अरे @kunalpratap86 जी खुश तो हैं न? अब तो मान रहे हैं न सरकार और CID आपके साथ है? अब तो न्यायालय पर भरोसा कीजियेगा न? अब तो जो कोर्ट फैसला देगा वो मानियेगा न?
थोड़ा अपन�� सेहत का ध्यान रखियेगा आराम करने का सलाह दिए हैं न डॉक्टर जिस तरह से झारखंड के भोले भाले छात्रों को बरगला रहे हैं कही फिर से कोर्ट में हारने के बाद बीमारी का बहाना बना के भागना न पड़े।
Good night Kunal ji
@kunalpratap86@JPSCreformanch@ExamsFighters मुझे बस इतना पूछना है माफिया जी, इस अफेडेविट को पढ़ने के बाद ये तो नहीं बोलोगे न कल को कि "सरकार बिक गयी है" अथवा "सरकार डबल गेम खेल रही??"
@Mulwasi12 बिल्कुल सही कहा। शिक्षा के साथ संस्कार और सभी समुदायों के प्रति सम्मान की भावना भी जरूरी है। असहमति हो सकती है, लेकिन भाषा में मर्यादा रहनी चाहिए। 🙏
#JSSC_CGL मेहनत हमारी, हक़ हमारा-
नहीं छिनेगा अधिकार हमारा!
दोषी पर हो सख़्त कार्रवाई
निर्दोषों को मिले न्याय की गारंटी!
मेहनत नहीं झुकेगी,
सच्चाई नहीं रुकेगी—
जब तक न्याय नहीं मिलेगा,
आवाज़ हमारी नहीं थमेगी!#justice_for_jssc_cgl_selected_genuine_student
गरीब घर का लड़का, सीमित साधनों के बावजूद दिन-रात मेहनत करके नौकरी हासिल कर गया। 💪❤️
उसकी मेहनत, संघर्ष और जज़्बे को दिल से सलाम। 🙏🇮🇳
हालात कमजोर हो सकते हैं, हौसले नहीं। 🔥
Justice for Genuine
🙏मेरी क्या गलती है ?🙏Please एक बार समय निकालकर मेरी पूरी कहानी जरूर पढ़िए। 🙏🙏
**क्या मैं JSSC CGL में ₹35–40 लाख देकर भर्ती हुआ हूँ?**
मैं **चोन्द्रो हाईबुरू**, पश्चिमी सिंहभू��, झारखंड के खूँटपानी प्रखंड के केयाडचालोम गाँव का रहने वाला हूँ। मैं एक गरीब आदिवासी **‘हो’ परिवार** से आता हूँ।
### 💔 मेरे संघर्ष की शुरुआत
वर्ष **2005 में**, जब मैं मात्र 10 वर्ष का था और चौथी कक्षा में पढ़ता था, जंगल में लकड़ी काटने के दौरान पेड़ से गिरने के कारण मेरे पिताजी का आकस्मिक निधन हो गया। चार छोटे बच्चों और बुजुर्ग दादाजी की जिम्मेदारी अचानक माँ के कंधों पर आ गई।
घर का बड़ा बेटा होने के कारण बचपन से ही परिवार की जिम्मेदारी महसूस करने लगा। माँ खेतों में मजदूरी करती थीं। मैं घर का काम करता, सब्जी उगाता और उसे बाजार में बेचकर घर की जरूरतें और अपनी पढ़ाई का खर्च निकालता था।
माँ की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वह साल में अपने लिए केवल **एक साड़ी** खरीद पाती थीं। हम बच्चे भी कभी अतिरिक्त कपड़ों की जिद नहीं करते थे, क्योंकि हमें पता था कि माँ की मजबूरी क्या है।
### 📚 पढ़ाई के साथ संघर्ष
गाँव से 8वीं तक पढ़ाई करने के बाद **2009 में 15 किलोमीटर दूर सरायकेला** में 9वीं में दाखिला लिया। पढ़ाई के साथ खेती और सब्जी बेचने का काम करता था। साइकिल से सब्जी बाजार ले जाता, बेचता, फिर कोचिंग और स्कूल जाता था।
**2011 में मैट्रिक प्र���म श्रेणी** से पास किया और **2013 में इंटर द्वितीय श्रेणी** से पास किया।
2012 में टाटा स्टील ट्राइबल कल्चर सोसाइटी के माध्यम से **वारंग चिति लिपि और हो भाषा** का अध्ययन किया और अंतिम परीक्षा में पूरे कोल्हान क्षेत्र में **द्वितीय स्थान** प्राप्त किया। इसके लिए मुझे सम्मानित भी किया गया।
लेकिन पढ़ाई जारी रखने के लिए पैसे की जरूरत थी। माँ पर बोझ न पड़े, इसलिए **अदित्यपुर में दिहाड़ी मजदूरी** की। फिर **2014 में चेन्नई** जाकर मजदूर साथियों के लिए खाना बनाने का काम किया। आर्थिक मजबूरी के कारण मेरी पढ़ाई लगभग 2 वर्ष तक छूट गई।
### 👮 ITBP तक का सफर
2015 में मैंने **ITI की प्रवेश परीक्षा** दी। मेरा **District CML Rank-10 और Category CML Rank-1** आया और मुझे Fitter ट्रेड मिला।
लेकिन 2017 में ITBP में चयन हो जाने के कारण मैं अपनी ITI की पढ़ाई पूरी नहीं कर सका।
**8 मई 2017** को मैंने **ITBP में सिपाही (GD)** के रूप में योगदान दिया। 2017–18 में बेसिक ट्रेनिंग पूरी की। इसके बाद नौकरी करते हुए **IGNOU से BA** किया और 2021 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
### 🎯 JSSC CGL का सपना
बेहतर भविष्य और अपने परिवार के लिए मैंने JSSC CGL की तैयारी शुरू की। ITBP की कठिन ड्यूटी के बाद भी पढ़ाई करता रहा। पंजाब एवं हरियाणा हाई क��र्ट, चंडीगढ़ की सुरक्षा में तैनाती के दौरान भी ड्यूटी के बाद तैयारी जारी रखी। मेरी मेहनत देखकर अधिकारियों ने भी पढ़ाई के लिए ड्यूटी का समय कम किया।
JSSC CGL 2021 रद्द हुआ तो मैंने **JSSC CGL 2023** के लिए फिर मेहनत शुरू कर दी।
28 जनवरी 2024 की परीक्षा में शामिल हुआ, लेकिन परीक्षा समाप्त होने के कुछ ही घंटों बाद परीक्षा रद्द हो गई।
इसके बाद दोबारा परीक्षा हुई।
22 सितंबर 2024 को
### 🥹 4 दिसंबर 2024 — उम्मीद की किरण
**4 दिसंबर 2024** को रिजल्ट आया और उसमें मेरा रोल नंबर था। मैं और मेरा पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।
लेकिन भर्ती का मामला हाई कोर्ट चला गया। **17 दिसंबर 2024** को अंतिम परीक्षाफल पर रोक लग गई और लगभग एक वर्ष तक जांच एवं सुनवाई चलती रही।
अंततः **3 दिसंबर 2025** को हाई कोर्ट के अंतिम फैसले के आधार पर JSSC ने मेरिट लिस्ट जारी की और मेरा चयन **सहायक प्रशाखा पदाधिकारी** के पद पर हुआ।
### 👶 बेटे का जन्म और नियुक्ति पत्र
मेरे जीवन ��ें खुशी के दो बड़े पल एक साथ आए।
**12 दिसंबर 2025** को मेरे बेटे का जन्म हुआ।
और **30 दिसंबर 2025** को माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन जी के कर-कमलों से मुझे नियुक्ति पत्र मिला।
उस समय लगा कि मेरे वर्षों के संघर्ष का फल मिल गया। मेरे बेटे के जन्म के साथ मेरे परिवार का भविष्य भी सुरक्षित हो गया।
### ⚖️ ITBP छोड़कर नई नौकरी
मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचा। **5 जनवरी 2026** को सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्याया���य के फैसले को सही ठहराते हुए SLP खारिज कर दी।
इसके बाद मुझे अपनी नौकरी सुरक्षित होने का विश्वास हुआ।
मैंने **20 जनवरी 2026 को ITBP से त्यागपत्र दिया** और **21 जनवरी 2026 को कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग** में योगदान दिया।
### ❤️ माँ के साथ सम्मान
#लाठीचार्ज_पर_दोहरा_मापदंड
"सत्ता में सन्नाटा, विपक्ष में हंगामा—आख़िर कब तक चलेगी यह दोगली राजनीति?" 🎭📢
👉 जब अपने शासित राज्य में निहत्थे लोगों पर पुलिस की लाठियाँ ���रसती हैं, तब नेताओं के मुँह पर ताले लग जात��� हैं। मीडिया सेल को सांप सूँघ जाता है और बयान आता है—"कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है।"
👉लेकिन वही घटना जब किसी विपक्षी राज्य (जैसे झारखंड) में होती है, तो अचानक 'लोकतंत्र की हत्या' की चीखें सुनाई देने लगती हैं। रातों-रात पोस्टर छप जाते हैं, टीवी डिबेट्स में गला फाड़कर चिल्लाया जाता है और 'सड़क से सदन तक' चक्का जाम कर दिया जाता है!
यह सिर्फ किसी एक पार्टी की बात नहीं है, यह आज की राज��ीति की कड़वी सच्चाई बन चुकी है:
👉 अपने राज में: पुलिस की बर्बरता भी 'प्रशासनिक सख़्ती' कहलाती है।
विपक्ष के राज में: वही लाठीचार्ज 'तानाशाही' और 'मानवाधिकार का हनन' बन जाता है।
अपने राज में: चुप्पी ही सबसे बड़ा समाधान है।
विपक्ष के राज में: इस्तीफा माँगे बिना रोटी हज़म नहीं होती!
असली सवाल लाठी का नहीं, राजनीतिक चश्मे का है!
👉 मु��्दा यह कभी था ही नहीं कि जनता पर लाठी क्यों चली या किसका ख़ून बहा। मुद्दा सिर्फ इतना सा है कि "लाठी घुमाने वाली सरकार अपनी है या दूसरे की?"
अगर आपकी हमदर्दी इस बात पर निर्भर करती है कि पीड़ित किस राज्य में है और हुकूमत किसकी है, तो यह जनता का दर्द नहीं, आपकी राजनीतिक अवसरवादिता (Political Opportunism) है। जनता अब इस 'सुविधाजनक विरोध' (Selective Outrage) के ढोंग को अच्छी तरह समझ चुकी है।
👉 न्याय और विरोध का मानक राज्य की सीम���एँ या पार्टी का झंडा देखकर नहीं बदलना चाहिए। लाठी का दर्द हर नागरिक के लिए एक समान होता है, चाहे वह भाजपा शासित राज्य हो या विपक्ष शासित!
⚡ आप राजनीति के इस दोहरे चरित्र पर क्या सोचते हैं? क्या आपको भी लगता है कि विरोध अब सिर्फ़ कुर्सी का खेल बनकर रह गया है?
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