क्लासिक बनाम पॉपुलर: क्या होती है एक अच्छी रचना?
सोशल मीडिया पर सा���ित्य को लेकर पॉपुलर बनाम क्लासिक की चर्चाएं अक्सर सुनता रहता हूं। इन चर्चाओं में क्लासिक के प��्षधर लोग साहित्य में पॉपुलर लोगों की अक्सर टांग खिंचाई करते ही दिखते हैं। वो बताते हैं कि कैसे जो क्लासिक चीज़ है वही याद रखी जाएगी और किसी तरह पॉपुलर चीज़ें लिखने वाले दोयम दर्जे का काम कर रहे हैं। वहीं पॉपुलर माने जाने वाले लोगों को अक्सर लगता है कि इस तरह की चर्चाएं करने वाले जलनखोर लोग हैं। जो सिर्फ उनकी लोकप्रियता से चिढ़ते हैं और उसी चिढ़ की वजह से बार-बार ये मुद्दा छेड़ते हैं।
मगर मुझे लगता है कि ये पूरा मामला लोकप्रिय और क्लासिक का है ही नहीं और न ही इसे ऐसे देखा जाना चाहिए।
किसी भी लेखक से किसी और जैसा हो जाने का आग्रह करना या उम्मीद रखना ही गलत है। हर इंसान एक अलग पृष्ठभूमि से आता है। उस पृष्ठभूमि से वो अपने लिए अलग कच्चा माल लेकर आता है। उसके भाषायी संस्कार भी अलग होते हैं। अब इस इंसान के पास अगर एक्सप्रेशन है, वो चीज़ों को ऑब्सज़र्व करता है, तो उसे पूरा हक है कि वो अपने हिस्से का सच, अपनी देखी दुनिया, अपनी भाषा में दुनिया को बताए। और जब वो ऐसा करता है तो उन लाखों करोड़ों लोगों की भी बात करता है जो उसकी ही दुनिया के हैं। अब उसकी दुनिया के लोग उसकी भाषा से, उसके मुद्दों से, उसकी संवेदनाओं से रिलेट कर रहे हैं तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है।
इसलिए बजाए ये शिकायत करने के कि फलां बहुत हल्का लिख रहा है, वो तो जानबूझकर पॉपुलर राइटिंग करता है आपको तो इस बात की तसल्ली होनी चाहिए आज के ज़माने में वो शख्स किसी तरह से लोगों को किताबों से जोड़ तो पा रहा है। इन जुड़ने वालों में बहुत सारे फर्स्ट टाइम रीडर भी हैं। जिन्होंने इससे पहले कोई साहित्यिक किताब पढ़ी भी नहीं। यही फर्स्ट टाइम रीडर कल ��ो ग्रो भी करेगा। वो जैसी चीज़ों से आकर्षित होकर किताबों की तरफ आया है कल को वो उससे भी बेहतर पढ़ना चाहेगा। वक्त के साथ उसकी भी बौद्धिक प्यास बढ़ेगी।
इसमें तो कोई शिकायत होनी ही नहीं चाहिए। मगर शिकायत तो हर दिन सुनने को मिलती है। इसलिए शिकायत करने वालों को ये खुद से पूछना है कि उनकी शिकायत लोकप्रिय लेखकों के औसत लिखने से है या इस औसत लिखने से मिली उनकी शोहरत से।
दूसरा कड़वा सच ये है कि आप जीवन में बौद्धिकता के किसी भी पायदान पर क्यों न खड़े हों। खुद को कितना भी Intellectual क्यों न मानते हों मगर आपके ऊपर भी ऐसी विधा, ऐसे लोग होंगे जिनकी नज़र में आप औसत हैं। वो भी आपको क्लासी नहीं मानते होंगे। रफी को पंसद करने वालों की नज़र में अरिजीत सिंह हल्के हैं। गुलाम अली को पसंद करने वालों के लिए रफी में वो बात नहीं। क्लासिक संगीत के चाहने वालों को हो सकता है गुलाम अली भी बाज़ारू लगते हों।
साहित्य में ��ी कुछ लोग व्यंग्य को विधा मानने को तैयार नहीं। कहानीकार व्यंग्यकार को भाव नहीं देता। उपन्यासकार कहानीकार को और कवि को तो लगता ही है कि सबसे ज़्यादा रचनात्मक काम कविता करना ही है। हर दूसरा कलाकार किसी दूसरे की कलात्मक हैसियत तय कर रहा है।
मूल बात ये है कि एक समाज संवेदनाओं के, बौद्धिकता के कई स्तरों पर एक साथ जी रहा होता है। इन्हीं अलग-अलग स्तरों से अभिव्यक्ति करने के लिए लोग भी आते हैं जिन्हें समाज कलाकार कहता है। अ���र हम ये ज़िद्द पाल लें कि नहीं, हम जो बता रहे हैं वही आदर्श है, वही पवित्र है, तो न तो ये रचनाकारों के साथ न्याय होगा और न ही कला की अलग-अलग समझ रखने वाले लोगों के साथ।
मगर दिक्कत ये होती है कि जब बतौर चिंतक, बतौर क्रिएटर हम खुद को कहीं प्लेस करने लगते हैं। खुद की एक हवाई छवि बना लेते हैं। फिर हमारी वो छवि अच्छे-बुरे के पैमाने तैयार करती है और जब किसी का काम उन पैमानों पर खरा नहीं उतरता, तो हम उसे सिरे से ही खारिज कर देते हैं। खासतौर पर उन लोगों का काम जो हमारे तय पैमानों से हल्का है लेकिन ज़्यादा लोकप्रिय हो गया है। लोगों को बुरे काम की परवाह कहां होती हैं। अंग्रेज़ी में भी दसियों लोग हर रोज़ बुरी किताबें लिख रहे हैं मगर चेतन भगत से लोगों की तकलीफ ये है कि वो इतना औसत लिखकर भी इतने लोकप्रिय कैसे हो गए। इतना पैसा कैसे कमा रहे हैं।
मगर ये तकलीफ भी व्यर्थ है। क्योंकि मुझे लगता ���ै कि एक कलाकार के लिए आज का वक्त जितना लोकतांत्रिक है उतना शायद ही पहले कभी रहा हो। आज एक औसत चीज़ के लिए मंच और बाज़ार मौजूद है तो एक क्लासिक के लिए भी है।
This is why I am so scared of driving or being in a car on highways, especially in India ⚠️
It’s not my driving that I don’t trust. It’s the car next to me.
Imagine that this person feels that it’s a flex to say that he hasn’t slept and is driving at 170 kmph.
जिस धर्म और संस्कृति को व्यक्तित्व विकास का आधार होना चाहिए, उसे आज सत्ता और शक्ति पाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
जरा सोचिये और संभालीये।
#religions#peace#life#NupurSharama#दंगा#धर्म
रूस और यूक्रेन के बम फुस्सड़ ही निकले पिछले डेढ़ महीने से फोड़े जा रहें हैं लेकिन आज तक न वातावरण प्रदूषित
हुआ, न किसी बॉलीवुड सि��ेब्रिटी को अस्थमा हुआ, और न ही अंटार्कटिका की बर्फ पिघली; इससे ज्यादा शक्तिशाली हमारे दीपावली के पटाखे होते हैं !
समूची पृथ्वी खतरे में पड़ जाती है।
That's the exact point what everybody missing, most of past horrible incidents occurred due to free hate speech or free misconceptions speech. @kunalb11@elonmusk
The Jaswant Thada is a cenotaph located in Rajasthan's Jodhpur. It was built by Maharaja Sardar Singh of Jodhpur State in 1899 in memory of his father, Maharaja Jaswant Singh II, and serves as the cremation ground for the royal Rajput family of Marwar.
PC: ALTUG GALIP
@warikoo Actually, everyone is sensitive enough, no such thing exists. If u really want peace just know
-Most of problem occurs when we give reaction. mind is so reactive, just control it.
-Don't fake your persona that you're God like being, so when u need help u can ask it.
That's it.