आज का क्षत्रियों का यह महाकुंभ यादगार रहेगा !🙏
आज एक नया इतिहास रच दिया क्षत्रिय समाज ने हर राजपूत को बहुत गर्व है की उनका समाज आज एक जाजम एक झंडे केसरिया 🚩 के नीचे था !!
समारोह में भाग लेने वाले सभी को बहुत आभार जो नही जा सके उन्होंने आज ट्रेंड में सहयोग किया उनका भी आभार 🙏
ये लास्ट में होंठों से मुंह बिगाड़ के ईशारा किया गया है वर्दी वाले द्वारा ये सब पोल खोल गया।यार ये मीडिया वाला दबंग आदमी है इसको क्यों मार रहा है।
होगा विपक्ष भी गलत होगा वांगचुक भी गलत पर वो मरने वाले बच्चे देश के डॉक्टर बनने वाले थे।वो गलत नहीं थे।ओर अगर ये आंदोलन ज़िम्मेदारोके जिम्मेदारी तय करने के लिए है तो तर्क वितर्क कुछ भी दीजिए।बात ये है कि ज़िम्मेदारी तो तय करनी होगी।उसके लिए विपक्ष का भी फर्ज है ओर देश के युवाओं का भी।वो अपना फर्ज निभा रहे है
ज़िम्मेदारी तय करने में क्या दिक़्क़त है साहब।@Abhinav_Pan सर अपना फर्ज बखूबी निभा रहे हैं लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
भाजपा राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए प्रयासरत है। हम मराठी के साथ जर्मन, फ्रेंच, इटेलियन जैसी भाषा भी पढ़ाने के लिए तैयार है, तो राजस्थानी भाषा को पढ़ाने में हमें कोई दिक्कत नहीं है। राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए हमें इसे एक भाषा के तौर पर बनाना होगा। भाषा को मान्यता दिलाने के लिए पहले भाषाविदों को विभिन्न बोलियों को लेकर एक व्यापक सहमति बनानी होगी।
-श्री @madanrrathore
प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा राजस्थान
राज्यपाल या वायसराय?
क्या हरिभाऊ किशनराव बागड़े, लॉर्ड मैकाले और लॉर्ड कर्ज़न की तरह राजभवन से आदेश जारी कर राजस्थान की भाषाई पहचान पर मराठी थोपने का प्रयास कर रहे हैं?
राजस्थान की अपनी समृद्ध भाषा, संस्कृति और गौरवशाली परंपरा है। किसी भी भाषा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से किसी अन्य भाषा को राजस्थानियों पर थोपना न तो लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप है और न ही संघीय व्यवस्था की भावना के।
क्या यह उचित है? क्या राजभवन का दायित्व राजस्थान की अस्मिता की रक्षा करना है, या उस पर बाहरी भाषाई प्रभाव थोपना?
Honorable Governor @BagadeHaribhau ,
please do not be cynical and narrow-minded.
इस मुगालते में ना रहें कि संवैधानिक हदों का अतिक्रमण करके आप अपनी मनमर्जी 9 करोड़ राजस्थानियों पर थोप देंगे।
हम जानते हैं कि हमारी सरकार में बैठे रहनुमाओं में अब रीढ़ की हड्डी नहीं बची है। वरना राजस्थानियों पर मराठी थोपने की आपकी सनक का अब तक कतरा - कतरा दास्तान हो जाती।
गवर्नर साब, आप वायसराय बनना चाहते हैं। आप मैकाले और कर्ज़न के माफिक काम कर रहे हैं। लेकिन ऐसा करके आप राजस्थान की धरती से सम्मान लेकर नहीं जाओगे।
अगर आपके हिये का राम जिंदा होता तो 9 करोड़ कंठो की राजस्थानी भाषा के साथ इंसाफ करते लेकिन आप हद दर्जे की संकीर्णता से भरे हुए सफेदपोश व्यक्ति हैं जो संवैधानिक पद पर बैठ गए हैं।
एक सदी पहले राजस्थान की धरती ने भी एक बेटा जमनालाल बजाज महाराष्ट्र भेजा था जो आपसे ज्यादा काबिल था। जमनालाल बजाज ने महाराष्ट्र में रहकर आपके लोगों की सेवा की थी। समाज सुधारक बनकर नाम और शोहरत कमाई थी। खुद की सनक और संकीर्णता मराठा भाषी लोगों पर नहीं थोपी थी।
आपको हमारे उस काबिल और महान राजस्थानी बेटे से कुछ सीख लेकर राजस्थान आना था।
हमारी सहिष्णुता का नाजायज फायदा उठाया जा रहा है। अगर कोई गवर्नर महाराष्ट्र के लिए ऐसा फैसला कर दे अब तक राजभवन के सामने कर्फ्यू लग चुका होता।
राजस्थानी से पहले मराठी क्यों?
बीकानेर के शिक्षाविद और साहित्यकार राजेंद्र जोशी ने राजस्थान के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी से पहले मराठी के केंद्र खोले जाने के मुद्दे पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
राजस्थान के 8 करोड लोगों और दो करोड़ से ज्यादा प्रवासियों को किस मुद्दे पर जरूर सोचना चाहिए कि अगर आप लोग आज एकजुट नहीं हुए तो आपके विश्वविद्यालयों में राजस्थानी के बजाय मराठी, कन्नड़, तेलूगू, तमिल आदि के केंद्र ही खुलेंगे। राजस्थानी के नहीं।
अब राजस्थान के विश्वविद्यालयों में भी मराठी भाषा की गूंज सुनाई देगी। राज्यपाल और कुलाधिपति हरिभाऊ बागड़े (जो स्वयं महाराष्ट्र से हैं) के निर्देशानुसार राज्य के विश्वविद्यालयों में 'शास्त्रीय मराठी भाषा अध्ययन केंद्र' स्थापित करने की कवायद शुरू हो चुकी है, और इस बाबत राज्यपाल सचिवालय ने राजस्थान के सभी विश्वविद्यालयों को पत्र भी जारी कर दिया है।
परंतु, यह फैसला एक गंभीर यक्ष प्रश्न खड़ा करता है। क्या महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, बंगाल या कर्नाटक जैसे मजबूत भाषाई अस्मिता वाले राज्यों में किसी बाहरी भाषा को लेकर ऐसा कोई सरकारी फरमान लागू किया जा सकता है? शायद कभी नहीं, क्योंकि वहां की राजनीति और जन-चेतना अपनी मातृभाषा के इर्द-गिर्द बेहद मजबूती से केंद्रित है।
विडंबना देखिए कि जहां एक ओर राजस्थानी भाषा, उसके स्वर्णिम इतिहास और समृद्ध साहित्य को आज तक वह आधिकारिक दर्जा और संरक्षण नहीं मिल सका जिसकी वह हकदार है; वहीं दूसरी ओर, यहां बाहरी भाषा पर शोध और केंद्र स्थापित करने के लिए सरकारी मशीनरी सक्रिय दिख रही है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है: क्या यह विसंगति राजस्थान की कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति का नतीजा है या फिर राजस्थानी भाषा, साहित्य और इतिहास को हाशिए पर धकेलने की कोई गहरी साजिश?
सीधी बात: नहीं चाहिए - बिल्कुल भी नहीं! ❌
राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी अध्ययन समझ से परे है।
जब तक राजस्थानी भाषा को समुचित मान्यता, विभाग और संस्थागत संरक्षण नहीं मिले, तब तक दूसरी राज्यभाषा को प्राथमिकता देना राजस्थान की भाषाई अस्मिता के साथ न्याय नहीं है।
राजस्थान के विश्वविद्यालयों की पहली जिम्मेदारी राजस्थानी भाषा, साहित्य और बोलियों को सशक्त करना है।
पहले राजस्थानी, फिर बाकी भाषाएँ।
#Make_Rajasthani_official
.@LokBhavanJaipur .@RajCMO
राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा पढ़ाने का निर्णय कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है। जब वर्षों से राजस्थान की जनता राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर उसे संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग कर रही है, तब प्राथमिकता राजस्थानी भाषा के अध्ययन, शोध और संवर्धन सहित संवैधानिक दर्जे की होनी चाहिए थी।
राजस्थान का गौरवशाली इतिहास, समृद्ध लोक साहित्य, लोक संस्कृति और असंख्य ऐतिहासिक ग्रंथ राजस्थानी भाषा में सुरक्षित हैं। यदि विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के अध्ययन एवं शोध केंद्र स्थापित किए जाएँ, तो यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उसके प्रभावी हस्तांतरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि हमारा किसी भी भाषा के प्रति न तो विरोध है और न ही कोई पूर्वाग्रह। मराठी सहित भारत की सभी भाषाएँ समान रूप से सम्मान की पात्र हैं। किंतु राजस्थान में अपनी मातृभाषा की उपेक्षा कर किसी अन्य भाषा को प्राथमिकता देना उचित प्रतीत नहीं होता।
राजस्थान के जनप्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं को इस गंभीर विषय पर प्रदेश की भावनाओं के अनुरूप आवाज़ उठानी चाहिए, ताकि राजस्थानी भाषा को उसका उचित सम्मान और संस्थागत स्थान मिल सके।
@RajCMO@RajGovOfficial
विडंबना देखिए…..दुनिया को ‘पधारो म्हारे देश’ कहने वाली धरती अपनी ही भाषा को सम्मान के द्वार तक नहीं पहुँचा पाई। दूसरी भाषाओं का स्वागत हमारी संस्कृति है, लेकिन अपनी मातृभाषा के लिए आवाज़ उठाने में हमारी खामोशी इतिहास जरूर दर्ज करेगा। राजस्थानी की लड़ाई किसी भाषा के खिलाफ नहीं, अपनी पहचान के हक में है……
जद राजस्थान री धरती पर राजस्थानी आज भी मान्यता री बाट जोवे, अर विश्वविद्यालयां में मराठी अध्ययन केंद्र खुलै… तो मन में एकै सवाल उठे—‘घर री बोली कद अपनाई जासी?’
पहलां राजस्थानी नै संवैधानिक मान्यता, फेर बाकी सारी भाषां रो स्वागत। ❤️💛
#make_rajasthani_official#राजस्थानी
महाराष्ट्र में हिंदी बोलने पर लोगों की पिटाई होती हैं और यहां राजस्थान का हाल देखो जहां राजस्थानी भाषा को मान्यता मिलनी चाहिए और पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए वहां ये मराठी भाषा को लागू कर रहे हैं जब देश में निकम्मे नेता और फ्री का राशन पानी बिजली वाले लोग है तब तक यही हाल होगा
लोकभवन में बैठकर राज्यपाल हरीभाऊ किशनराव बागडे राजस्थान के विश्वविधालयों में मराठी क्यों पढाना चाहते हैं राजस्थानी पढ़ाने के बारे में कहते तो समझ में आता | हरीभाऊ किशनराव बागडे मराठी है तो उनको मराठी प्रिय होगी लेकिन राजस्थान में मराठी पढ़ाने का क्या मतलब है |
राजस्थान में मराठी भाषा के अध्ययन केंद्र खोलने का निर्णय स्वागतयोग्य है। भारत की प्रत्येक भाषा हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत है और हम सभी भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन एवं सम्मान के पक्षधर हैं।
किन्तु आज एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूरे राजस्थान की जनता पूछ रही है—क्या अपनी ही मातृभाषा राजस्थानी को उसका उचित सम्मान दिए बिना अन्य भाषाओं के संवर्धन की बात पूर्ण मानी जा सकती है?
जिस धरती ने डिंगल, पिंगल, वीर-रस, लोकगीतों और समृद्ध साहित्य की अमूल्य परंपरा विश्व को दी, उसी राजस्थान की अपनी राजस्थानी भाषा आज भी संवैधानिक मान्यता और सम्मान की प्रतीक्षा में है।
हम किसी भाषा के विरोध में नहीं, बल्कि अपनी मातृभाषा के अधिकार के समर्थन में खड़े हैं। सभी भारतीय भाषाएँ सम्मान की अधिकारी हैं, लेकिन राजस्थानी भाषा को उसका न्यायसंगत स्थान और संवैधानिक पहचान मिलना भी उतना ही आवश्यक है।
राजस्थान की जनता अब आश्वासन नहीं, निर्णय चाहती है।
राजस्थानी भाषा को उसका सम्मान और संवैधानिक अधिकार अवश्य मिलना चाहिए।
#RajsthaniBhasha
@BhajanlalBjp