श्रीमान जी अनुरोध करना है कि वर्तमान में चल रहे काँवाडियों द्वारा प्रयोग किये जा रहे हाई वॉल्यूम डी जे साउंड को बैन कराने का कष्ट करें, जिससे कि विद्यालयों में विद्यार्थियों को और हॉस्पिटलों में मरीजों को असुविधा ना हो। ट्रैफिक भी कंट्रोल रहे।
@Dm_Aligarh
Abhinav Maths नही इसका नाम Abhinav Sharma है. इसने अपनी जात दिखा दी. कोचिंग से करोड़ों रुपए कमाकर इसका पेट बड़ा हो गया है.
अभिनव शर्मा ने Reservation Hatao की मांग को जायज ठहराया. दलित समाज की पीड़ा और जातीय भेदभाव पर लिखकर बैलेंस बना रहा है.
इसकी चालाकी पकड़ी गई. इसने अपने लेख में आरक्षण पर हमला करते हुए आरक्षण को गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम बता रहा है.
अभिनव शर्मा चाहता है मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पर रिफार्म किया जाए. OBC क्रीमी लेयर बढ़ाने और SC ST आरक्षण में पहले से लाभ ले चुके लोगों को आरक्षण से वंचित करने की मांग कर रहा है.
अभिनव शर्मा सुन ले ध्यान से, आरक्षण कोई करीबी उन्मूलन कार्यक्रम नही है. जब तक द्रोणाचार्य मानसिकता है यानी जाति वर्ण है आरक्षण रहेगा. पिछड़ा दलित और आदिवासी DM MLA CM CEO भी बन जाएं तो भी वो तुम लोगों की नजर में क्या रहते हैं हमें पता है.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से दलित इतना खुश क्यो है? जबकिं इस समय उनके लिए;
"आत्मचिन्तक करने का समय है कि उनकी सरकारों की नजर में कितनी हैसियत है व देश का यह 18% जनसँख्या वाला वर्ग कितना दवाबकारी है? क्योंकि रोहित वेमुला मामले में जो एससी नही करवा सके, सामान्य वर्गों ने करवा दिया"
धर्मेंद्र प्रधान मोदी सरकार पर पहले से ही शिक्षा मंत्री के तौर पर बोझ बन गए थे। उन्हें मंत्रालय बदला जाना तय था। कारण? एससी/एसटी की तरह ओबीसी समाज को विश्वविद्यालयो में समता नियमो के तहत प्रोटेक्शन देने वाली यूजीसी गाइडलाइंस को लागू करना व इसके बाद सामान्य वर्गों के गुस्से के केंद्र में धर्मेंद्र प्रधान का आ जाना क्योंकि इस गाइडलाइंस को तुंरन्त केंद्र सरकार द्वारा वापस नही लिया गया बल्कि सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से रोक लगाई गई। उस समय भी गाइडलाइंस पर धर्मेंद्र प्रधान को टारगेट किया जा रहा था। इस विवाद के कारण धर्मेंद्र प्रधान की छवि पहले ही नेगेटिव थी।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफे की सबसे बड़ी जीत सामान्य वर्ग द्वारा बनाये गए ईको सिस्टम की है क्योंकि उन्होंने जब UGC गाइडलाइंस पर सड़को पर पूरे देश मे उत्पात किया, तब भी केवल गाइडलाइंस वापस ली गयी लेकिन नरेंद्र मोदी की प्रोटेक्शन धर्मेंद्र प्रधान को मिली क्योंकि उड़ीसा में भाजपा को स्थापित करना था। तब से लेकर आज तक सामान्य वर्गों के संगठनों के टारगेट पर धर्मेंद्र प्रधान व नरेंद्र मोदी आ गए। लेकिन सामान्य वर्ग जो कि देश मे केवल 10% से 15% है, उनके बस की बात नही थी कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दिलवाया जा सके।
कॉकरोच मूवमेंट इसलिए सफल रहा क्योंकि इसे सामान्य वर्गों के संगठनों व व्यक्तिओ का समर्थन मिला। उन्होंने डायरेक्ट नही तो रास्ते आसान किये। जैसा हर भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन में सामान्य वर्ग प्रोटेक्शन देते है, इस मामले में गायब रहे, बल्कि प्रोटेस्ट मे शामिल थे।
अब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद;
"UGC गाइडलाइंस कभी लागू नही होगी"
प्रश्न : इससे नुकसान किसे हुआ?
उत्तर : ओबीसी वर्गों को
प्रश्न : लाभ किसे हुआ?
उत्तर : सामान्य वर्गों को।
अनुसुचित जाति/जनजाति के लिए
**************************
रोहित वेमुला केस इस वर्तमान के केस से बड़ा केस हो गया था। उसमे दो मंत्रियो स्मृति ईरानी व बंगारू दत्ततेय का इस्तीफा 100% होना चाहिए था क्योंकि जँहा पेपर लीक में डायरेक्ट धर्मेंद्र प्रधान की गलती नही थी लेकिन एक कंट्रोलक के तौर पर जवाबदेही थी, वंही रोहित वेमुला केस में;
"बंगारू दत्तात्रेय ने स्मृति ईरानी को एससी छात्रो के खिलाफ पत्र लिखा, स्मृति ईरानी ने उपकुलपति को पत्र के साथ साथ Action taken report तक माँगी। जो इतनी ज्यादा दवाबकारी थी कि एससी छात्रो को सीधा प्रत्यक्ष शोषण हुआ.
इस मामले को बहनजी ने संसद में उठाकर चलने नही दी। दलित मुद्दों पर आजादी के बाद केवल बहन कुमारी मायावती में ही इतना दम था कि संसद चलने नही दी। एक नही बल्कि यह तीसरा मुद्द्या था जब बहनजी ने संसद चलने नही दी। न तो पहले और न बाद में किसी दलित की इतनी हैसियत नही हुई कि संसद में दलित मुद्दों पर तब तक चलने न दे, जबतक की उन्हें चर्चा का मौका न दे।।
लेकिन क्या?
स्मृति ईरानी का इस्तीफा हुआ?
बंगारू दत्तात्रेय का इस्तीफा हुआ?
उसे छोड़िए। हैदराबाद विश्वविद्यालय के उपकुलपति जो एट्रोसिटी में सीधा सीधा जेल जाना चाहिए था, उसे विशेष पुरष्कार आगे जाकर मिला।
यह चैलेंज किसे था? अनुसुचित जाति व जनजाति को।
नरेंद्र मोदी ही नही बल्कि किसी भी सरकार में एससी/एसटी की हैसियत शून्य है। होती तो स्मृति ईरानी व बंगारू का इस्तीफा होता व उपकुलपति जेल में होता। नरेंद्र मोदी सरकार ने ठेंगा दिखा दिया।
निष्कर्ष
*****
अनुसुचित जाति सभी के लिए Available है। उंसके लिए कोई उपलब्ध नही है।।वो पड़ोसी की जीत की खुशी में खुशियां बनाता है। उंसकी जीत ही नही होती क्योंकि पड़ोसी उसका साथ नही देता है।। उनमे बुद्धिजीवी व्यक्तिओ की कमी है। जो बुद्धिजीवी है, जैसे बहन कुमारी मायावती, उनकी अपने नौशिखियापन व अपरिपक्वता के कारण सुनते नही है। जिस समाज मे बुद्धिजीवी व्यक्तिओ की कमी होती है व जो थोड़े बहुत होते है, जब उसकी सुनते नही तो वो हमेशा मन्दिर के घण्टे जैसा रहेगा, जिसे कोई भी सुविधानुसार बजाकर जाएगा।
खैर;
"सामान्य वर्गों को पुनः उनकी जीत की बधाई"
विकास कुमार जाटव
@vkjatav84 यहाँ ध्यान देने कि बात यह है कि धनिया पत्ती को ये बात मालूम नहीं है कि उसकी कीमत क्या है, उसकी कीमत कोई बाहर का व्यक्ति ही तय कर रहा है..
इसी प्रकार.....
प्रश्न: ठाकुर का कुआँ खोद देते थे लेकिन ख़ुद का क्यो नहीं खोद पाए?
जवाब: इसको जानने के लिए 1668 CA में फ्रांस के डॉ बर्नियर का आँखो देखा हाल पर नजर डाले।
बर्नियर के अनुसार भारत में कारीगरों को उनके काम का उचित पुरस्कार नहीं मिलता था। यहाँ तक कि धनी लोग चीजें सस्ते मूल्य पर लेना चाहते थे। जब किसी अमीर को कारीगर की आवश्यकता होती, तो वह उसे बाजार से पकड़वा मंगाता, उससे जबरन काम करवाता और काम पूरा होने पर उसकी योग्यता के अनुसार नहीं बल्कि अपनी इच्छा से थोड़ी-बहुत मजदूरी देकर विदा कर देता। कारीगर को यह मार और अपमान सहना पड़ता था, क्योंकि विरोध करने पर कोड़ों और दमन का डर था।
बर्नियर साफ़ लिखते हैं कि यहाँ के कारीगर यूरोप की बनी चीज़ों की अच्छी नकल कर लेते थे। शिकारी और बंदूकें सुंदर बनती थीं, सोने के गहने उत्कृष्ट होते थे, और कई कलाएँ इतनी उन्नत थीं कि कोई यूरोपियन सुनार भी उनका मुकाबला नहीं कर सकता था। यानी समस्या कारीगर की योग्यता में नहीं थी। समस्या उस समाज में थी जहाँ कारीगर को इंसान नहीं, “मजदूरी कराने की वस्तु” समझा जाता था।
यह दृश्य केवल आर्थिक शोषण नहीं था, यह सामाजिक अन्याय था। जो लोग श्रम करते थे, जो समाज को सुंदर वस्तुएँ देते थे, जो हथियार, कपड़े, गहने, मकान और उपयोगी सामान बनाते थे—उन्हीं को सबसे कम सम्मान मिलता था। दूसरी ओर जो उच्च वर्ग स्वयं उत्पादन नहीं करता था, वही धन, प्रतिष्ठा और सत्ता पर बैठा था। यही भारतीय समाज की सबसे बड़ी विडंबना थी।
बर्नियर आगे बताते हैं कि इस व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि कारीगरों में उत्साह खत्म होता गया। जब किसी कलाकार को यह पता हो कि उसकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिलेगा, उसका सम्मान नहीं होगा, उसे जबरन काम करना पड़ेगा और पैसे मांगने पर अपमान मिलेगा, तो वह नई चीज़ बनाने का साहस क्यों करेगा? यही कारण था कि भारत में अच्छी चीज़ें बनने की संभावना होते हुए भी शिक्षा और प्रोत्साहन के अभाव में शिल्प-कला व्यापक रूप से विकसित नहीं हो सकी।
यहाँ भारतीय उच्च वर्ग की कड़ी आलोचना ज़रूरी है। उच्च वर्ग ने कारीगरों की कला का उपभोग तो किया, लेकिन उनके जीवन की रक्षा नहीं की। उन्होंने महलों, गहनों, हथियारों और विलासिता की वस्तुओं का आनंद लिया, लेकिन उन्हें बनाने वाले हाथों को सम्मान नहीं दिया। यह वही मानसिकता थी जिसमें श्रम को नीचा और आराम को ऊँचा माना गया। उत्पादन करने वाला “निम्न” बना दिया गया और उपभोग करने वाला “श्रेष्ठ” कहलाया।
बर्नियर के विवरण से यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में शिक्षा का भयंकर अभाव था। यदि कारीगरों को व्यवस्थित शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और सामाजिक सम्मान मिलता, तो भारत की कारीगरी दुनिया में और ऊँचे स्तर पर पहुँच सकती थी। लेकिन उच्च वर्ग की जातिवादी और सामंती मानसिकता ने ज्ञान और कला को सीमित कर दिया। कारीगरों को आगे बढ़ाने के बजाय उन्हें दबाकर रखा गया।
बर्नियर एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि बादशाह और बड़े अमीरों के यहाँ अनेक कारीगर काम करते थे। वे अपने घरों या बादशाही कारखानों में बैठकर काम बनाते थे और अपने शिष्यों तथा लड़कों को सिखाते भी थे। इसका मतलब यह है कि दरबारी संरक्षण ने कुछ हद तक कला को बचाए रखा। मुग़ल दरबारों और अमीरों की संरक्षण-व्यवस्था के कारण कई कारीगरों को नियमित काम, साधन और प्रशिक्षण का अवसर मिला। इसलिए कहा जा सकता है कि जहाँ भारतीय सामाजिक उच्च वर्ग आम तौर पर कारीगरों का शोषण कर रहा था, वहीं बादशाही कारखानों और दरबारी संरक्षण ने कई कलाओं को पूरी तरह मिटने से बचाया।
लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि केवल दरबारी संरक्षण पर्याप्त नहीं था। असली न्याय तब होता जब कारीगर स्वतंत्र नागरिक की तरह सम्मान पाते, अपनी मजदूरी खुद तय कर पाते, शिक्षा प्राप्त करते और उनके बच्चों को भी आगे बढ़ने का अवसर मिलता। बर्नियर की आलोचना इसी बात की ओर इशारा करती है कि भारत की शिल्प-कला इसलिए पिछड़ी नहीं कि यहाँ प्रतिभा नहीं थी, बल्कि इसलिए पिछड़ी क्योंकि प्रतिभा को दबाने वाली सामाजिक व्यवस्था मौजूद थी।
इस पूरी चर्चा का निष्कर्ष साफ़ है: भारत के कारीगर महान थे, लेकिन उन्हें कुचलने वाली व्यवस्था उससे भी अधिक क्रूर थी। उच्च वर्ग ने श्रम का सम्मान नहीं किया, बेगारी कराई, उचित मेहनताना नहीं दिया और दमन के सहारे कलाकारों को चुप रखा। यदि भारत के श्रमिकों और कारीगरों को सम्मान, शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता मिलती, तो भारत की कला और उद्योग दुनिया में बहुत आगे होते।
अब आप समझ चुके होंगे किठाकुर का कुआँ क्यो ख़ुद जाता था लेकिन बहुजनों का नहीं।
जनजातीय अस्मिता और मातृभूमि के लिए संथाल क्रांति में अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले सभी बलिदानियों को 'हूल दिवस' के अवसर पर स्मरण कर शत शत नमन।
जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक सिदो-कान्हू, चाँद और भैरव मुर्मू सहित सभी वीर क्रांतिकारियों को विनम्र श्रद्धांजलि।
#SanthalKranti #Santhal #हूल_दिवस
समाज सेवा और सामाजिक परिवर्तन:
यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है जिसे समझना चाहिए। चिकित्सा नैतिकता (Remedial Morality) कहती है, रोकथाम इलाज से बेहतर है। बीमारी का इलाज करने के बजाय उसकी रोकथाम पर अधिक ध्यान दें। फ्रैक्चर को ठीक करना समाज सेवा है, फ्रैक्चर न हो इसके लिए माहौल बनाना सामाजिक परिवर्तन है। कुपोषित आदिवासी बच्चों को विटामिन की गोलियां देना समाज सेवा है, उनके माता-पिता को रोजगार देना ताकि वे अपने बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन खरीद सकें, सामाजिक परिवर्तन है। भिखारी को दान देना समाज सेवा है, ऐसा सामाजिक माहौल बनाना ताकि किसी को भीख न मांगनी पड़े, सामाजिक परिवर्तन है। जब बाजार मूल्य 7 रुपये प्रति किलो है, तब दो रुपये प्रति किलो चावल देना समाज सेवा है, व्यक्ति की आय बढ़ाना ताकि वह बाजार मूल्य पर चावल खरीद सके, सामाजिक परिवर्तन है। भूखे को खाना खिलाना समाज सेवा है, ऐसी स्थिति बनाना जहां कोई भूखा न रहे, सामाजिक परिवर्तन है। अनपढ़ को पढ़ाना समाज सेवा है, उस सामाजिक ढांचे को नष्ट करना जिसने उसे अनपढ़ बनाया है, सामाजिक परिवर्तन है।
"झोपड़पट्टी" की एक अनपढ़ गरीब बस्ती के आस-पास एक नया स्कूल खोलना समाज सेवा हो सकती है, गरीब भूखे और अनपढ़ आदमी को अपने बच्चे को खाली पेट भी पाँच किलोमीटर दूर चलकर स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करना सामाजिक परिवर्तन है। एक कमज़ोर व्यक्ति को हथियार देकर उसकी रक्षा करना समाज सेवा है, उसे इतना मज़बूत बनाना कि वह अपने हथियार खुद बना सके और उनका इस्तेमाल कर सके, सामाजिक परिवर्तन है। एक स्कूली बच्चे को समतावादी प्रार्थना सिखाना समाज सेवा हो सकती है, इंसानों के बीच असमानता फैलाने वाले शास्त्रों को बारूद से उड़ा देना सामाजिक परिवर्तन है।
#SocialJustice #SocialTransformation
#equaljusticeforall #Equality #EducationForAll #Kanshiram
"देवताओं, मंदिरों और ऋषियों का यह देश!
इसलिए क्या यहाँ सब कुछ अमर है?
वर्ण अमर, जाति अमर, अस्पृश्यता अमर!... युग के बाद युग आए! बड़े-बड़े चक्रवर्ती आए ! दार्शनिक आए! फिर भी अस्पृश्यता, विषमता अमर है !
यह सब कैसे हो गया? किसी भी महाकवि, पंडित, दार्शनिक, सत्ताधारी सन्त की आँखों में यह अमानुषिक व्यवस्था चुभी क्यों नहीं ?
बुद्धिजीवियों, संतों और सामर्थ्यवानों का यह अंधापन, यह संवेदन शून्यता दुनियाभर में खोजने पर भी नहीं मिलेगी! इससे एक ही अर्थ निकलता है कि यह व्यवस्था बुद्धिजीवियों, संतों और राज करने वालों को मंजूर थी! यानी इस व्यवस्था को बनाने और उसे बनाये रखने में बुद्धिजीवियों और शासकों का हाथ है।"
-बाबुराव बागुल
जानेमाने मराठी लेखक
#समरसता #समता #समानता #न्याय #जाति_उन्मूलन #CasteDiscrimination
#SocialJustice #SocialTransformation
#Ambedkar #Equality #equaljusticeforall
लखनऊ कोचिंग संस्थान में लगी भीषण आग की घटना अत्यंत दुखद है।
जान गँवाने वाले मासूम छात्रों को हमारी श्रद्धांजलि।
शोक संतप्त परिवारों के प्रति गहरी संवेदनाएँ। प्रकृति दिवंगत आत्माओं को शांति और घायलों को शीघ्र स्वास्थ्य प्रदान करें। 🙏