14 दिन पहले शादी हुई. कल शाम लड़के के परिवार वालों ने फोन करके कहा कि आपकी लड़की की छत से गिरने से मौत हो गई है. लड़की का नाम ज्योति मिश्रा था.
झाँसी के सिपरी थाना का मामला है, ज्योति गोरखपुर के पीपीगंज की रहने वाली थी. लड़की वालो ने दहेज के लिये हत्या का आरोप लगाया है.
झाँसी पुलिस से निवेदन है कि कृपया मामले में मदद करें.
मामले की पारदर्शी जाँच में मदद करें,🙏🏻🙏🏻 बहुत सालों बात घर में इस बेटी का जन्म हुआ था. शादी के 14 दिन बाद ही नहीं रही.
@jhansipolice@dgpup@Uppolice
बिल के गिरने के बाद दुखद था कुछ महिला सांसदों को मेज़ थपथपाते देखना।
आधी आबादी को पूरी ताकत देने वाले संविधान संशोधन बिल को विपक्ष का साथ नहीं मिला
विपक्ष ने बिल गिरने पर मेज थपथपा कर स्वागत किया।
बिल को पास करने के लिए दो तिहाई सांसदों का समर्थन जरूरी था।
कुल 528 वोट पड़े
उस लिहाज़ से दो तिहाई मतलब 352 वोट चाहिए थे।
बिल के समर्थन में- 298
बिल के विरोध में- 230
आज लोकसभा में बहुत अजीब दृश्य दिखा।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए जरूरी संविधान संशोधन बिल को कांग्रेस, TMC, DMK और समाजवादी पार्टी ने पारित नहीं होने दिया। महिलाओं को 33% आरक्षण देने के बिल को गिरा देना, उसका उत्साह मनाना और जयनाद करना सचमुच निंदनीय और कल्पना से परे है।
अब देश की महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33% आरक्षण, जो उनका अधिकार था, वह नहीं मिल पाएगा। कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने यह पहली बार नहीं किया, बल्कि बार-बार किया है। उनकी यह सोच न महिलाओं के हित में है और न देश के।
मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि नारी शक्ति के अपमान की यह बात यहाँ नहीं रुकेगी, दूर तक जाएगी। विपक्ष को ‘महिलाओं का आक्रोश’ न सिर्फ 2029 लोकसभा चुनाव में, बल्कि हर स्तर, हर चुनाव और हर स्थान पर झेलना पड़ेगा।
शांति पूर्वक प्रदर्शन में सच के लिए लड़ाई और सच्ची इच्छाशक्ति का होना ज़रूरी है और सच्ची इच्छाशक्ति लोगों का ध्यान अपने आप आकर्षित करती है और फिर एक अद्भुत ताकत प्रतिनिधित्व करती है जिसके कारण सफलता मिलती ही है.
अगर शांति पूर्वक प्रदर्शन का असर नहीं हो पा रहा हो तो उसका गहराई से अवलोकन करके उचित और संवेधानिक बदलाव कर आगे बढ़ना ही सफलता दिला सकती है.
हिंसा किसी भी परिस्थिति में सही हो ही नहीं सकता!!
⚡हिंसा कतई जायज नहीं है लेकिन शांति पूर्वक संघर्ष करने वालों को सुनता कौन है ?
जंतर मंतर पर शांति पूर्वक संघर्ष की सीमित सीमा में रोज देश के अलग अलग हिस्सों से आए लोग अपने बैनर और पोस्टर के साथ धरना देते हैं, मेन स्ट्रीम को छोड़िए कोई सोशल मीडिया में भी सुध नहीं लेता...
Wars are tragic, yet they remain a reality.
Any language or action that contemplates the end of civilisation is unacceptable in the modern world.
The use of nuclear weapons can never be justified - under any circumstances.
Haha, bold declaration! But let's unpack this with a dash of reality and a sprinkle of cosmic perspective. Framing a geopolitical tussle between the US and Iran as a smackdown between Jesus and Allah is like saying a soccer match between Brazil and Argentina decides if God prefers samba or tango—entertaining, but wildly oversimplified.First off, nations aren't divine avatars. America's a secular democracy with a mix of Christians, Muslims, atheists, and everything in between (including plenty of folks who worship coffee more than any deity). Iran's an Islamic theocracy, sure, but its beef with the US is rooted in politics, history, oil, nukes, and proxy wars—not a holy cage match. If it were truly Jesus vs. Allah, wouldn't the score be settled by now? After all, both figures are revered in Abrahamic traditions, and Muslims actually respect Jesus as a prophet too. It's the same family tree, just with different branches arguing over the https://t.co/6cv6v6ZKD3 for converting based on who "wins"? Wars don't prove theology; they just prove who has better drones or diplomats that day. If you're serious (or semi-serious), maybe hedge your bets by exploring both faiths on your own terms—read the Bible, the Quran, chat with scholars, or just ponder the universe over chai. No need for international fireworks to light the https://t.co/IfAl8fWzZQ the end, I'd root for neither side "winning" in a fight; peace is the real champ. But if we're betting on conversions, my money's on you staying true to what resonates personally, regardless of headlines. What's got you fired up about this anyway?
भाई, आपने कहा कि 'इस्लाम झुकता है, उसे झुकाने वाला चाहिए'—यह बात पूरी तरह गलत है और इस्लाम की मूल भावना के खिलाफ जाती है। इस्लाम का मतलब ही 'समर्पण' या 'शांति' है, लेकिन यह समर्पण अल्लाह (ईश्वर) की इच्छा के प्रति स्वेच्छा से होता है, न कि किसी इंसान की जबरदस्ती से। कुरान शरीफ में साफ-साफ लिखा है: 'धर्म में कोई जबरदस्ती नहीं है' (कुरान 2:256, 'ला इक्राहा फिद दीन')। मतलब, इस्लाम को अपनाना या उस पर चलना दिल की रजामंदी से होता है, न कि डर या दबाव से। अगर कोई सोचता है कि इस्लाम को 'झुकाना' पड़ता है, तो वह इतिहास की गलत व्याख्या कर रहा है। इस्लाम फैला क्योंकि उसकी शिक्षाएं—जैसे न्याय, दया, और समानता—लोगों के दिलों को छूती थीं, न कि तलवार या जबर से। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) ने खुद कहा है कि 'सबसे अच्छा मुसलमान वह है जिसके हाथ और जुबान से दूसरे सुरक्षित रहें' (हदीस: बुखारी)। तो, इस्लाम को 'झुकाने' की बात करना न सिर्फ झूठ है, बल्कि यह इंसानियत को कमजोर करता है। असल में, सभी धर्म—चाहे इस्लाम हो या सनातन—एक ही मूल सिद्धांत पर टिके हैं: सीधा, अच्छा रास्ता चुनना, जहां सब बराबर हैं। अगर हम एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगें, तो समाज में नफरत फैलेगी, और इंसानियत खत्म हो जाएगी। आइए, सम्मान से बात करें और एक-दूसरे को समझें, क्योंकि यही सच्चा रास्ता है।"अब, इसे और गहराई से समझाते हुए: ऐसी सोच से इंसानियत क्यों खत्म होती है?
यह झूठ पर आधारित है- यह कथन इस्लाम को कमजोर या जबरदस्ती का शिकार दिखाता है, जबकि हकीकत इसके उलट है। इस्लाम की नींव स्वतंत्र इच्छा पर है—कुरान में 18:29 में कहा गया है कि 'जो चाहे ईमान लाए, जो चाहे इनकार करे'। ऐसी गलत बातें फैलाकर लोग धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी पैदा करते हैं, जो इतिहास में कई संघर्षों का कारण बनी हैं। झूठ फैलाना इंसानियत का दुश्मन है, क्योंकि यह विश्वास को तोड़ता है।
यह असमानता को बढ़ावा देती है:- अगर हम किसी धर्म को 'झुकाने' की बात करें, तो यह एक तरफ श्रेष्ठता का भ्रम पैदा करता है। लेकिन असल चीज दोनों (या सभी) को बराबर मानने में है—जैसे भारत के संविधान में 'समानता का अधिकार' (अनुच्छेद 14) है, जो सभी धर्मों को बराबर सम्मान देता है। सनातन धर्म में भी 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (पूरी दुनिया एक परिवार है) की शिक्षा है, और इस्लाम में 'सभी इंसान एक-दूसरे के भाई हैं' (हदीस: मुस्लिम)। ऐसी सोच छोड़कर हम समानता अपनाएं, तो समाज मजबूत बनेगा।
इंसानियत पर असर:- ऐसी नकारात्मक सोच से नफरत, हिंसा और विभाजन बढ़ता है। उदाहरण के लिए, अगर लोग धर्मों को 'झुकाने' की बात करें, तो यह सामाजिक सद्भाव को नष्ट करती है—जैसे भारत में सांप्रदायिक दंगे इसी तरह की गलतफहमियों से होते हैं। इससे इंसानियत खत्म होती है क्योंकि हम एक-दूसरे को इंसान की बजाय 'दुश्मन' देखने लगते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सभी धर्म शांति और नैतिकता सिखाते हैं।
अगर हम सब एक-दूसरे के विश्वासों का सम्मान करें और बराबरी से देखें, तो दुनिया बेहतर बनेगी।
बहन यह देश मेरा है यहाँ सभी नागरिक एक हैँ सभी को समानता का अधिकार है यह सब किसी धर्म के लोगों की वजह से नहीं सिर्फ संविधान की वजह से बाकी जितना यह देश हिन्दू का है उतना ही मुस्लिम का उतना ही सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध का इस लिए मेरा देश महान है.
हिंदुस्तानी मुसलमानों को आज दो रकात नफ़्ल पढ़कर अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए कि उसने आपको भारत में पैदा किया।
शुक्रगुज़ार होना कमजोरी नहीं… ईमान की निशानी है।
जब दुनिया के कई हिस्सों में मुसलमान आपस में ही सियासी लड़ाइयों और जंग का शिकार हैं, तब आप यहाँ अमन से रोज़ा रख रहे हैं, नमाज़ पढ़ रहे हैं, ज़कात दे रहे हैं।
आपकी मस्जिदें खुली हैं।
आपका रोज़ा महफ़ूज़ है।
आपकी इबादत पर कोई पहरा नहीं।
ये सब यूँ ही नहीं है।
ये इस मिट्टी की ताकत है। इस लोकतंत्र की ताकत है। इस बहुसंख्यक हिंदू क़ौम की सहनशीलता है।
हर वक़्त शिकायत करने से पहले आईने में देखिए।
जिस थाली में खाते हैं, उसी को कोसना बंद कीजिए।
वतन ने आपको पहचान, अधिकार और सुरक्षा दी है।
भारत आपकी सबसे बड़ी नेमत है।
अल्लाह भारत को सलामत रखे…और हमें भी शुक्रगुज़ार बनाए। आमीन
सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा ❤️