जंतर मंतर प्रोटेस्ट को लेकर मिडिल ईस्ट देशों के हैंडल से फ़ेक नैरेटिव फैलाने और विदेशों से जंतर मंतर के लिए ऑनलाइन खाना आर्डर किए जाने के सवाल पर विदेश मंत्रालय का जवाब
“हमारे पास ऐसी कोई जानकारी नहीं”
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यहां तक कह दिया कि “मिडिल ईस्ट के देशों में बहुत से भारतीय रहते हैं वो भी कर सकते हैं। हालाँकि कि ऐसी कोई जानकारी नहीं है।”
वह 28 जुलाई 1987 की रात थी। प्रभाकरण तेज़ी से चलते हुए प्रधानमंत्री राजीव गांधी के घर में स्थित कार्यालय में पहुँचा। राजीव ने मुस्कुराते हुए प्रभाकरण का स्वागत किया, प्रभाकरण के साथ बलसिंघम और तमिलनाडु के एक नेता भी थे। प्रभाकरण ने बैठते ही अपनी आशंकाएँ जतानी शुरू की। उसने कहा कि श्रीलंका सरकार पर कभी भी भरोसा नही किया जा सकता। राजीव ने कहा कि तमिलों का हित उनके लिए सर्वोपरि है और वे श्रीलंका सरकार से उनके लिए अधिकतम रियायतें पाने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रभाकरण ने वित्तीय समस्याओं का मुद्दा उठत्या। उसने बोला कि जाफ़ना में कर वसूली बंद होने से लिट्टे का ख़ज़ाना ख़ाली हो जाएगा। प्रभाकरण ने कहा कि यह पैसा उसे अपने लिए नही चाहिए बल्कि टाइगरों के लिए चाहिए। राजीव ने कहा व्यवस्था हो जाएगी, लिट्टे के हितों का पूरा ध्यान रखा जाएगा। प्रधानमंत्री जे आर जयवर्द्ध्ने ने श्रीलंका के उत्तर पूर्वी शासन में लिट्टे को सबसे अहम और बड़ी भूमिका सौंपे जाना का भरोसा भी दिलाया ।इस बैठक में राजीव, प्रभाकरण की हर बात पर सिर हिला रहे थे। प्रभाकरण अंततः समझौते के लिए तैयार हो गया।
राजीव मुस्कुराए। एक शानदार भोजन का आयोजन किया गया। प्रभाकरण देर रात जाने लगा तो राजीव गांधी ने अपने बेटे राहुल को अपनी बुलेट प्रूफ़ जैकेट लाने को कहा। राहुल जैकेट लेकर आए तो राजीव ने उसे बड़ी आत्मीयता से प्रभाकरण को पहनाने के बाद उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा ‘अपना ध्यान रखना’। इधर लिट्टे प्रमुख जाफ़ना लौटने की तैयारी में था और उधर राजीव गांधी एक दूसरे विमान से कोलम्बो में इतिहास रचने जा रहे थे।कोलम्बो में शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए अगले दिन राजीव गांधी श्रीलंकाई सैनिकों की टुकड़ी से गार्ड ऑफ़ ऑनर ले रहे थे कि एक सिंहली सैनिक ने उन पर राइफल के ठुड्डे (बट) से हमला बोल दिया। राजीव उस हमले में बच गए , लेकिन लिट्टे ने चार साल बाद उन्हें बम से उड़ा दिया।
इस घटना के तक़रीबन 30 साल बाद की एक दूसरी घटना है। 2013 में एक व्यक्ति जो कांग्रेस को लगातार नुक़सान पहुँचा रहा था ,सोनिया गांधी और राहुल गांधी को 2013 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहा था अन्य नेताओं के साथ राहुल गांधी के आवास पर एक बैठक में शामिल होने पहुँचा। वह व्यक्ति उक्त बैठक में लगातार हर मुड़े पर अपनी असहमति जता रहा था। भीतर माहौल तल्ख़ था, बाहर तेज़ बारिश हो रही थी, बैठक बिना किसी निर्णय के ख़त्म हुई। जब सब बाहर निकलने लगे राहुल ने छाता मँगाया और उस नेता को जो व्हिल चेयर पर था के सिर पर तानकर उसे बारिश से बचाता हुआ गाड़ी तक छोड़ आया। एक पत्रकार मित्र ने मुझसे कहा ‘अपने पापा पर गया है’।
Remembering Rajiv Gandhi on the anniversary of his tragic death.
He was one of the warmest, most decent human beings to become Prime Minister of India. With him, what you saw was what you got; there was no deviousness, no subterfuge & certainly, no megalomania.
When he made mistakes he admitted it. When he felt he had been unfair to people he apologised. And despite growing up in a political family he never let the cynicism that characterises Indian politics get to him.
We often forget that he may have been the first Indian PM to have ever held a regular job, to have paid income tax and PF. This gave him an understanding of how salaried people in India lived & how the system was tilted against them. During his time taxes were lowered,the stock
market boomed and India prepared for the digital age.
He went too soon. If he had lived he would have returned to power sooner rather than later. By the time he died, he had learned from the early mistakes that his inexperience led him to make & was ideally placed to lead India into the 21 st Century and to forge a society
that had no room for divisiveness & hatred. As even his critics will concede, he was at heart a unifier, signing accords in Punjab, Assam & Mizoram, ending conflicts and building a better India.
राजीव गांधी को गए 35 साल हो गए. 80 के दशक में जब हम बड़े हो रहे थे तो हम देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री से बेपनाह मोहब्बत और नफरत दोनों करते थे. 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री की नृशंस हत्या के बाद टीवी पर हम ने अगले 12 दिनों तक दिन रात देखा. माँ के शव के सर की तरफ काला चश्मा लगाए, अमिताभ बच्चन के साथ खड़े राजीव गांधी के मासूम चेहरे को देख देख कर हम सबको उनसे वैसे ही प्यार हो गया था जैसे उन दिनों नए नए चले टीवी धारावाहिकों से हुआ था.
1989 में जब उनके कार्यकाल के बाद देश में आम चुनाव हुए तो राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की हार हुई. तब उनकी हार का एक बड़ा करण यह भी था कि दूरदर्शन को उन्होंने ‘राजीव दर्शन’ बना दिया था. टीवी पर देखकर उनसे प्यार हुआ और फिर टीवी पर उनको इतना देखा कि उनसे नफरत सी होने लगी थी.
संयोग से, दिल्ली में जिन दो विद्वानों के साथ कुछ अच्छा समय बिताने का सुयोग हुआ उनमें एक मनोहर श्याम जोशी थे और दूसरे वागीश शुक्ल. दोनों राजीव गांधी के घनघोर प्रशंसक थे. उनका यह मानना था कि आजादी के बाद देश में जो यथास्थितिवाद था उसको तोड़ने, एक बड़ा झटका देने का काम राजीव गांधी ने किया. यह जरूर है कि उन्होंने समय से पहले देश में कम्युनिकेशन तथा कम्प्यूटरीकरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम उठाये. उस समय इसका बहुत विरोध हुआ क्योंकि लोग इस बात को ठीक से समझ नहीं पाए. लेकिन बाद में इन दो क्षेत्रों ने ही देश में युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा किये. जोशी जी कहते थे कि वह पहला प्रधानमंत्री था जिसमें विजन था, जो देश को आगे ले जाना चाहता था और उसके लिए उसके पास योजनाएँ थीं. यह जरूर था कि राजनीतिक समझ के मामले में वे कुछ अपरिपक्व थे लेकिन उनके काम युगांतकारी रहे.
वे मजाक में कहते थे कि पाकिस्तान भारत से इसीलिए बहुत पीछे रह गया, उसका समाज आगे नहीं जा पाया क्योंकि वहां कोई राजीव गांधी जैसा प्रधानमंत्री नहीं बना. अगर पाकिस्तान में भी समय पर कम्प्यूटरीकरण हो गया होता तो पाकिस्तान में सामाजिक-राजनीतिक हालात जस के तस नहीं बने रहे होते.
दुर्भाग्य की बात यह है कि इस देश में ऐसे किसी भी नेता को याद नहीं रखा जाता जिसने समाज के विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण काम किया हो. हम अपने नेताओं को उनके राजनीतिक कामों से ही याद करते हैं. इसीलिए इतिहास में राजीव गांधी का वह दर्जा नहीं बन पाया है जिसके वे असल में हकदार हैं.
आज 21 मई है. मुझे आज भी 1991 का यह दिन याद है. मैं डीयू में पढता था और गर्मी की छुट्टियों में सीतामढ़ी गया हुआ था. 22 मई के दिन गाड़ी से मुजफ्फरपुर आ रहा था. रात में राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी. हम डरे हुए थे कि पता नहीं मुजफ्फरपुर पहुँच पायेंगे या नहीं. 1980 में जब उनके छोटे भाई संजय गांधी की मृत्यु दुर्घटना में हुई थी तो भी मेरी स्मृति में यह बात थी कि शहर की सारी दुकानें बंद हो गई थी. 1984 में तो पूरा शहर जैसे ग़मगीन माहौल में 9 दिनों तक टीवी देखता रह गया था. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी. जो शायद जवाहरलाल नेहरु के बाद इस देश की सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री थी. मुझे याद है कि मेरे गाँव में भी कई घरों में चूल्हा नहीं जला था.
लेकिन इसा कुछ नहीं हुआ. शहर मुजफ्फरपुर पहुंचे तो सब कुछ सामान्य था सिवाय इसके कि लोग खड़े होकर आपस में बातें कर रहे थे. लोगों के झुण्ड के झुण्ड सड़कों पर खड़े थे. लेकिन सारी दुकाने खुली हुई थी. मुझे तब भी यह बात अजीब लगी थी कि देश के इतने बड़े नेता की हत्या हुई और शोक जैसा कोई माहौल नहीं था.
जोशी जी कहते थे, राजीव गांधी अभिशप्त थे. उनका भाग्य इतना तेज था कि उसने उनको सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने के लिए पहले रास्ते बनाए. संजय गांधी की हत्या हुई, जो अगर जीवित होते तो राजीव गांधी को राजनीति में आने का झंझट मोल नहीं लेना पड़ता. वे जैसा सामान्य जीवन जीना चाहते थे वैसा जीते रह जाते. लेकिन अगले चार साल में उनकी माँ की हत्या हो गई और उनको प्रधानमंत्री बनना पडा. लेकिन अभिशप्त थे इसलिए उनकी अस्वाभाविक मौत हुई.
इतने दुर्भाग्यशाली थे कि जब उनकी मृत्यु हुई तब तक वे भारतीय राजनीति के लिए एक तरह से अप्रासंगिक हो चुके थे. जबकि देश को जो सुधार आगे लेकर गए वे सब राजीव गांधी ने ही किये थे. सच में देश में इतना दुर्भाग्यशाली कोई प्रधानमंत्री नहीं हुआ कि जिसने जो जो किया उसको उसका उसका जस नहीं मिला!
India’s 95% problems began here.
In 2014, people fell for a fraud and abandoned Manmohan Singh 💔
The India Against Corruption misled the nation.
Never forgive. Never forget.
An old friend messaged me the other day. After the usual catching up, he asked a question many people wonder but don’t always say out loud:
“Why do you still support Congress?”
I paused before replying. Not because I didn’t have an answer, but because I wanted to give him an honest one.
I told him… it’s not about “still.”
It’s about why I do.
I support @INCIndia because I believe in the idea it stands for an India that belongs to everyone, not just a few. An India where differences are respected, not weaponised.
Yes, the party has had its ups and downs. What institution hasn’t? But I don’t judge it only by its moments of weakness, I look at the foundation it helped build. The Constitution, the democratic framework, the space for every voice to exist… these didn’t happen by accident.
And then there’s @RahulGandhi.
I told him, what stands out to me is not perfection, but intent. In a political climate full of loud claims, here is someone willing to listen, to walk among people, to ask questions, even if they’re uncomfortable. That, to me, is strength, not weakness.
I said, I don’t support politics that divides people into “us” and “them.” I support politics that reminds us we are one.
He asked me, “But do you really think it can make a difference today?”
I replied, change has never been instant. But it always begins with people who refuse to give up on the idea of a better, fairer country.
For me, supporting Congress is not blind loyalty. It’s a conscious choice to stand for unity over division, dialogue over noise, and hope over cynicism.
I ended the message by telling him:
“I don’t support Congress because it’s perfect.
I support it because I still believe in the India it stands for.”
कई दोस्तो को हैरान होते देखा कि भारतीय मुसलमान अयातुल्लाह की मौत पर इतना क्यों परेशान हैं? मातम क्यों? सड़कों पर प्रदर्शन करने जितना आक्रोश कैसे? कुछ लोग इतना नाराज़ हैं कि कह रहे हैं यदि ईरान कल भारत पर हमला कर दे तो ये लोग ईरान का साथ दे देंगे!!
अपनी सीमित समझ के हिसाब से मुझे इतना ही कहना है कि थोड़ा धैर्य रखें। आपको समझना चाहिए कि खामनेई सिर्फ ईरान के राष्ट्र प्रमुख नहीं थे, वो मुसलमानों के बहुत बड़े तबके के धर्मगुरू थे। उनका दर्जा वही है जो रोमन कैथलिक में पोप का है और हिंदुओं में शंकराचार्य का, या फिर उन गुरूओं का जिनके फोटो आपके पूजाघरों में रखे हैं। सिख तो गुरू परंपरा का बहुत सम्मान करते हैं, वो आसानी से समझ सकते हैं कि अयातुल्लाह का दरज़ा क्या है।
अब ये समझिए कि ईरान शियाओं की पवित्र भूमि है। वहां आठवें शिया इमाम अली इब्न मूसा अल रज़ा की मजार है। शिया मुसलमानों के लिए मक्का और मदीना के बाद ये तीसरा सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। हर साल करोड़ों तीर्थयात्री यहां आते हैं।
यहीं क़ोम (जहां खामनेई पढ़े) में इमाम रज़ा की बहन फातिमा की मजार है, जो 7वें इमाम मूसा अल काज़िम की बेटी थीं।क़ोम को मशहद (खामनेई का जन्मस्थान) के बाद ईरान का दूसरा सबसे पवित्र शहर माना जाता है। लाखों महिलाएं और पुरुष यहां ज़ियारत के लिए आते हैं।
एक शहर शीराज़ है। इमाम मूसा अल-काज़िम के दो बेटों अहमद और मुहम्मद की मजारों का शहर।ये दक्षिणी ईरान का प्रमुख शिया तीर्थ है।
क़ोम के पास जमकरान मस्जिद बारहवें इमाम से जुड़ी है। इमाम महदी के इंतजार में विश्वास रखने वाले शियाओं के लिए ये बहुत खास है।यहां लोग दुआएं मांगते हैं और चिट्ठियां लिखकर छोड़ते हैं।
देखा जाए तो शिया आबादी के लिए ईरान वैसा है जैसे किसी जापानी या चीनी बौद्ध के लिए भारत-नेपाल या ईसाई के लिए जेरूसलम। दुनिया भर में फैले हिंदुओं के लिए भारत भी वैसी ही ज़मीन है। ऐसे में आप महसूस कीजिए कि यदि आपके लिए धार्मिक रूप से अहम किसी इलाके पर बमबारी हो तो कैसा लगेगा? हिंदुओं की आंखों का आक्रोश देखिए जब सोमनाथ बाबरी की बात होती है, ऑपरेशन ब्लू स्टार को याद करके कितना भी संतुलित सिख एकबारगी अफसोस ज़रूर करता है कि काश वो सब ना होता। फिर कैसे किसी को शिया लोगों का दुख देख हैरानी हो सकती है?? अपने गुरूओं के स्कैंडल सामने आने के बावजूद एक भक्त हृदय कुछ भी देखने मानने को तैयार नहीं होता और आप चाहते हैं कि शिया इसे एक अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ़्लिक्ट में हुई ट्रैजेडी की तरह दूर से देखें। आप देख सकते हैं, उनसे उम्मीद बेमानी है।बहुत लोग जानते हैं कि खामनेई धार्मिक गुरू होने के साथ शासक थे, जिनके काल में मानवाधिकारों से लेकर महिला अधिकारों तक का हनन हुआ। रिपोर्ट्स सार्वजनिक हैं मगर किसी शिया या मुसलमान को आप ये बात भले किसी शांति काल में समझा लें, आज नहीं समझा सकेंगे।ये मौका ही नहीं।अमेरिका और इज़रायल के युद्धोन्माद में मारे गए खामनेई आपके नायक बेशक ना हों मगर मुसलमानों के तो हैं। अपने नायक की मौत पर दुखी होना स्वाभाविक है, जैसे कुछ लोगों का जश्न मनाना जिनका दावा है कि उन्होंने ईरानी सरकार के दमन से पीड़ित हो ईरान छोड़ा।
अब दूसरा सबसे अहम बिंदु। यदि ईरान कल भारत पर हमला कर दे तो क्या खामनेई की हत्या पर शोक मनाने वाले ईरान का साथ देंगे?? इसका जवाब देना दरअसल करोड़ों हिंदुस्तानी मुसलमानों का अपमान करना होगा। फिर भी कुछ उत्साही लोगों ने इसे उछाला है तो जवाब दिया जाना चाहिए। जवाब “नहीं” है।
पाकिस्तान के किसी हिंदू को देखिएगा। बहुत वीडियो पड़े हैं जहां वो भारत को दुश्मन बता रहे हैं और अपने पाकिस्तानी भाइयों के साथ मिलकर लड़ने को तैयार हैं। नेपाल में बहुत हिंदू हैं। क्या आपने हाल में वहां से आए भारत विरोधी बयान नहीं सुने? बांग्लादेशी हिंदू आज परेशान हैं लेकिन यदि अब तक बांग्लादेश में टिके हैं तो साफ है धार्मिक तौर पर वो भले भारत से प्रेम करें लेकिन वफादारी अपने मुल्क के साथ है।इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी है जिसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सोशल मीडिया पर खूब पढ़ा, हिंदुस्तानी मुसलमान तिरंगा बुलंद कर रहे थे।यहां जासूसी करते कई लोग ज़रूर पकड़े गए मगर नाम तो हिंदुओं के भी आए हैं।वहां किसी ने धर्म के बारे में नहीं सोचा, पैसे के बारे में सोचा होगा।आपको लगता है खामनेई समेत ढेरों ईरानी लीडर्स की सटीक लोकेशन सिर्फ मोसाद ने अपने बूते पाई होगी?क्या कुछ गद्दार ईरान में नहीं होंगे?समझदारी इसमें है कि भारत में रहनेवाली बड़ी मुस्लिम आबादी के दुख दर्द को बारीकी से समझें, ना कि हर छोटी बड़ी बात पर उनकी देशभक्ति का टेस्ट लेने लगें, जबकि ना तो आपका अब तक लिया गया.. ना आपने पास किया।आप कैसे डिफॉल्ट देशभक्त हो गए?केवल इसलिए कि आप मुसलमान नहीं हैं?
An incredible movement serving humanity over 140 years, truly Indian in its ideology, strengths and weaknesses.
@INCIndia-true representative of Indian Society & It's good that it remained at center stage in testing times & hope it will continue fighting
#CongressFoundationDay
"Aren't we secular?"
Indira Gandhi wrote , simply rejecting a proposal to exclude all Sikhs from her security staff after Operation Blue Star.
Yes, we had PMs who knew that oath of the constitution is not just a formality.
1934 से गांधी की हत्या का प्रयास कर रहे हत्यारे विभाजन के पहले तक हत्या की पांच कोशिशें कर चुके थे।
1934 से इन गुंडों को पता था कि 1947 में विभाजन होगा , दंगे होंगे इसलिए जिन्ना, सुहरावर्दी या नेहरू की जगह गांधी को मारने की कोशिश में लग गए थे।
मांसाहार के पक्ष में चाहे जितना भी तर्क दे दें, इन तथाकथित आस्थावान हिंदुओं को पवित्र मौकों पर शाकाहारी बनना पड़ता है।
दिल में चाहे जितना गांधी द्वेष भरा हो दुनिया के सामने गांधी को नमन करना ही पड़ता है।