्तित्व ने कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की, अमूल ने उसे अपने विज्ञापनों में स्थान दिया।
यही उसकी परंपरा है। यही उसकी पहचान है।
नरेंद्र मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा देने वाले प्रधानमंत्रियों में से एक हैं और 4400 दिनों का कार्यकाल स्वयं में एक ऐतिहासिक तथ्य है, कोई राजनीतिक नारा नहीं।
यदि अमूल इस उपलब्धि को नोटिस करता है और उस पर बधाई देता है, तो यह उसी परंपरा का हिस्सा है जिसके अंतर्गत उसने दशकों से राष्ट्रीय घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
विडंबना यह है कि जो लोग आज अमूल पर प्रश्न उठा रहे हैं, वे शायद तब चुप थे जब अमूल ने अन्य प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, खिलाड़ियों, फिल्म सितारों या सामाजिक घटनाओं पर विज्ञापन बनाए थे।
तब उसे रचनात्मकता कहा जाता था, आज वही काम राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है।
सवाल यह नहीं है कि अमूल ने मोदी को बधाई क्यों दी।
सवाल यह है कि क्या भारत के प्रधानमंत्री की किसी ऐतिहासिक उपलब्धि का उल्लेख करना अपराध है?
क्या किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री की उपलब्धि को स्वीकार करना लोकतंत्र-विरोधी है?
क्या राष्ट्रीय जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने का अधिकार केवल उन लोगों को है जिनकी राजनीतिक पसंद कुछ विशेष विचारधाराओं से मेल खाती हो?
अमूल ने न तो किसी का अपमान किया है, न किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पर हमला किया है, न कोई चुनावी प्रचार किया है।
उसने केवल एक ऐतिहासिक मील के पत्थर को स्वीकार किया है।
सच यह है कि अमूल के टॉपिकल विज्ञापन हमेशा से “राष्ट्रीय मनोदशा” का दर्पण रहे हैं।
वे इतिहास के छोटे-छोटे पोस्टकार्ड हैं, जो बताते हैं कि किसी विशेष समय पर देश किस घटना पर चर्चा कर रहा था।
इसलिए जब देश का प्रधानमंत्री एक महत्वपूर्ण कार्यकाल पूरा करता है, तो उसका उल्लेख होना स्वाभाविक है।
हर बात में राजनीति खोजने की आदत ने कुछ लोगों को इतना पूर्वाग्रही बना दिया है कि अब उन्हें एक बधाई संदेश भी प्रचार दिखाई देता है।
अमूल ने कुछ भी गलत नहीं किया है। उसने वही किया है जो वह पिछले कई दशकों से करता आया है—भारत की सामूहिक स्मृति और राष्ट्रीय घटनाओं को अपनी विशिष्ट शैली में दर्ज करना।
जो लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं, उन्हें शायद अमूल के विज्ञापनों का इतिहास पढ़ने की आवश्यकता है।
क्योंकि इतिहास को समझे बिना वर्तमान पर निर्णय देना अक्सर अज्ञानता का ही परिचायक होता है।
अमूल ने किसी राजनीतिक दल का नहीं, एक ऐतिहासिक उपलब्धि का उल्लेख किया है। और इतिहास को दर्ज करना अपराध नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दायित्व है। 🇮🇳🇮🇳🇮🇳
Why are you so scared to answer the simple question: why did your boss Arvind Kejriwal make 12th class pass Manish Sisodia as the education minister, if he so fervently believes in educational qualifications and degrees?
If Education is not the criteria, then why do all Govt jobs and Pvt jobs have educational qualification as the basic criteria ?
Ask Modi to remove requirement of the educational qualifications from all Govt jobs.
Why do u visit a qualified doctor when someone in family is seriously sick ?
Ambanis & Adanis should stop hiring people from top engineering & Management colleges. They should practice what their media is promoting. ( Education is not needed)
तभी मैं सोचूँ…
अभिनव सर अचानक से पेपर लीक पर इतना क्यों छटपटा रहे हैं…
इन्हें ये दिक़्क़त नहीं है कि पेपर लीक हो गया…
इन्हें दिक़्क़त ये है कि पेपर इनके पास क्यों नहीं आया…
फिर उस चूसे हुए आम की गुठली जैसी शक्ल वाले लटकन पत्तल चट्टू का X पोस्ट कॉपी पेस्ट कर दिया ? बाकी यदि ये यादव होता तो गुठली शक्ल वाला इस के चूतड़ों से जुबान भी नहीं हटाता और चाटे रहता घंटों।..अनपढ़ थोड़ा पढ़ लिख भी लिया कर!