हर दिन दिल्ली के किसी इलाके से एक हादसे की खबर आती है। हर इलाके में ट्रॉमा वाली जगहें बन रही हैं। फिर भी लोगों को लगता है कि यह हमारे साथ नहीं होगा, किसी और के साथ ही होगा
@AshishXL असल में शहरी सभ्यता, विशेष कर अनेक दिल्लीवासी 'हमें क्या लेना' की मानसिकता से जी रहे हैं। यही कारण है की हादसे हो रहे हैं। लोगों की दर्दनाक मौत का सिलसिला जारी है। मगर नगर नियोजन प्रबंध ईमानदारी से लागू नहीं हो रहे हैं। बहुत से चोर रास्तों से दोषी बचकर निकल जाते हैं।
कई सेंटरों में परीक्षा के इंतजाम बहुत बेकार हैं, खिड़कियां नहीं, वेंटिलेशन नहीं है। पंखे नाकाफी हैं, पूरा कमरा गरमी में तपने लगता है। ठंडे पानी की व्यवस्था भी अच्छी नहीं है। ऐसे में सोचिए बच्चे परीक्षा देने के लिए ऐसे कमरों में 8 बजे से 1130 बजे तक ऐसे ही बैठे रहे। क्रूरता है यह
नेता और अफसर दिखाने के लिए साइकिल या मेट्रो से चल देते हैं लेकिन पब्लिक को तो रोज पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेना मजबूरी है। फरीदाबाद का हाल कितना बदहाल है, क्या किया जाए
भाषाएं लोगों की होती हैं, किसी एक धर्म की नहीं। पंजाब और कश्मीर में बहुत सारे हिन्दू उर्दू पढ़ते रहे हैं। मेरा बेटा खुद फारसी और उर्दू का स्टूडेंट है। आज उसके कोरियर डिलिवरी पैकेट में यह किताब दिखी।
हनुमान चालीसा, शनि चालीसा आदि उर्दू में।
@AshishXL ... और उर्दू कोई विदेशी या किसी एक खास समुदाय की भाषा नहीं है। वर्तमान में अंधभक्ति और विवेक हीनता का जो दौर है उसमें विषय वस्तु की सत्यता को जानने के लिए पढ़ने, अन्य विश्वसनीय वैज्ञानिक स्रोतों से जानने की उत्सुकता, जरूरत सिकुड़ती जा रही है।
@AshishXL शासनसत्ता को कब्जाने के लिए धर्म, जाति और भाषा को घोषित या अघोषित रूप में मुद्दा बनाया गया। अलगाववाद फैलाया गया। भाषा से नफरत इसी छिछली, असंवैधानिक मानसिकता की देन है।...
@SudhirMisraNBT एकदम सही, लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि यह सरकार प्रचार के मेगा शो को लेकर चर्चित है। मसलन ₹10 हजार के शौचालय के प्रचार पर₹1 लाख खर्च होंगे ही। बाकी पीएम की यात्राएं, मंत्रियों के टूर और रैलियां आदि आदि में करोड़ों का खर्चा भी जोड़ लीजिए।
तमिलनाडु में विजय की सरकार बनने का रास्ता साफ़ हुआ। कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों के सहयोग से सरकार बनेगी। विजय की पहली परीक्षा, जनता से किए वादों को पूरा करने की होगी। https://t.co/ndgYD6FIhW
राष्ट्रपति भवन में राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान में दिए जाने वाले भोज में हर बार एक खास राज्य की थीम रखी जाती है ताकि उन्हें देश के एक हिस्से की खान पान संस्कृति की झलक मिले। न सिर्फ भोजन, बल्कि अन्य सजावट और संगीत में भी यही प्रयास हो रहा है।
अपील की जा रही है मीडिया के बड़े संस्थानों से कि टीआरपी के चक्कर में पत्रकारों को वहां ना भेजें। फंसे पत्रकारों को वापस देश सुरक्षित लाने के इंतजाम किए जाए।
यह लेख हमसे कई सवाल पूछता है सच तो यह है कि सरकारी फाइलों में हमारी जान की कीमत एक रिफ्लेक्टर से भी कम है...अफसरों को पता है कि जनता की याददाश्त कमजोर है हमारी मौत उनके लिए एक आंकड़ा है और जांच सिर्फ वक्त काटने का जरिया...हम चीखते हैं और फिर चुप हो जाते हैं।
@NBTDilli@AshishXL