चूहों की दौड़ में दौड़ने का घाटा यह है कि अगर आप जीत भी गए तो चूहा ही कहलाएंगे।
The trouble with the rat race is that even if you win, you're still a rat.
- Lily Tomlin
#बाढ़ अतिथि नहीं है। यह कभी अचानक नहीं आती। दो-चार दिन का अंतर पड़ जाए तो बात अलग है। इसके आने की तिथियां बिल्कुल तय हैं। लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि यह अचानक आई विपत्ति है। इसके पहले जो तैयारियां करनी चाहिए, वे बिल्कुल नहीं हो पाती हैं।
- अनुपम मिश्र
पर पानी अपना रास्ता नहीं भूलता। तालाब हथियाकर बनाये गए मोहल्लों में वर्षा के दिनों में पानी भर जाता है और फिर वर्षा बीती नहीं कि इन शहरों में जल संकट के बादल छाने लगते हैं।
अनुपम मिश्र "आज भी खरे हैं तालाब" से
#delhiflood
प्रासादों के कनकाभ शिखर
होते कबूतरों के ही घर
महलों में गरुड़ ना होता है
कंचन पर कभी न सोता है
रहता वह कहीं पहाड़ों में
शैलों की फटी दरारों में
- रामधारी सिंह दिनकर
आज चिपको आंदोलन की 50वीं वर्षगाँठ है। चिपको आंदोलन की लगभग सारी तश्वीरें अनुपम मिश्र जी ने ली थी। उन्होंने ही चिपको आंदोलन का पहला इतिहास लिखा। यूरोप और अमेरिका के देशों के विपरीत भारत में पर्यावरण की लड़ाई सबसे वंचित और गरीब तबके ने लड़ी। इससे जुड़ी हुई कुछ अच्छी पुस्तकें📖📖👇
खौफ मंझधार से जो खाता है
वो किनारे पे डूब जाता है
मैने बैसाखियां जिसे दी थी
वो मुझे दौड़ना सिखाता है
सांप की केंचुली को लहराकर
तू सपेरों को क्या डराता है
दर्द बेवाओं का वो क्या जाने
जो हरी चूड़ियां बनाता है
पांव उसके भी नर्म होते हैं
जो तेरी पालकी उठाता है
- फहमी बदायूंनी
जब हम जवान होते हैं, हम समय के ख़िलाफ़ भागते हैं, लेकिन ज्यों-ज्यों बूढ़े होते जाते हैं, हम ठहर जाते हैं, समय भी ठहर जाता है, सिर्फ़ मृत्यु भागती है, हमारी तरफ़।
– निर्मल वर्मा
"पिछली रात मैंने एक सपना देखा
कि दुनिया के सारे लोग
एक बस में बैठे हैं
और हिंदी बोल रहे हैं
फिर वह पीली-सी बस
हवा में गायब हो गई
और मेरे पास बच गई सिर्फ मेरी हिंदी
जो अंतिम सिक्के की तरह
हमेशा बच जाती है मेरे पास
हर मुश्किल में..."
~केदारनाथ सिंह
#हिंदी_दिवस#हिन्दी
सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरंतर गावैं।
जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुबेद बतावैं।
नारद से सुक व्यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं
- सय्यद इब्राहीम रसखान (लगभग 450 वर्ष पहले लिखी गयी ब्रज कविता)