"और भक्तजनों आज से ये विवाह कथा आरंभ होती है। कृपया जूते-चप्पल उतार कर पढ़ें और पुण्य लाभ लें"
----------------------------------------------
पिच्चर शुरू ही घंटे से हो रही है जो बज रहा है और अचानक एकदम संवसकारी माहौल बन जाता है, बाऊजी बैठे दिख जाते हैं कुर्सी पर। पहले सब लोग धोग दे लो इनकू तो आगे बढ़ें। अब ये बाउजी बैठे-बैठे अपनी ही बेटियों को देखके मुस्कुराये जा रहे हैं और बेटी पुराण सुना रहे हैं। बेटियाँ अभी छोटी ही हैं पर ये आदमी डायरी में इनकी शादी की बातें लिख रहा है, सॉरी विवाह की। कौन आदमी बेटियों को जब-जब देखता है तब-तब उसकी शादी का खयाल करने लगता है? अब बाउजी 15 मिनट तक अपनी परिवार पंचायत सुना रहे हैं कि भाई-भाभी निपट गए थे तो उनकी बेटी मेरे पास रहती है और ये कि बीवी मेरी एकदम खूसट है जिसके चेहरे पर 24 घंटे 12 बजे रहते हैं। उसके साथ मिलकर जैसे-तैसे एक बेटी पैदा की है उसके बाद सरेंडर कर दिया। अब बीवी को भाई की बेटी से खुन्नस है क्योंकि वो सुंदर दिखती है और बाउजी दिन-रात भाई की बेटी के ही गुणगान करते रहते हैं। बीवी पाउडर का पूरा डब्बा अपनी बेटी के चेहरे पर पोत देती है, मतलब शकल ही नहीं अक्ल भी नहीं पाई है इसने। ये दोनों दो अतियों पर जी रहे हैं। बाउजी की बीवी की खुद की भी शक्ल ऐसी नहीं है कि बेटी उन पर जाने का जोखिम ले और बाउजी तो बाउजी हैं इसलिए बेचारी बेटी सुंदर नहीं हो पाती।
बाउजी की बीबीजी इस भाई की बेटी पर बहुत अत्याचार करती है और इसका मुँह इतना खतरनाक है कि बाउजी इसको कुछ बोलने से अच्छा ये समझते हैं कि इस लड़की को अपनी फल-फ्रूट की दुकान पर ले चलें साथ में। बाउजी की बकमोदी इतनी लंबी चलती है कि बेटियाँ उकता कर बड़ी हो जाती हैं। एक आधा गाना भी गा देते हैं बाउजी सुरेश वाड़कर की आवाज में और उस गाने में भी फिर विवाह की बात करते हैं। विवाह की खब्त सवार है इस आदमी के सर पर। उसी कुर्सी को तोड़ते हुए बाउजी बुड्ढे हो जाते हैं। और छोटी सी गली में से बारात निकल रही है। एक कार अटकी हुई है इस बारात की वजह से। अब असल जीवन में तो कार में बैठा आदमी सौ गालियां बकता है इन ट्राफिक जाम करने वालों को पर ये सूरज भाई की फिलीम है, अपने मैंने प्यार किया वाले, जिनकी रगों में खून नहीं संवसकार बहते हैं। इसलिए इस कार में बैठा मनोज जोशी गाली देने की बजाय हँसने लगता है और कार से उतर कर बाउजी के घर पहुँच जाता है। मतलब इतना खुश है ये आदमी कि मुझे खुश होने से चिढ़ होने लगी। किस बात पे इतना हँस रहा है भाई?
हँसते-हँसते ये बाउजी के घर पहुँच जाता है बाउजी भी हँसने लगते हैं, मुनीम भी हँस रहा है, पंछी, चींटी, कीड़े-मकोड़े सब हँस रहे हैं। इस मीठे वातावरण में कड़वाहट घोल कर थोड़ा बैलन्स लाती है बाउजी की बीबीजी जो सूरत से ही खडूस है। ये आदमी जौहरी है जिससे जेवर बनवाए हैं बाउजी ने और उनकी डेलीवेरी देने आया है। बकमोदी करके वो हमको सब बता देता है, ये भी कि पहले वो मधुपुर (वही जगह जहाँ बाउजी रहते हैं) में ही रहता था। जौहरी भाभी जी को मस्का लगाने लगता है और बाउजी फिर राग विवाह छेड़ देते हैं। और विवाह की बात होते ही पूनम की एंट्री होती है जिस पर मुग्ध होकर रवींद्र जैन संतूर बजाने लगते हैं। अब जौहरी फिर पूनम की सुंदरता की तारीफ़ कर देता है और बाउजी की बीबीजी सुलग जाती है। वो अपनी बेटी को आवाज लगाती है जिस पर पूनम कहती है मैं बुलाकर लाती हूँ। इसको संसवकार की इतने इन्जेक्शन खोंसे गए हैं कि नॉर्मल आवाज में बोल भी नहीं पाती जैसे फुसफुसा के बोल रही हो।
बाउजी की असली बेटी अमिताभ बच्चन के देखा ना हाय रे गाने पर नाच रही है कमरे में। घर छोटा सा ही है पर ये गाना चलने की आवाज नीचे तक नहीं पहुँच रही, बड़जात्या महिमा अपरंपार। अब दोनों बहनें बात करने के बहाने हमको बताती हैं कि बड़ी वाली हमेशा छोटी वाली को अपनी खडूस माँ की खडूसता से बचा लेती है।
विवाह – 1
#vivahroast
@ChouhanShivraj एक बिना रीढ़ का आदमी कितना भी बोल ले, कर कुछ नहीं सकता, तुम्हें Mp से उठाकर फेंक दिया, मुँह से चूँ तक नहीं निकली, कोई सीडी है क्या उनके पास?
SIR का मुद्दा सिर्फ़ इतना ही नहीं है कि ज्ञानेश ने वोटर्स के नाम काट दिए, मुद्दा उससे भी भयावह है।
हाल ही में कर्नाटक में ऐसा एक मामला प्रकाश में आया जिसमें बड़ी संख्या में फॉर्म 7 BLO के पास जमा हो रहे थे और ये सारे फॉर्म पहले से भरे हुए थे, प्रिंटेड थे, याने किसी ने डेटाबेस से बल्क में प्रिंट किए थे। फॉर्म 7 नाम डिलीट करने की रिक्वेस्ट होती है याने अगर आपको किसी का नाम वोटर लिस्ट से हटवाना है, जैसे कोई मृत है, या कहीं और चला गया है तो ये फॉर्म भरा जाता है। नियम के अनुसार एक दिन में दस से ज़्यादा फॉर्म स्वीकृत नहीं किए जा सकते और चार से ज़्यादा फॉर्म होने पर उसका प्रॉपर रिव्यू किया जाता है ताकि ग़लत नाम डिलीट न हो जाए।
ज्ञानू ने इसी जनवरी में ये लिमिट 50 फॉर्म्स की कर दी और इस बार sir में ये लिमिट हटा ही दी गई। याने कोई भी कितने भी फॉर्म भर सकता है और उसके बाद शुरू हुआ ये खेल।
तो फॉर्म 7 भरो किसी के भी नाम का और वो नाम डिलीट, तो भाजपा के कार्यकर्ता ये फॉर्म भरने लगे, आप फैक्ट चेक कर सकते हैं। और आंकड़ों के मुताबिक 72% ऐसे नाम अल्पसंख्यक समुदाय से हैं।
अब इसका सीधा असर आप चुनाव जीतने से जोड़ेंगे राइट? लेकिन इससे भी एक कदम आगे, इनकी जो NRC लागू करने की प्लानिंग है उसमें काग़ज़ दिखाना ज़रूरी बताया है, और आधार को हाल ही में कोर्ट ने प्रूफ मानने से इंकार कर दिया था याद है?
उसका मज़ाक खूब बना था लेकिन ये लोग येड़ा बनकर पेड़ा खाते हैं, उसका भी उद्देश्य इसी से जुड़ा हुआ है। आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो बचा वोटर कार्ड लेकिन ज्ञानू ने अल्पसंख्यकों और अपने दुश्मनों के नाम वहां से हटा दिए हैं तो अब उनके पास उस वक्त दिखाने के लिए कुछ नहीं होगा जब NRC में कागज मांगा जाएगा।
तो नीचता के मामले में आपकी सोच जितना नीचे जाकर बंद हो जाती है, इनकी वहां से शुरू होती है।
#GyaneshKumar
नदीम-श्रवण ने गुलशन कुमार के लिए एक एल्बम रिकॉर्ड किया था जिसे महेश भट्ट ने सुना और उन्हें एक फ़िल्म बनाने का आइडिया आया। उस एल्बम के कुछ गीत उस फ़िल्म में नहीं लिए गए जिनमें एक था “दिल है के मानता नहीं”।
वो फ़िल्म बनी आशिक़ी जिसने नदीम-श्रवण और फ़िल्म संगीत दोनों की ही दशा-दिशा बदल दी। महेश भट्ट ने वो गीत अपनी अगली फ़िल्म में लिया और उस फ़िल्म के भी गीत कमाल के बने। 1991 नदीम-श्रवण के पूरे करियर का सर्वश्रेष्ठ साल है। चाहे उन्होंने नकल भी की हो लेकिन उस वक़्त के गीत आज भी ज़िंदा हैं, सुने जाते हैं, और आज भी अच्छे लगते हैं। आशिक़ी के गीतों के संगीत संयोजक थे नरेश शर्मा, जिनके बेटे मिथुन आज के लोकप्रिय संगीतकार हैं। नरेश शर्मा ने उनकी शुरुआती फिल्मों का संयोजन बहुत ही बढ़िया किया था। आपको बता दूँ कि संगीत संयोजक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है, वही एक गीत को सजाता-संवारता है। धुन एक खाली मकान है, संयोजक उस मकान को खूबसूरत बनाता है। शुरुआती दौर में ये संयोजन शायद नरेश शर्मा के हाथ में ज़्यादा रहता होगा इसीलिए वो गीत अलग साउंड करते हैं, नदीम-श्रवण के बाद के गीतों से।
ख़ैर, आज हम बात करने वाले हैं “दिल है के मानता नहीं” के एक उपेक्षित गीत की, एक नहीं दो गीतों की जिन्हें ग़ज़ल भी कहा जा सकता है। बाकी सारे गीत तो जगह-जगह बजे लेकिन इन गीतों को उतनी लोकप्रियता नहीं मिली पर मुझे ये गीत बहुत पसंद है। मैं आज भी सुनता हूँ। पहला है –
“हम तो मशहूर हुए हैं आपकी चाहत में
कितने मजबूर हुए हैं आपकी चाहत में”
इसे लिखा था रानी मलिक ने और गाया था अनुराधा पौडवाल ने, जो उस वक़्त टी सिरीज़ की स्थायी गायिका थीं।
और दूसरा –
“कैसे मिज़ाज आपके हैं फ़रमाइए
हम तो हैं ख़ैरियत से अपनी सुनाइये”
इसे भी रानी मलिक ने लिखा था, कुमार सानू और अनुराधा पौडवाल ने गाया था।
बहुत ही मिनिमल संगीत के साथ शुरू होता है। जब अनुराधा पौडवाल गाने लगती हैं, तब तबला शुरू होता है और ताल के लिए बहुत ज़्यादा साज़ नहीं हैं बस तबला और कांगो। तबला मुख्य रूप से साथ चलता है और सारंगी जो इसे विशुद्ध ग़ज़ल वाला रंग देता है। तबले के जो ठेके बीच में बदलते रहते हैं वे बड़े अच्छे लगते हैं। नदीम-श्रवण का दावा था कि हम संगीत में भारतीयता वापस लेकर आए हैं और कुछ हद तक सही भी था। इस गीत में जो साज़ इस्तेमाल हुए हैं जैसे सारंगी, संतूर, तबला, सितार ये सब बप्पी लाहिरी युग में हाशिये पर चले गए थे।
“आप ही आप हैं जाती है जहाँ तक ये नज़र
दिल हमारा है मगर आपका हक़ है इस पर
दुनिया से दूर हुए हैं आपकी चाहत में”
और
“हम पर क्यूँ दिल चुराने का इल्ज़ाम रख दिया
गर झूठ है तो मुझको मेरा दिल लौटाइए
कोई आते-जाते मिलते-मिलाते जो देख ले
ऐसा है तो फ़िर ख़ाबों में तशरीफ़ लाइये”
गीत के बोल भी ठीक ही हैं। समीर से बेहतर लिखती थीं रानी मलिक।
अगर आप संगीत प्रेमी हैं और आपने उस ज़माने में इस फिल्म की कैसेट खरीदी होगी तब तो सुने ही होंगे और नहीं, तो अब सुन लीजिये, यूट्यूब पर उपलब्ध है।
एपिसोड – 56
ऐ बापू, सुनो!
हमने माना कि एक ज़माना था जब आपकी एक आवाज़ पर पूरा देश खड़ा हो जाता था, कि विश्व में कोई ऐसा देश नहीं जहां महात्मा गांधी नाम अनजाना हो, कि तुम दक्षिण अफ्रीका के नहीं हो फिर भी वहाँ तुम्हारा यहाँ से ज़्यादा सम्मान है, कि तुम्हारी आत्मकथा दुनिया की श्रेष्ठतम 20 किताबों में शुमार की जाती है, कि नीदरलैंड जैसे देश में तुम्हारे नाम के 30 मार्ग हैं, कि कितने ही देशों में तुम्हारी प्रतिमा स्थापित है और ये भी कि बिना बात के दुनिया किसी को इस स्तर का सम्मान नहीं देती लेकिन....
बापू एक चीज़ तुम न जान पाए, कि जिस देश में तुमने जन्म लिया और जिसके लिए पूरा जीवन भागते-दौड़ते रहे, वो कृतघ्न लोगों का देश है। इसके लिए किसी भी उच्च भावना का कोई मूल्य नहीं है। ये खाने और हगने तक सीमित जनता का निजाम है और इसे नेता भी अब तो ऐसा ही चाहिए। तुम जीवन के उच्चतम मूल्यों की वक़ालत करते रहे और हम निम्नतम स्तर तक जाने के लिए बेताब हैं। हालांकि बातें हम ऊँची ही करते हैं लेकिन दबी ज़बान कह देते हैं कि इन पर अमल करना संभव नहीं और फिर हम वही लीचड़पन जीने लगते हैं। देश ने बड़ी उपलब्धि पा ली है, तुम्हारे सत्य के साथ प्रयोगों पर असत्य के प्रयोग करने वाले व्यक्ति ने विजय पा ली है। वो सहजता से हर जगह तुम्हारे सामने झुक जाता है पर मन ही मन गालियाँ भी देता है।
वो तो प्रतिनिधि है, हमने पूरी एक पीढ़ी ऐसी तैयार कर ली है जो बड़ी ही सहजता से ढोंग कर लेती है। पूरी पीढ़ी तुम्हें गालियाँ देने के लिए तैयार कर दी है जो दिन रात बस यही काम करती है। हालांकि उसे इतिहास और समाज की वस्तुस्थिति से बिल्कुल दूर रखा गया है। उन्हें नफ़रत पर ही पाला गया है तो तुम्हारे प्रेम वाले दृष्टिकोण को वो देख भी कैसे सकते हैं?
तो बापू, कुछ गिने-चुने लोग हैं जो अब भी आपको श्रद्धांजली देते हैं और दिल से देते हैं। कुछ और समय, फिर आप सिर्फ विदेशों में ही पाए जाओगे, जैसा कि हमने बुद्ध के साथ किया। अगर पुनर्जन्म होता है तो अब इधर मत आना, हम तो ऐसे ही हैं।
#Repost
#गांधी_जयंती #श्रद्धांजली #gandhiji #GandhiJayanti #Gandhi #mahatma #MahatmaGandhi