Gujarat PSC is conducting preliminary exam of state civil services across 21 Districts of the State of more than 1.5+ lakhs candidates. All the best "Aspirants".
17 दिन बाद सुरंग से निकले हैं.
फिर भी मुस्कान देखिए चेहरे पर.
ग़ज़ब का हौसला दिखाया.
सभी 41 मज़दूरों को सलाम.🙏🏼😍
वैसे भी मुश्किलों से लड़ना और जीतना मज़दूरों से बेहतर कौन जानता है✌🏼
कई बार साहित्य से इतर चीज़ें भी प्रभावित करती हैं जैसे मोहम्मद शमी पर लिखा गया यह लेख।
उत्तर प्रदेश के अमरोहा के लोकल टूर्नामेंट में तौसीफ अली नाम के एक तेज गेंदबाज का बोलबाला था। तौसीफ तेज गेंदबाजी का शौक और हुनर दोनों रखते थे। लोग बाग सलाह भी देते कि क्लब में जाओ, ट्रेनिंग करो डोमेस्टिक में जा सकते हो। पर तौसीफ अली किसान परिवार से थे, डोमेस्टिक या नेशनल के लायक तैयारी के लिए न पैसे थे, ना ही उम्र बची थी। एक समय आया जब तौसीफ अली ने स्वीकार कर लिया कि शायद ये खेती किसानी ही उनका मुकद्दर है, प्रोफेशनल क्रिकेट के लिए देर हो चुकी है। तौसीफ अली भारतीय टीम के फास्ट बॉलर का सपना दिल में दफन करके अपनी आम ज़िंदगी में लौट आए। शादी हुई, खेती किसानी से परिवार पाला। पाँच बेटे हुए, और सबके अंदर क्रिकेट को लेकर दीवानगी। तौसीफ अली को मालूम था कि उनसे कहाँ-कहाँ ग़लती हुई थी, क्या-क्या नहीं हुआ जिसकी वजह से उन्हें अपने सपने मारने पड़े। वो अपने बच्चों के साथ ऐसा कुछ नहीं होने देना चाहते थे। पंद्रह साल तक अपने बेटे को गेंदबाज बनने के लिए ख़ुद ट्रेन करते रहे, अपने तजरबे अपनी ग़लतियों का निचोड़ उन्होंने अपने बेटे की राह में रख दिए। बेटे को बस चलना था और वो हासिल करना था जिसे हासिल करने की जद्दोजहद का मौका भी उसके अब्बू को हासिल नहीं हुआ था।
पंद्रह साल की उम्र तक बेटे को ट्रेन करने के बाद तौसीफ अली अपनी सारी जमा पूंजी इकट्ठा करके अपने बेटे को लेकर मुरादाबाद की एक क्रिकेट एकेडमी में कोच बदरुद्दीन के पास लेकर गए। कोच के सामने बेटे ने गेंद फेंकना शुरू किया तो बदरुद्दीन ने तुरंत उसे अपना शागिर्द कुबूल कर लिया। वो लड़का इस कदर मेहनती था कि उसने एक दिन भी ट्रेनिंग का नागा नहीं किया, मुरादाबाद में ट्रेनिंग के दौरान अगर कोई मैच ख़त्म होता तो वो लड़का पुरानी इस्तेमाल हुई गेंद मांगने खड़ा हो जाता, वजह पूछी गई तो बताया कि इन पुरानी गेंदों से मैं रिवर्स स्विंग की प्रैक्टिस करूँगा। बदरुद्दीन को पूरा यकीन था कि इस लड़के को अंडर 19 के ट्रायल में तो सिलेक्टर उठा ही लेंगे। इसी उम्मीद के साथ शमी ने ट्रायल दिया, सोच बदरुद्दीन के मुताबिक सिलेक्टर के पक्षपातपूर्ण रवैए के कारण शमी को मौका नहीं दिया गया। बदरुद्दीन से कहा गया कि अगले साल आइए इसे लेकर, लड़के में जान है, कब तक दूर रखेंगे सिलेक्टर इसे इंडियन कैप से। बदरुद्दीन दूरदर्शी आदमी थे, बोले इस लड़के का एक साल और दाव पर नहीं लगाना है, उन्होंने लड़के के पिता तौसीफ अली से बात की और कहा कि इसे आप कलकत्ता भेजिए। वहाँ क्लब खेलेगा तो आज नहीं कल स्टेट टीम में आ ही जायेगा। तौसीफ अली के पास ये जुआ खेलने की सिर्फ़ एक वजह थी अपने बेटे की काबिलियत और जुनून पर उनका भरोसा।
कलकत्ता आकर उस लड़के ने एक क्लब ज्वाइन कर लिया, पर स्टेट और नेशनल टीम का रास्ता दूर भी था और मुश्किल भी। जुनून के भरोसे वो बंगाल तो पहुँच गया, पर जुनून न तो पेट भरता है न सर पर छत रखता है। पर दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो जुनून और काबिलियत ही ढूँढ़ते हैं लोगो में, ऐसे ही एक शख़्स थे देवव्रत दास, जो कि उस वक्त बंगाल क्रिकेट के असिस्टेंट सेक्रेट्री की हैसियत पर थे। वो उस लड़के की काबिलियत से इतने इंप्रेस हुए कि कलकत्ता में बेघर उस लड़के को अपने साथ रहने के लिए रख लिया। फिर उन्होंने बंगाल के एक चयनकर्ता बनर्जी को उस लड़के की प्रतिभा पर नज़र रखने को कहा।बनर्जी ने लड़के को गेंद फेंकते देखा और उसे बंगाल की अंडर 22 की टीम में सिलेक्ट कर लिया। देवव्रत दास से जब उस लड़के पर ऐसी मेहरबानी की वजह पूछी गई तो उन्होंने कहा कि "इस लड़के को रुपया पैसा नहीं चाहिए, इसे बस एक चीज़ नज़र आती है, वो है पिच के आख़िर में गड़े हुए तीन स्टंप। स्टंप से गेंद के टकराने की आवाज़ उस लड़के को इतनी पसंद है कि उसके ज़्यादातर विकेट बोल्ड आउट ही हैं।"
वहाँ से निकलकर उस लड़के ने मोहन बागान क्लब ज्वाइन किया, वहाँ ईडन गार्डन के नेट्स में उसने सौरव गांगुली को गेंदबाजी की। सौरव के साथ भी वही हुआ, जो अब तक हर उस इंसान के साथ हो रहा था जो उस लड़के को गेंद फेंकते हुए देख रहा था। गांगुली इंप्रेस हुए और फिर उनकी रिकमेंडेशन पर शमी को बंगाल की 2010–11 की रणजी टीम में चुन लिया गया। कुछ साल की मेहनत और जद्दोजहद के बाद 6 जनवरी 2013 के दिन पाकिस्तान के खिलाफ इस लड़के को इंडियन टीम की डेब्यू कैप दी गई। जिसे पहनने के बाद आज तक वो लड़का उस टोपी नंबर 195 का रुतबा दिन ब दिन बढ़ाए जा रहा है।
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मुझे आज भी सौरव गांगुली का गौरव कपूर के साथ हुआ वो इंटरव्यू याद है जिसमें सौरव बताते हैं कि एकबार उनकी राहुल द्रविड़ की पत्नी से बात होती है। उनकी पत्नी सौरव से कहती हैं कि राहुल पता नहीं क्यों बहुत चिड़चिड़े से हो गए हैं। हर बात पे भड़कते रहते हैं। घर पर सब उनसे तंग आ गए हैं।
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