@KreatelyMedia Audit just match bills and payments. No conflict of interest. If you buy Rs 100 item at Rs 1000 from your relatives or friends and have bill then auditor say everything is good.
कल बिहार सरकार ने कई उद्यमियों के साथ राज्य में निवेश बढ़ाने के लिए एमओयू किये. इन समझौतों में वैसे तो ज्यादातर स्टील कंपनियां हैं. मगर सबसे बड़ा करार जो है वह राज्य में परमाणु बिजली घर लगाने को लेकर है. 22,500 करोड़ का.
हैदराबाद की एक कंपनी जिसका नाम ग्लोबल रिन्यूएबल एडवांस क्लीन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड है. इस कंपनी का कभी नाम नहीं सुना था, तो सहज ही यह जानने की इच्छा हुई कि यह कौन सी कंपनी है, जो बिहार में 22,500 करोड़ का निवेश परमाणु बिजली घर के लिए करने को तैयार है. सर्च किया तो पता चला कि हैदराबाद की इस कंपनी की स्थापना 25 फरवरी, 2026 में हुई है और इसे परमाणु बिजली घर क्या किसी भी तरह के उद्यम लगाने का अब तक अनुभव नहीं है. इसकी आधिकारिक पूंजी सिर्फ दस लाख की है. हैरत की बात है कि महज पांच महीने पहले बनी, दस लाख की पूंजी वाली कंपनी ने बिहार सरकार के साथ 22,500 करोड़ निवेश का समझौता किया है. वह भी परमाणु बिजली घर लगाने का, जिसके लिए काफी अनुभव की जरूरत होती है. उम्मीद है कि बिहार सरकार के उद्योग विभाग ने इस बारे में पड़ताल कर ली होगी.
लेकिन एक पत्रकार, बिहार के एक नागरिक के तौर पर मेरी यह आशंका है कि क्या सचमुच ऐसी कंपनी को बिहार में परमाणु बिजली घर लगाने दिया जाना चाहिए. एक तो बिहार में कहीं भी परमाणु बिजली घर लगाने जैसे प्रयोग से बचना चाहिए क्योंकि यह काफी खतरनाक होते हैं. अगर कोई हादसा हुआ तो आसपास की बड़ी आबादी तबाह होती है और विकिरण का खतरा तो रहता ही है. हमें चेरनोबुल और फुकुशिमा के परमाणु हादसों को याद रखना चाहिए.
मगर पिछले कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है कि राज्य सरकार नवादा के रजौली और बांका में परमाणु बिजली घर लगाने का मन बना चुकी है. वह शायद ही इस फैसले पर पुनर्विचार करे. ऐसे में हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि यह काम किसी अनुभवी कंपनी को मिले. ताकि हादसे और गड़बड़ी की संभावना कम से कम हो. मगर पांच महीने पुरानी कंपनी?
देश में परमाणु बिजली घर लगाने का अनुभव ज्यादातर सरकारी कंपनियों के पास है. इसमें एनपीसीआईएल, भेल और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड प्रमुख हैं. इसके अलावा रोस्टोम, फ्रामाटोम, डब्लूईसी, जीई-हिटाची जैसी विदेशी कंपनियां हैं, जो इस काम के लिए अनुभवी मानी जाती हैं.
ऐसी किसी अनुभवी कंपनी से इसलिए करार करना चाहिए, क्योंकि उनके पास पेशेवरों की बेहतरीन टीम होती है, जो किसी भी संभावित संकट को पहले से भांप सकती है. उसे परमाणु संबंधित अंतर्राष्ट्रीय करार का अनुभव होता है. उसे रेडियेशन मॉनिटरिंग और इमरजेंसी रेस्पांस की जानकारी और अनुभव होता है.
क्या महज दस लाख की पूंजी वाली और पांच महीने के अनुभव वाली कंपनी यह सब कर पायेगी? क्या सरकार को परमाणु बिजली घर जैसे संवेदनशील उद्यम की स्थापना के लिए एमओयू करना चाहिए या इसके लिए दूसरी व्यवस्था अपनानी चाहिए? और क्या सरकार इस कंपनी को आगे कर आने वाले दिनों में किसी बड़ी कंपनी की बैकडोर एंट्री की योजना बना रही है? यह सब गंभीर सवाल हैं? मगर फिलहाल तो यह कहा जा सकता है कि यह समझौता संदेहास्पद लग रहा है.
Similarly GST is charged on merchants not consumers.
TDS is paid by Employers not Employees.
@nsitharaman, country is blessed to have a genius like you as Finance Minister.
Everyone knows China is the world leader on green technologies.
But not everyone is aware China is also the lead tree planter and the source of best practice for greening of deserts.
@devops_nk The govt is leech or parasite, they thrive on others hard earned money. They don't care the money is for luxury, living or survival. They just need their cut and doesn't bother about you.
500 में से 11 अंक वाला शिक्षक, आपके बच्चों को पढ़ा रहा है;
800 में से 1 अंक लाने वाला डॉक्टर, अपनी प्रैक्टिस शुरू कर चुका है;
लेकिन आरक्षण पर बात नहीं होनी चाहिए!
टैक्स कौन सा वर्ग सबसे अधिक दे रहा है? देखें इस वीडियो में...
Dear Indian Infra bros,
These are tiny roads in West Cork in Ireland which gets 1200-2800 mm of rain every year.
They are all asphalt. No concrete roads. And hardly any potholes.
Stop glamorizing Fadnavis & Gadkari who are robbing you blind to enrich their buddies.
- जवाहरलाल नेहरू ने अपने कार्यकाल में 33 सरकारी कंपनियों की स्थापना की थी,
- लाल बहादुर शास्त्री ने अपने छोटे से कार्यकाल में 5 सरकारी कंपनियाँ बनाईं,
- इंदिरा गांधी ने तो सरकारी कंपनियाँ बनाने में अपने पिता को भी पीछे छोड़ दिया, उनके कार्यकाल में कुल 66 सरकारी कंपनियाँ बनाई गईं...
- मोरारजी देसाई ने 9 और राजीव गांधी ने 16 सरकारी कंपनियाँ बनाईं,
- वीपी सिंह ने 2, और पीवी नरसिम्हा राव ने 14 कंपनियाँ बनाईं,
- एच डी देवी गौड़ा और आई के गुजराल ने 3-3 कंपनियाँ बनाईं,
- अटल बिहारी वाजपेयी ने 17 कंपनियाँ बनाईं, लेकिन उन्होंने 7 बड़ी कंपनियों का निजीकरण भी किया...
- मनमोहन सिंह ने अपने 10 साल के कार्यकाल में 23 सरकारी कंपनियाँ बनाईं और 3 को बेचा,
- भारत के इतिहास में नरेंद्र मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने एक भी नई सरकारी कंपनी नहीं बनाई, बल्कि 23 सरकारी कंपनियों को बेचा..
- अब आप तय करें.. कि देश हित और देश को मजबूत करने का काम किसने किया और देश की संपत्तियों को अपने मित्रों को औने-पौने दामों में बेचकर देश को खोखला करने का काम कौन कर रहा है।
@MukeshPathakji आपका आंकलन गलत है, अभी सबसे ज्यादा लोग केंद्रीय नेतृत्व से नाराज़ है। हर कोई सबक सिखाने को तैयार बैठा है, महामानव को झोला उठाना हे पड़ेगा।
The win of prashant Kishor isn't just a single seat win. Everyone including Modi and Shah know how capable he is.
He will now make so much noise in assembly or outside assembly that Modi ji will remember that Bihar kept giving him 30-39 MPs in centre and 20 years in state but Bihar still didn't see any big industry, jobs and Darbhanga AIIMS is still not ready after 11 years of announcement.
And Prashant Kishor is a pan India figure, When he speaks, it will go beyond Bihar.
"हम फॉरवर्ड कास्ट का गर्दन काटने पर लगा था, काहे वोट दें BJP को?? हमारे बाल बच्चों का गर्दन काटने पर लगा है, इसलिए वोट दिए थे BJP को?
उ रविशंकर भी UGC पर साइन किया था, नहीं देंगे वोट!"
-ये बोलना है एक वोटर का
UGC पर GC वोटरों की नाराजगी अब दिख रही है!
सब कुछ साफ है अब-आँखे बंद करने से सच्चाई नहीं बदलेगी!