पता है, भारत की सिर्फ़ 5 परीक्षाओं - NEET, JEE, SSC, UPSC और RRB की तैयारी पर छात्र और उनके परिवार हर साल कितना ख़र्च करते हैं?
₹3.5 लाख करोड़।
यानी भारत सरकार के पूरे शिक्षा बजट का लगभग तीन गुना। शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, विज्ञान और महिला-बाल विकास - इन पाँच मंत्रालयों के कुल बजट के बराबर।
और बदले में करोड़ों युवाओं को क्या मिलता है? तनाव, अनिश्चितता, बेरोज़गारी, और टूटते सपने।
जो ख़र्च सरकार की ज़िम्मेदारी है, उसका बोझ आज परिवार उठा रहे हैं।
#ChhatronKiGoonj
Dear Shri Mohan Bhagwat ji,
My letter will reach you shortly. However, I thought it was important to draw your attention to this matter early.
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Firstly, congratulations to the RSS on completing 100 years.
An organisation that claims over 60,000 shakhas and crores of swayamsevaks must also uphold transparency and constitutional accountability.
As per RSS’ highest and most important decision making body Akhil Bharatiya Pratinidhi Sabha’s 2025–26 Karnataka report, the RSS has 4,127 daily shakhas, 1,389 weekly milans, 60 monthly mandalis, 2,194 Samajotsavas with 19.61 lakh participants and held 562 route marches with 2.21 lakh uniformed participants in the state.
With such scale and influence, the RSS must clarify its legal status, registration, office bearers, funding, expenditure, taxation and permissions for public activities.
If citizens, labour, NGOs, trusts, temples and companies are expected to register, disclose and comply with the law, why should the RSS remain exempt?
In its centenary year, the RSS must responsibly abide by the Constitution and register, disclose, pay applicable taxes and function transparently within the Constitution.
As suggested in my letter, I am looking forward to hearing from @RSSorg soon.
@DrMohanBhagwat@RSSorg
कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे ने मोहन भागवत की जेड प्लस से अर्जित की हुई सारी इज्जत के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। खड़गे ने भागवत को चिट्ठी लिखकर संघ यानि RSS का हिसाब किताब मांगा है।
पत्र में प्रियंक खड़गे ने आरएसएस से आग्रह किया है कि वे अपनी कानूनी स्थिति, दान के स्रोत, आयकर भुगतान, कार्यक्रमों की अनुमति आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दें। उन्होंने तर्क दिया कि देशभर में लगभग 90,000 शाखाओं और लाखों सदस्यों वाला यह संगठन एनजीओ या कंपनियों जैसी जवाबदेही का पालन करे।
पत्र में पूछा गया है कि RSS किस कानून के तहत कार्य करता है और पंजीकरण से छूट का आधार क्या है? उन्होंने भी पूछा है कि गुरुदक्षिणा के स्रोत क्या हैं? आयकर का भुगतान किया जाता है या नहीं?
प्रियांक खड़गे नियम कायदे वाले हैं। जवाब नहीं मिला तो कार्रवाई कर देंगे यह बात मोहन भागवत जी को समझनी होगी।
कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खरगे ने कहा कि जिस देश में हर ठेला-फेरी लगाने वाले को भी पंजीकरण कराना पड़ता है, वहां आरएसएस जैसा संगठन क़ानून से ऊपर कैसे हो सकता है. वे दिखाएं कि उन्हें संविधान के प्रावधानों से कैसे छूट प्राप्त है.
पूरी ख़बर: https://t.co/ykspliw5qi
महान् क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल के बारे में चौंकाने वाले तथ्य
रामप्रसाद बिस्मिल को प्रायः केवल काकोरी कांड, फाँसी और दो-चार क्रांतिकारी पंक्तियों तक सीमित कर दिया जाता है। वास्तविकता में वे एक अद्भुत आत्मालोचक, बहुभाषी लेखक, प्रकाशक, अनुवादक, संगठनकर्ता, समाज सुधारक और आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्य के स्वप्नद्रष्टा थे।
1. ‘बिस्मिल’ उनका उपनाम नहीं, तख़ल्लुस था
उनका वास्तविक नाम रामप्रसाद था। ‘बिस्मिल’ उर्दू का शब्द है, जिसका अर्थ है; घायल, आहत अथवा बेचैन। वे अपनी रचनाओं में ‘राम’, ‘अज्ञात’ और ‘बिस्मिल’ जैसे नामों का प्रयोग करते थे। बाद में यही साहित्यिक नाम उनकी स्थायी पहचान बन गया।
2. ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ के मूल रचनाकार वे नहीं थे?
यह शायद सबसे चौंकाने वाली बात है। प्रसिद्ध ग़ज़ल “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” के मूल रचनाकार पटना के शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी थे। रामप्रसाद बिस्मिल ने इसे क्रांतिकारी आंदोलन का स्वर बनाकर इतनी प्रसिद्धि दी कि यह उन्हीं की रचना समझी जाने लगी। लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि यह उन्हीं की रचना है।
3. उन्होंने किशोरावस्था की अपनी कमजोरियाँ भी नहीं छिपाईं
अपनी आत्मकथा में बिस्मिल ने स्वीकार किया कि किशोरावस्था में वे पिता के संदूक से पैसे चुराकर उर्दू उपन्यास खरीदते थे। उन्हें धूम्रपान और भाँग की आदत भी लग गई थी; एक समय वे प्रतिदिन लगभग 50–60 सिगरेट पीते थे। बाद में आत्मानुशासन, अध्ययन और आर्यसमाज के प्रभाव से उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह बदल लिया।
4. प्रतिबंधित पुस्तकें बचाने के लिए एम्बुलेंस कर्मचारी बन गए
उन्होंने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम पर ‘अमेरिका की स्वतंत्रता का इतिहास’ नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसे औपनिवेशिक सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। दिल्ली के कांग्रेस अधिवेशन में पुलिस छापा पड़ने पर उन्होंने एम्बुलेंस-दल की वर्दी और बाजू पर लगे बैज का लाभ उठाया तथा लगभग दो सौ प्रतियाँ ओवरकोट में समेटकर पुलिस के सामने से निकाल लाए।
5. वे यमुना में कूदकर पानी के भीतर तैरते हुए बच निकले थे
मैनपुरी षड्यंत्र के दौरान पुलिस से मुठभेड़ हुई तो बिस्मिल यमुना में कूद गए और काफी दूरी तक पानी के भीतर तैरते रहे। पुलिस और उनके कई साथियों ने समझ लिया कि वे डूबकर मर गए हैं; लेकिन वे जीवित बच निकले और भूमिगत हो गए।
6. एक बार उनके अपने क्रांतिकारी साथियों ने ही उनकी हत्या की कोशिश की
भूमिगत जीवन के दौरान संगठन के भीतर अविश्वास इतना बढ़ गया कि प्रयाग में प्रार्थना और ध्यान करते समय एक साथी ने उन पर गोली चला दी। गोली उनके कान के पास से निकल गई। बिस्मिल ने यह घटना स्वयं अपनी आत्मकथा में लिखी; क्रांति का संसार केवल वीरता का नहीं, विश्वासघात और भीतरी हिंसा का भी संसार था।
7. वे केवल कवि नहीं, अनुवादक और प्रकाशक भी थे
उन्होंने बंगला से ‘बोल्शेविकों का कारनामा’ और ‘योगिक साधन’ जैसी रचनाओं का हिंदी रूपांतरण किया। उनकी पुस्तक-सूचियों में इतिहास, कविता, अनुवाद, आत्मकथा और राजनीतिक घोषणापत्र सहित अनेक ग्रंथ मिलते हैं। उन्होंने ‘सुशील माला’ नाम से प्रकाशन-कार्य भी किया, जिसमें स्वयं उनके अनुसार लगभग पाँच सौ रुपये का घाटा हुआ। उस समय यह बहुत बड़ी रकम थी।
8. उनका सपना केवल अंगरेज़ों को भगाना नहीं, शोषणमुक्त गणराज्य बनाना था
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संविधान में लक्ष्य था; “यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया” का संघीय गणराज्य, सार्वभौमिक मताधिकार और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को संभव बनाने वाली समस्त व्यवस्थाओं का उन्मूलन। अर्थात् बिस्मिल का चिंतन स्वतंत्रता से आगे जाकर लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता तक पहुँचता था।
9. काकोरी में यात्रियों को लूटना उद्देश्य नहीं था
काकोरी कार्रवाई का निशाना रेलयात्रियों की निजी संपत्ति नहीं, अंग्रेज़ी सरकार का खजाना था। लगभग 4,600 रुपये के सरकारी धन को क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए लिया गया। एक यात्री अहमद अली की मृत्यु गोली दुर्घटनावश चलने से हुई, जिसने स्वयं क्रांतिकारियों को भी गहरा आघात पहुँचाया।
10. फाँसी की कोठरी से उनकी आत्मकथा बाहर निकाली गई
गोरखपुर जेल की मृत्यु-दंड कोठरी में उन्होंने कागज़ के टुकड़ों पर अपनी आत्मकथा लिखी। वे पन्ने गुप्त रूप से जेल से बाहर निकाले गए और उनकी फाँसी के बाद प्रकाशित हुए। अंतिम दिनों में भी उनका सबसे बड़ा आग्रह प्रतिशोध नहीं, हिंदू-मुस्लिम एकता था। उन्होंने अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ से अपनी मित्रता को प्रमाण बनाकर पूछा था कि जब एक आर्यसमाजी और एक समर्पित मुसलमान क्रांति में साथ हो सकते हैं तो पूरा देश क्यों नहीं?
रामप्रसाद बिस्मिल की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही थी कि वे अपनी मूर्ति स्वयं नहीं गढ़ते थे। उन्होंने अपनी दुर्बलताएँ भी लिखीं, अपने साथियों की भूलें भी और क्रांतिकारी आंदोलन की सीमाएँ भी। वे केवल मृत्यु का साहस रखने वाले युवक नहीं थे; वे ऐसे विचारक थे, जो तीस वर्ष की आयु से पहले ही साहित्य, संगठन, लोकतंत्र, समानता और राष्ट्रीय एकता का पूरा वैचारिक संसार छोड़ गए।
#रामप्रसादबिस्मिल #महानक्रांतिकारी #बिस्मिल #काकोरीट़्रेन
तस्वीर में जो शख्स हैं, इनका नाम प्रोफेसर बलराम तिवारी है। बलराम तिवारी सर यूट्यूब के जमाने से बहुत पहले के शिक्षक हैं, इसलिए इनके यूट्यूब पर बहुत कम लेक्चर मिलेंगे। यूट्यूब पर सर के जो भी लेक्चर मिले जाकर सुन लीजिए सब के सब अनमोल हैं, ज्ञान से ओतप्रोत। बलराम तिवारी सर के पढ़ाए हुए सैंकड़ों बच्चे UPSC और अलग-अलग स्टेट PCS में अधिकारी बने हैं। जी हां, एक दो नहीं सैंकड़ों, तीन चार सौ से ऊपर। सर हिंदी साहित्य पढ़ाते थे और दिल्ली में UPSC की तैयारी करने वाला बच्चा स्पेशली बलराम तिवारी सर से पढ़ने के लिए पटना आता था। खान मास्टर ने पटना को पहचान दी जैसी जब लोग बात करते हैं तो लोगों के आई क्यू पर तरस आता है। खान मास्टर चपरासी के लेवल का मास्टर है। दिक्कत यह है कि नरेंद्र मोदी के राज में WhatsApp University ने लोगों के आई क्यू को बहुत लो बना दिया है तो आज खान मास्टर शिक्षक का पैमाना हो गया है।
:~ राजीव सिंह जादौन
हाथ से पत्र लिखने वाले एक शख़्स की अनूठी कहानी
रोहितकुमार सिंह; IAS
काशी की विश्वनाथ गली में आज भी एक पीले दरवाज़े के पीछे स्याही की महक ठहरी है।
वहाँ पंडित हरिशंकर त्रिपाठी बैठते थे, शहर के आख़िरी चिट्ठी लिखने वाले।
- न कंप्यूटर,
- न प्रिंटर,
- बस एक चौकी, %
- पीतल की दवात,
- बाँस की कलम
और चश्मे के पीछे झाँकती, थकी आँखें।
लोग कहते, "पंडित जी, अब कौन चिट्ठी लिखता है? फोन कर दो न!"
वो हँसकर कहते, “बेटा, फोन बात पहुँचाता है, चिट्ठी बात को रोककर रखती है।”
◆ पहली चिट्ठी
2006 के सावन में, जब *अस्सी घाट* पर पहली बार मोबाइल रिचार्ज की दुकान खुली थी, एक ग्यारह साल की लड़की भीगी चोटी लिए आई थी। नाम था- अप्पू। असली नाम- अपर्णा मिश्रा।
“बाबा, बाबूजी को चिट्ठी लिखनी है। वो सूरत में कपड़ा मिल में हैं।”
हरिशंकर ने पूछा, “क्या लिखवाओगी?”
अप्पू ने थोड़ा सोचा, “लिखो कि आँगन का बेल पक गया है, और मैं रोज़ शाम को बाबूजी की खड़ाऊँ चौखट पर रख देती हूँ, ताकि लगे वो गंगा नहा के अभी आएँगे।”
पंडित जी ने वही लिखा, धीरे- धीरे। नीचे अप्पू से गोल-गोल अक्षरों में नाम लिखवाया।
वो चिट्ठी सूरत पहुँची।
तीन हफ्ते बाद जवाब आया और अप्पू फिर आई।
फिर हर महीने...।
*****
समय सरकता रहा...।
******
आज शाम, वैशाख की लू में जब घाट पर धूप तप रही थी, अपर्णा, जो अब BHU में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफेसर थी, उसी पीले दरवाज़े पर लौटी।
दरवाज़ा बंद था!
बगल की पान वाली अम्मा ने बताया,
पंडित जी पिछले माघ में चले गए।
चौकी खाली थी,
बस कोने में एक स्टील का बक्सा रखा था।
उस पर खड़िया से लिखा था:
“अप्पू बिटिया के लिए।”
अपर्णा ने खोला। अंदर कार्बन कागज़ों की गड्डियाँ थीं।
हरिशंकर हर चिट्ठी की नकल अपने पास रख लेते थे।
पहली नकल — “बेल पक गया है...”
दूसरी — “बाबूजी, दीवाली पर मत आना, अम्मा कहती हैं टिकट महँगा है, पर मैं अपनी चाँदी की पायल बेच दूँगी, आप आ जाओ।”
दसवीं — “बाबूजी, मैं दसवीं में फर्स्ट आई।”
बीसवीं — “बाबूजी, अम्मा को दमा बढ़ गया है।”
पचासवीं — “बाबूजी, आज मेरी नौकरी लगी, BHU में। आपकी खड़ाऊँ अब भी चौखट पर है।”
हर नकल के नीचे पंडित जी की छोटी टिप्पणी:
“लिखते समय चुप हो गई थी। दवात में गंगाजल मिलाया।” या “आज बहुत हँसी, बोली बाबा, इस बार मिठाई लाऊँगी।”
सबसे नीचे एक बंद लिफाफा था, जिस पर लिखा था — “मेरे बाद पढ़ना।”
अंदर पंडित जी की काँपती लिखावट:
"बिटिया,
मैं चिट्ठी लिखने वाला हूँ, पर एक चिट्ठी मैंने छुपाई। 2011 में तुम्हारे बाबूजी का आख़िरी पत्र आया था, सूरत के सरकारी अस्पताल से। उन्होंने लिखा था, अगर मुझे कुछ हो जाए तो अप्पू को मत बताना, वो पढ़ाई छोड़कर आ जाएगी। मैं हर महीने मनीऑर्डर भिजवाता रहूँगा, तुम बस मेरी तरफ से जवाब लिखते रहना, जैसे मैं ठीक हूँ।"
मैंने पंद्रह बरस तक तुम्हारा बाबूजी बनकर उत्तर लिखे। मुझे क्षमा करना। पर देखो न, तुम पढ़ीं, अब तुम पढ़ाती हो, तुम्हारी अम्मा ने तुम्हें टूटने नहीं दिया।
कभी-कभी एक झूठ, सच से ज़्यादा जीवन देता है।
अब यह बक्सा तुम्हारा है। चाहो तो गंगा में प्रवाहित कर देना, चाहो तो कक्षा में पढ़ाना।
अपर्णा की आँखों से आँसू टपके और दवात की सूखी स्याही फिर गीली हो गई!
◆आख़िरी चिट्ठी
उस रात अपर्णा ने पीला दरवाज़ा फिर खोला। चौकी पोछी, दवात में नई स्याही घोली। गली के बच्चे झाँकने लगे।
उसने पहली चिट्ठी खुद पंडित जी के नाम लिखी:
“बाबा, आज समझा कि चिट्ठी पहुँचती नहीं, रुकती है। आपने मेरे बाबूजी को पंद्रह साल तक मेरे पास ज़िंदा रखा। अब मैं आपकी चौकी ज़िंदा रखूँगी। हर शनिवार शाम दो घंटा, जो भी आएगा, मैं उसके लिए चिट्ठी लिखूँगी, बिना पैसे। बस एक शर्त, वो उसे पढ़कर सुनाएगा, ताकि शब्द हवा में ठहरें।”
उसने चिट्ठी मोड़कर दवात के पास रख दी।
अगले शनिवार एक ज़ोमैटो वाला आया, हेलमेट हाथ में, “दीदी, गाँव में दादी को मैसेज भेजना है, लिख दोगी?”
अपर्णा हँसी, “बैठो। पहले बताओ, दादी क्या बनाती थीं?”
लड़का बोला, “बाजरे की रोटी और गुड़।”
उसने बाँस की कलम डुबोई और लिखना शुरू किया — “दादी, काशी में आज लू है, पर तुम्हारे हाथ की बाजरे की रोटी की याद आते ही पसीना भी मीठा लगने लगता है...।”
बाहर शंख बजा, घाट पर आरती की घंटियाँ बजीं और अंदर पीले दरवाज़े के पीछे कलम कागज़ पर चलती रही।
कभी-कभी शहर बदल जाते हैं,
पर
कुछ दरवाज़े जान-बूझकर पुराने रखे जाते हैं, ताकि लौटने पर स्याही की महक हमें नाम से पुकार ले।
*गंगा शरण सिंह*
@rohitksingh
Paying tribute to the visionary nation builder Pandit Jawaharlal Nehru on his death anniversary. As India’s first Prime Minister, he strengthened democracy, promoted scientific temper and established institutions such as IITs, AIIMS and major public sector industries that shaped the nation’s future. His contribution to modern India and inclusive progress will always be remembered.
.@reinerpope explains the difference between a CPU and a GPU. A huge chunk of a CPU die is actually just predicting what code will run next. GPUs strip this out, which is part of why they can fit so much more compute on the chip.
पापा, आपने जिस कुशल, समृद्ध और मजबूत भारत का सपना देखा था, उसे साकार करने की जिम्मेदारी मैं पूरी करूंगा।
आपकी सीख, आपके संस्कार और आपकी यादें हमेशा मेरे साथ रहेंगी।
जिस समय दुनिया मानव इतिहास के उस मोड़ पर खड़ी है जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव जीवन, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, रोजगार और सत्ता संरचना तक को रेडिकल तरीके से बदलने वाला है, उस समय भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि देश की सत्ता ऐसे लोगों के हाथों में है जिन्हें इस परिवर्तन की गहराई का अंदाज़ा ही नहीं है।
इतिहास में इस तरह के बदलाव कई शताब्दियों में एक बार आते हैं। औद्योगिक क्रांति ने दुनिया की अर्थव्यवस्था बदल दी थी, इंटरनेट ने सूचना और संचार का स्वरूप बदल दिया, और अब AI मानव सभ्यता के अगले चरण को तय करेगा। आने वाले वर्षों में वही देश आगे बढ़ेंगे जो रिसर्च, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और टेक्नोलॉजी में निवेश कर रहे हैं ।
लेकिन भारत में आज भी बहसें धर्म, नफरत, टीवी प्रोपेगेंडा और सतही राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। दुनिया AI मॉडल, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन पर काम कर रही है जबकि भारत के नीति-निर्माता अभी भी वैज्ञानिक प्रगतिशील दृष्टिकोण बजाय नफ़रत और किसी तरह सत्ता में बने रहने के प्रयास में जुटे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि AI केवल टेक्नोलॉजी का मुद्दा नहीं है। यह रोजगार, सामाजिक असमानता, लोकतंत्र, प्राइवेसी और मानव अधिकारों तक को प्रभावित करेगा। अगर किसी देश की राजनीतिक नेतृत्व क्षमता कमजोर हो, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव हो और संस्थाओं का क्षरण हो रहा हो, तो ऐसा देश इस बदलाव में पीछे छूट जाना तय है।
मेडिकल ही नहीं, इंजीनियरिंग, लॉ आदि हर जगह में प्लस टू के नम्बर के आधार पर एडमिशन हो. हर स्तर पर ऐसा ही हो. पैसा और विदेशी पापा वाला कोटा ख़त्म हो. स्कूली और कॉलेज परीक्षाओं को ईमानदारी से किया जाए.
NEET 2026 के पेपर लीक की खबर सुनी।
परीक्षा नहीं - NEET अब नीलामी है।
कई सवाल परीक्षा से 42 घंटे पहले WhatsApp पर बिक रहे थे।
22 लाख से ज़्यादा बच्चे साल भर रात-रात भर आँखें जलाकर पढ़ते रहे और एक रात में उनका भविष्य बाज़ार में सरेआम नीलाम हो गया। यह पहली बार नहीं है। 10 साल में 89 पेपर लीक - 48 बार दोबारा परीक्षा। हर बार वही वादे, और फिर वही ख़ामोशी।
मोदी जी, जब आप अपनी हर नाकामी का बिल जनता पर डालते हैं, तो ग़रीब के बच्चों का भविष्य भी उसी बिल में आता है।
22 लाख बच्चों का भरोसा टूटा है। और मोदी सरकार से बड़ा ख़तरा भारत के युवाओं के सपनों के लिए कोई नहीं।
मैं भारत के युवा के साथ हूँ। यह वक़्त बेहद मुश्किल है - मैं जानता हूँ। लेकिन यह व्यवस्था ऐसे नहीं रहेगी। हम मिलकर इसे बदलेंगे।
~ 1 करोड़ "लखपति दीदी"
~9000 किसान सम्मान निधि
~50 लाख पक्के मकान
~125 यूनिट बिजली फ्री
~10000 रुपए महिलाओं को
उसके बाद भी रोजगार मांग रहे हो तो ये फिर तुम्हारी गलती है भाई।
मैं पुलिस वालों के साथ हूं..