جس ملک میں رسول ﷺ کی ناموس محفوظ نہیں اور صحابہ کرام رضوان اللہ علیھم اجمعین عزت محفوظ نہیں وہاں ہم اپنی عزت محفوظ ہونے کا مطالبہ کرتے ہیں۔
یاد رکھیں جب تک ان شخصیات کی عزت محفوظ نہیں ہوگی تب تک ذلت ہماری بھی مقدر ہے۔😭
हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने वाले शामली के आयुष मलिक (उर्फ मोहम्मद अली) ने अब दाढ़ी कटवाकर और मुंडन करवाकर फिर से हिंदू धर्म में वापसी कर ली है। उसने बयान दिया है, "मम्मी-पापा, मैं आपकी परेशानी को देखते हुए वापस हिंदू धर्म में लौट आया हूं।"
आयुष ने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूला था और एक मुस्लिम लड़की चांदनी कुरैशी से निकाह किया था। लेकिन बाद में हिंदू संगठनों के भारी दबाव के चलते शामली पुलिस ने चांदनी, उसके परिजनों और 3 मौलानाओं के खिलाफ जबरन धर्मांतरण की एफआईआर दर्ज कर उन्हें जेल में डाल दिया। जो आयुष कल तक मीडिया के सामने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूलने की गवाही दे रहा था, उसने एक पूरे मुस्लिम परिवार को बर्बाद करने के बाद अब सरेंडर कर दिया है।
पत्रकार जाकिर अली त्यागी ने इस गंभीर मामले पर तीखे सवाल उठाते हुए लिखा है कि आखिर आयुष मलिक का क्या बिगड़ा? ना उस पर कोई एफआईआर हुई और ना ही उसकी गिरफ्तारी हुई। उसने एक मुस्लिम लड़की की जिंदगी से खिलवाड़ किया, उसे और उसके परिवार को जेल भिजवा दिया और खुद वापस हिंदू बन गया। त्यागी ने तंज कसते हुए कहा कि यह इंसान तो डरपोक निकला, जिसने संगठनों के आगे घुटने टेक दिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि उस बेगुनाह मुस्लिम लड़की और उसके बेबस परिवार का क्या होगा, जो सिर्फ इस आयुष मलिक की वजह से आज सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं? कौन देगा इस परिवार को इंसाफ?
कुछ लोग जानते-बूझते ऐसे बयान देते हैं जो देश का माहौल बिगाड़ें, समाज को बांटें और फिर खुद को चर्चा का केंद्र बना लें।
नबी-ए-पाक ﷺ की शान में गुस्ताख़ी किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं की जा सकती।
प्रशासन निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई करे।
नाज़िया इलाही खान सोशल मीडिया पर घटिया शोहरत पाने के लिए लगातार धार्मिक भावनाओं को आहत कर रही है। कानून के तहत इस नफरती सोच पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। हम मांग करते हैं कि पुलिस इस मामले को गंभीरता से ले और त्वरित कार्रवाई करे।@MumbaiPolice@KolkataPolice#ArrestNaziaElahiKhan
हमारे नबी (ﷺ) और अम्मा आयशा (रज़ि.) की शान में नाज़िया इलाही खान द्वारा दिया गया बयान बेहद शर्मनाक और नफरत से भरा है। देश का माहौल खराब करने और नफरत फैलाने वाले ऐसे तत्वों पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।@MumbaiPolice@WBPolice#ArrestNaziaElahiKhan
Multiple FIRs have been registered in Maharashtra against Nazia Elahi Khan for her blasphemous remarks. Since she resides in West Bengal, we urge @WBPolice and @KolkataPolice to arrest her immediately and take strict legal action
#ArrestNaziaElahiKhan
In the Name of God, the Compassionate, the Merciful
Among the faithful are men who fulfill what they have pledged to Allah: there are some among them who have fulfilled their pledge, and some of them who still wait, and they have not changed in the least (Holy Quran 33:23).
केंद्र सरकार ने मुस्लिम विरोधी आयोजन करने वाले हिंदूवादी संगठन को दिया फंड: RTI रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
भारत में रह रहे मुसलमानों में से 25 प्रतिशत को देश से बाहर निकालने, बाकी मुसलमानों का धर्म परिवर्तन कराने और भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग करने वाले एक आयोजन के लिए केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा 63 लाख रुपये की फंडिंग दिए जाने का दावा किया गया है।
जावेद अख़्तर:- अगर ईश्वर है, तो दुनिया में इतना दुख क्यों है?
मुफ़्ती शमाइल नदवी:- अगर दुख ईश्वर के न होने का सबूत होता, तो इंसाफ़ की मांग ही बेकार होती, दुख इस बात का सबूत है
कि इंसान के अंदर सही-ग़लत का एहसास मौजूद है और यही ईश्वर की सबसे बड़ी निशानी है।
जावेद अख़्तर:- अगर ज़्यादातर लोग किसी बात को सही मान लें, तो क्या वही सही हो जाती है?
मुफ़्ती शमाइल नदवी:-
अगर मेजोरिटी से सच तय होता है,
तो इतिहास में ग़लत कभी हुआ ही नहीं।
फिर ग़ुलामी, नस्लभेद और ज़ुल्म भी सही माने जाते
क्योंकि एक दौर में उन्हें भी मेजोरिटी का समर्थन था।
जावेद अख़्तर:- ईश्वर का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, तो उस पर यक़ीन क्यों किया जाए.?
मुफ़्ती शमाइल नदवी:- हर चीज़ जो मौजूद है,
ज़रूरी नहीं कि लैब में दिखाई जाए।
अक़्ल, मोहब्बत, ज़मीर, इंसाफ़
इनका भी कोई टेस्ट-ट्यूब प्रूफ़ नहीं,
मगर कोई इनकार नहीं करता।
जावेद अख़्तर:- धर्म इंसान की बनाई हुई चीज़ है, इसलिए उस पर सवाल ज़रूरी है!
मुफ़्ती शमाइल नदवी:- सवाल करना ज़रूरी है,
लेकिन पहले ये तय हो
क्या इंसान क़ानून बनाता है या क़ायनात?
अगर इंसान ही सब कुछ होता,
तो मौत, कुदरत और तक़दीर पर उसका बस क्यों नहीं?
जावेद अख़्तर:-मुझे सिर्फ़ वही मान्य है जो अक़्ल स्वीकार करे।
मुफ़्ती शमाइल नदवी:- अक़्ल बहुत क़ीमती है,
लेकिन अक़्ल ख़ुद कहती है कि वो हर चीज़ को नहीं समझ सकती, अक़्ल अगर सब कुछ समझ लेती तो घमंड को ज्ञान कहते।
जावेद अख़्तर:- धर्म लोगों को बाँटता है।
मुफ़्ती शमाइल नदवी:- धर्म इंसान को नहीं बाँटता, इंसान अपने स्वार्थ के लिए धर्म को बाँटता है।
चाकू से खाना भी कटता है और इंसान भी
तो गलती चाकू की नहीं, इस्तेमाल करने वाले की है।
इन तमाम सवालों के बाद मुफ़्ती शमाइल नदवी साहब के जवाब कोई भावनात्मक नारे नहीं थे,
बल्कि अक़्ल, फ़ितरत और तर्क की तिहरी मार थी।
न ऊँची आवाज़, न कटाक्ष सिर्फ़ सुकून से रखे गए ऐसे सवाल, जिनके बाद इंकार करने वाले को भी सोचना पड़ा।
ये बहस नहीं थी, ये तर्क का पोस्टमार्टम था
जहाँ शोर नहीं, शब्द भारी थे।
जहाँ तालियाँ नहीं, ख़ामोशी गवाही दे रही थी।
मुफ़्ती साहब ने साबित कर दिया कि
ईमान अंधविश्वास नहीं, बल्कि वो यक़ीन है
जो अक़्ल के हर इम्तिहान में खरा उतरता है।
अगर इसे “जवाब” कहा जाए तो कम है
ये तो विचारों की रीढ़ तोड़ देने वाली क्लैरिटी थी।
ऐसी क्लैरिटी जो बहस जीतने के लिए नहीं,
सच सामने रखने के लिए होती है।
यही फर्क होता है
शोर मचाने वाले और समझाने वाले में।
और आज समझाने वाले ने
बिना शोर के सब कुछ कह दिया।