@nishikant_dubey जी अगर इतनी ही मर्यादा और मर्दानगी है तो एक फिर वही झूठी,ओछी एवं ट्रोलरों वाली हरकतें करके देख लो जो आपने नोटिस आने से पहले किया था;आपको आपकी मर्दानगी पता चल जायेगी😆; और दूसरी बात @yadavakhilesh जैसे कद्दावर नेता किसी ओछी हरकतों वाले व्यक्ति के मुँह क्युं लगें..
वकील पाल है कि अखिलेश यादव जी । समाजवादी पार्टी को फिर मेरी सलाह है कि चाटुकारिता वाले को समझाइए । पहले तो नोटिस अखिलेश जी को देना था मानहानि का,बदले में पाल ने दिया । मैंने पूछा पाल आप कौन हो तो पाल ने दूसरे वकील से नोटिस भेजा । अब नया कहानी,मैंने अखिलेश यादवजी से कोई माफ़ी नहीं माँगी है । मैं गंगा किनारे का आदमी हूँ,मर्दानगी और मर्यादा में लड़ता हूँ । समाजवादी विचारधारा अफ़वाहों के लिए बनी है
कुणाल कामरा के शो में अनुराग कश्यप से पूछा गया कि आपने जनहित के मुद्दों पर बोलना क्यों बंद कर दिया❓
इस पर अनुराग जो कह रहे हैं वो सभी को सुनने और समझने की जरूरत है।
"मेरे बोलने पर जब तक लोग मुझे टारगेट कर रहे थे मुझे कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन फिर उन लोगों ने मेरे परिवार को टारगेट करना शुरू कर दिया और परिवार में भी जब मेरी बेटी को टारगेट करना शुरू किया तब मुझे लगा कि अब रुक जाना चाहिए और मुझे ये भी लगा कि मेरे बोलने से हो तो कुछ रहा नहीं उल्टा मेरे आसपास के लोगों को परेशानी हो रही है मेरे काम पर बहुत असर पड़ रहा था और मेरी हेल्थ बहुत खराब हो गई थी तब मैंने बोलना छोड़ दिया। तब से दो साल हो गए अब मैं मजे में हूं बढ़िया घूम फिर रहा हूं और काम कर रहा हूं"
इस तरह से अनुराग कश्यप को चुप करवा दिया गया...
आपको याद होगा कि NRC वाले मुद्दे पर कई सेलिब्रेटी बोल रहे थे जो अब नहीं बोलते
ऐसे ही JNU में हुई मारपीट के मुद्दे पर भी विशाल भारद्वाज जावेद जाफरी जैसे कलाकर खुलकर बोलते थे और सड़क पर भी उतरते थे। वो भी अब अपने काम में व्यस्त हो गए अब नहीं बोलते।
इससे पहले आमिर खान और शाहरुख भी बोलते थे उन्हें भी चुप करवा दिया गया। मतलब धीरे-धीरे सबने बोलना बंद कर दिया।
अब आपको सोचने और समझने की जरूरत है कि अनुराग कश्यप समेत इन सभी कलाकारों ने बोलना बंद क्यों कर दिया और इनके चुप होने से किसका फायदा हुआ है❓
बोलना इसलिए बंद कर दिया क्योंकि जनता के एक बड़े हिस्से को अपने मुद्दों से ज्यादा एक पार्टी से ज्यादा मुहब्बत थी तो इन लोगों ने सोचा हम ही क्यों बोलकर अपना वक्त बर्बाद करें और पैसों का नुकसान करें जब जनता को ही जरूरत नहीं है।
तो इनके चुप रहने से बड़ा फायदा तो इन सेलिब्रेटियों को ही हुआ क्योंकि इनके बोलने पर नुकसान हो रहा था IT सेल से गालियां मिल रही थीं और चुप रहने पर फायदा हो रहा है मस्त काम कर रहे हैं घूम-फिर रहे हैं।
दूसरा सबसे बड़ा फायदा सिस्टम और सत्ता को हुआ कि अब जनहित के किसी मुद्दे पर आवाज इतनी जल्दी नहीं उठती और वो आवाज उतनी मजबूत भी नहीं होती।
बाकि नुकसान तो जनता का बहुत हुआ है अब जनता अकेली हो गई है मीडिया सत्ता की तरफ है नतीजन अब उसकी परेशानी कोई सुनने वाला नहीं है इसलिए जब उसे अस्पताल स्कूल स्टेशन या कहीं भी सिस्टम से परेशानी होती है तो उसे खुद ही वीडियो बनाकर आवाज उठानी पड़ती है और वो आवाज भी हिंदू-मुस्लिम के शोर में खो जाती है....और ये नुकसान समय के साथ बढ़ता जाएगा...हो सकता है कि एक दिन एहसास भी हो कि जो आपके लिए आवाज उठाता है उसे गालियां नहीं दी जाती उसका संरक्षण किया जाता है, अपने लिए।
#KunalKamra
#AnuragKashyap
सोनू शर्मा – आप ( अवध ओझा ) पंडित नेहरू जी कैसे देखते हो...?
क्यूंकि पिछले 10 साल से जितनी ट्रोलिंग पंडित नेहरू की हुई मरने के बाद उतनी किसी की नहीं हुई...?
अवध ओझा – उस व्यक्ति की 2 किताबें कोई व्यक्ति पढ़ ले डिस्कवरी ऑफ इंडिया और ग्रिलम्स ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री
ये दोनों किताबें कोई पढ़ ले तो आदमी अंदर इनसाइट पैदा हो जाएगी हिस्ट्री को लेकर....!
उन्होंने एक किताब और लिखी जब नेहरू जी अंदर थे इंदिरा को लिखी "पिता के पत्र पुत्री के नाम"
उस वक्त देश में मार काट मची थी दो दो सुपर पावर सामने खड़े थे, फिर एक व्यक्ति अंधेरे में बैठता और पंचशील योजना की नींव रखता हैं.....!
"फांसी सत्याग्रह" कर रहे ये आदिवासी हमारे लोकतंत्र का वह सच हैं, जो अक्सर टीवी स्टूडियो की बहसों में जगह नहीं पाता।
जब कैमरे सत्ता के पीछे चलने लगें, तब ज़मीन पर बैठे लोगों की आवाज़ सुनना और दिखाना और भी ज़रूरी हो जाता है।
यह रिपोर्ट ज़रूर देखिए।
देश की राजनीति बदलने वाली है।बंगाल चुनाव से पहले सरकार संविधान संशोधन विधेयक हार गई थी।केजरीवाल,ममता और ठाकरे के सांसद तोड़े गए।परिसीमन की तैयारी हो चुकी है।संख्या बल भी पूरा है।फिर आएगा संविधान संशोधन विधेयक और लोकसभा की सीटें बढ़ जाएगी।विपक्ष के सामने एक और चुनौती आने वाली है !
गंगा नदी को बचाने के लिए एक पर्यावरणविद और IIT प्रोफेसर जी.डी अग्रवाल जी ने 111 दिनों तक आमरण अनशन किया था। वो कहते रह गए कि मुझे मालूम है हम कैसे गंगा को बचा सकते हैं, लेकिन उन्हें सुना ही नहीं गया। 2018 में एम्स ऋषिकेश में उनका निधन हो गया। 17 दिन से एक और व्यक्ति अनशन पर बैठा है, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ रहा।
भगत सिंह बनेंगे तब भी अनसुने किए जाएँगे, गांधी बनेंगे तब भी। मूक बने रहिए!
वरिष्ठ पत्रकार शीतल प्रसाद सिंह और अभय दुबे जी की जब मैंने बातचीत सुनी तो मेरे खुद होश उड़ गए।
ये सब टिन्नू यादव, टिन्नू यादव करने वाले लोग क्यों उस एक नाम की रट लगाए बैठे थे अब सारी चीजें समझ आ रही हैं।
समझ तो पहले ही गए थे सभी लोग की इसमें बड़ी मछलियां, छोटी मछलियों की बलि दे रही हैं उन्हें ही बकरा बना रहीं।
आधिकारिक तौर पर शीतल प्रसाद सिंह जी ने पूरा काला चिट्ठा खोल कर रख दिया।
सवाल ये नहीं कि पत्रकार महोदया मंत्री जी से अचानक सवाल पूछने लगी, या अचानक रातों-रात रीढ़ की हड्डी उग गई, अचानक जन-सरोकार जाग गया। सवाल है कि उनके टीवी चैनल को ये आदेश कहां से मिला कि गडकरी जी से सवाल पूछे जायें । कुछ तो गड़बड़ है, दया !
सोनम वांगचुक के अनशन का 18वां दिन है. लोगों की अपील के बाद भी अनशन खत्म नहीं कर रहे. सेहत गिर रही है. शायद,एक-दो दिन में सरकार से कुछ 'पहल' होने की आशा है. एक इंटरव्यू में उन्होंने साथ न देने वाले विपक्षियों के 'छोटापन' को कोसा भी है. देखिये, अब 'पर्वत' कुछ पिघलता है कि नहीं!
क्या हिंदी फिल्मों का काम अब सिर्फ सरकार का प्रचार करना रह गया है?
@tweets_prateekg की विशेष इन्वेस्टिगेटिव सीरीज़ का पहला भाग आ चुका है. वे खोल रहे हैं उन कड़ियों का राज़, जिसने सिनेमा की आज़ाद सोच को सत्ता के नैरेटिव से मिला दिया.
पढ़िए रिपोर्ट : https://t.co/WmsVegF2LA
प्रोफेसर जीडी अग्रवाल!
IIT रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पर्यावरण में Ph.D. और आईआईटी कानपुर के HOD रहे!
चाहते तो विदेश में ऐश की जिंदगी जी सकते थे लेकिन उन्होंने इस देश के कृतघ्न लोगों के लिए लड़ना चुना।
न जाने क्यों उनका दिमाग फिरा कि इस देश को बचा लें तो वह गंगा को बचाने के लिए अनशन पर बैठ गए।
लेकिन हमें गंगा थोड़े ही बचानी थी, हमें तो गंगा के नाम पर चल रहे धंधे को बचाना था! नतीजा? 111 दिन के अनशन के बाद उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
इस महान विचारक की शहादत इस देश के दलाल मीडिया, उन्मादी लोगों और खोखले राष्ट्रवाद के शोर में बस एक छोटी सी खबर बनकर दब गई।
मुख्यधारा का मीडिया धार्मिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक नूराकुश्ती बेचने में व्यस्त रहा और इस व्यवस्था ने उन्हें चुपचाप निगल लिया।
हम सब मरेंगे क्योंकि हमने कभी सही लोगों को नहीं पहचाना। हम बस दलालों को सिर आंखों पर बिठाते रहे और देश को बचाने निकला एक सच्चा इंसान घुट-घुट कर चला गया।
सड़के सूनी नहीं हैं।🔥
कांग्रेस नेता अशोक चांदना के नेतृत्व में बूंदी में
स्मार्ट मीटर के खिलाफ 'किसान हुंकार' जनांदोलन
जितना रीट्वीट करे उतना कम हैं, ठोको RT 😎
क्या आप जानते हैं कि राजस्थान की भजनलाल सरकार ने सिर्फ दो सालों में सरकारी विज्ञापनों पर 217 करोड़ रूपए खर्च कर दिए?
इसका सीधा मतलब है कि जनता की कमाई से हर दिन करीब 30 लाख सिर्फ प्रचार-प्रसार पर खर्च हुए!
देखिए @Basantrajsonu की रिपोर्ट.
स्कूलों की किताबों में राघव चड्ढा पर एक अध्याय जोड़ा जाना चाहिए,
ताकि यह बच्चों को दिखाया जा सके कि राजनेता विपक्ष में और सत्ता में रहते हुए कैसा व्यवहार करते हैं।
ये वही आदमी है जो गिगवर्कर तक के मुद्दे उठता था लेकिन अब ये सोनम वांगचुक के मुद्दे पर चुप हैं।
अंजना ओम कश्यप को ना तो पत्रकारिता की समझ है।
ना पत्रकारिता की परिभाषा पता है।
ना ही उन्हें भारत की राजनीति की समझ है।
सजधजकर, मेकअप लगाकर, teleprompter से खबर पढ़ना पत्रकारिता नहीं। - @rajkumarbhatisp | @Editor_SanjayS
पत्रकार मानक गुप्ता - स्वामी जी आप पहले कोई भी मुद्दा उठा लेते थे जैसे ब्लैक मनी का मुद्दा आपने उठा लिया था।
स्वामी रामदेव - जो मंदिरों में चढ़ावा आता है उसका होता क्या है बताओ न जरा आप सोंच रहे हो कि मैं ही सारे मुद्दे उठाऊं
🔹राम मंदिर चंदा चोरी का मुद्दा मैं ही उठाऊं..
🔹पेट्रोल का मुद्दा मैं ही उठाऊं..
🔹गैस का मुद्दा मैं ही उठाऊं..
🔹महगाई का मुद्दा मैं ही उठाऊं..
🔹बेरोजगारी का मुद्दा मैं ही उठाऊं..
🔹NEET पेपर लीक का मुद्दा मैं ही उठाऊं..
अब सारे मुद्दे मैं ही करूंगा तो जो आंदोलन जीवी लोग हैं, विपक्ष के लोग हैं वो क्या बेरोजगार जाएंगे।
जो भी हो स्वामी रामदेव न चाहते हुए भी सारे मुद्दों को उठा दिया। वो सब जानते हैं देश के असली मुद्दे क्या हैं।