@fatehpurpolice@dmfatehpur@Uppolice सच्चाई के पक्ष में निष्पक्ष और ईमानदार कार्यवाही करने के लिए यूपी पुलिस का बहुत-बहुत धन्यवाद एवं हार्दिक आभार। आपकी कार्यवाही से आमजन का कानून और व्यवस्था पर विश्वास और मजबूत होता है। 🙏🇮🇳
मोहल्ले का एक सिरफिरा व्यक्ति पूरे मुहल्ले को स्विमिंग पूल बना सकता है अगर उसका घर पानी के निकास के अन्तिम छोर में हो।
सादर निवेदन है कि कृपया आवश्यक कार्रवाई हेतु निर्देशित करने की कृपा करें। आपकी इस कृपा के लिए हम सदैव आभारी रहेंगे। @dmfatehpur@Uppolice@fatehpurpolice
कृपया इससे पहले कि नाली विवाद को लेकर गांव रणभूमि बने कार्यवाही कराने का कष्ट करें।
पहले नाली तोड़ी गयी अब दीवार खड़ी कर पानी के निकास को पूरी तरह रोक दिया गया है
ग्राम-चक कोर्रा सादात, थाना-थरियांव, फ़तेहपुर का मामला है
@dmfatehpur@Uppolice@fatehpurpolice
कृपया इससे पहले कि नाली विवाद को लेकर गांव रणभूमि बने कार्यवाही कराने का कष्ट करें।
पहले नाली तोड़ी गयी अब दीवार खड़ी कर पानी के निकास को पूरी तरह रोक दिया गया है
ग्राम-चक कोर्रा सादात, थाना-थरियांव, फ़तेहपुर का मामला है
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स्मार्ट प्रीपेड मीटर घोटाले के चलते एक लाख 15 हजार करोड़ रुपए का एरियर खतरे में पड़ने की आशंका : निजीकरण हेतु प्रीपेड मीटर लगाकर डाउन साइजिंग करने की साजिश : निजीकरण के विरोध में प्रान्त भर में विरोध प्रदर्शन
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने आशंका जताई है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर घोटाले के चलते विद्युत वितरण निगमों का 115000 करोड़ रुपए का एरियर खटाई में पड़ सकता है। संघर्ष समिति ने यह भी आरोप लगाया है कि निजीकरण हेतु स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने के नाम पर बड़े पैमाने पर डाउन साइजिंग की जा रही है।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के केंद्रीय पदाधिकारियों ने आज यहां बताया कि सीतापुर, गोण्डा आदि स्थानों पर पकड़ा गया स्मार्ट प्रीपेड मीटर घोटाला निजी कंपनियों और दोषी उपभोक्ताओं की मिलीभगत के साथ किसी बड़ी साजिश का हिस्सा भी हो सकता है।
संघर्ष समिति ने कहा कि यह ध्यान देने की बात है कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण के पीछे सबसे बड़ा तर्क घाटे का दिया जा रहा है। संघर्ष समिति ने कहा कि वैसे तो पावर कार्पोरेशन प्रबंधन घाटे के झूठे और मनगढ़ंत आंकड़े दे रहा है। किन्तु स्मार्ट मीटर लगाने वाली कंपनियों की पुराने मीटर की रीडिंग शून्य करने या नष्ट करने के समाचार बहुत खतरनाक संदेश दे रहे हैं जिसे समय रहते न रोका गया तो बिजली राजस्व का बकाया वसूलना नामुमकिन हो जाएगा और वस्तुतः घाटा और बढ़ जाएगा।
संघर्ष समिति ने कहा कि वर्तमान में विद्युत वितरण निगमों का उपभोक्ताओं पर लगभग 115000 करोड रुपए का बिजली राजस्व का बकाया है। पॉवर कारपोरेशन प्रबन्धन के आंकड़ों के अनुसार लगभग 110000 करोड रुपए का घाटा है। संघर्ष समिति प्रारंभ से ही यह बात कह रही है कि 115000 करोड रुपए का राजस्व वसूल लिया जाए तो कोई घाटा नहीं रहेगा, उल्टे पावर कॉरपोरेशन 5000 करोड रुपए के मुनाफे में आ जाएगा।
संघर्ष समिति ने कहा कि उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार लगभग 34 लाख स्मार्ट मीटर लगाए गए हैं और इनमें से लगभग 06 लाख स्मार्ट मीटर अभी तक वापस नहीं किए गए हैं। कितने लाख मीटर में पुरानी रीडिंग शून्य की गई है या नष्ट की गई है यह एक बड़ी जांच का विषय है।
संघर्ष समिति ने कहा कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर निजीकरण की प्राथमिक शर्त है। स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगने के बाद निजीकरण होने पर निजी कंपनियों को राजस्व वसूली में किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा और उन्हें स्वतः राजस्व मिलता रहेगा।
स्पष्ट है कि निजीकरण हेतु स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं और इस नाम पर पावर कार्पोरेशन प्रबंधन ने निजीकरण के पहले बड़े पैमाने पर डाउनसाइजिंग करना प्रारंभ कर दिया है।
वर्ष 2017 के मापदंडों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में प्रति सबस्टेशन 20 कर्मचारी और शहरी क्षेत्र में 36 कर्मचारियों का नियम था। बड़े पैमाने पर संविदा कर्मचारियों की डाउन साइजिंग करने के लिए मापदंड में प्रतिगामी परिवर्तन किया गया। उपभोक्ताओं की संख्या 2017 की तुलना में कई गुना बढ़ चुकी है। इसके बावजूद अब शहरी क्षेत्र में प्रति सबस्टेशन 18:30 कर्मचारी और ग्रामीण क्षेत्र में प्रति सबस्टेशन 12.5 कर्मचारी का मापदण्ड बनाकर बड़ी संख्या में संविदा कर्मी निकाले जा रहे हैं। यह सब निजी घरानों की मदद के लिए किया जा रहा है।
#stop_privatization_of_uppcl
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उड़ीसा में निजी कंपनियों का लाइसेंस निरस्त करने हेतु स्वतः संज्ञान लेकर विद्युत नियामक आयोग ने सुनवाई की तारीख तय की : उड़ीसा के निजीकरण के विनाशकारी परिणाम को देखते हुए उप्र में बिजली के निजीकरण का निर्णय रद्द करने की मांग: निजीकरण के विरोध मे सितम्बर माह में किसानों, उपभोक्ताओं और कर्मचारियों के सम्मेलन
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से मांग की है कि उड़ीसा में हुए बिजली वितरण के निजीकरण के प्रयोग के विनाशकारी परिणाम आने के बाद उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का निर्णय निरस्त किया जाय। संघर्ष समिति ने ऐलान किया है कि निजीकरण के विरोध में सितंबर माह में किसानों, गरीब व मध्यमवर्गीय उपभोक्ताओं और बिजली कर्मियों के सम्मेलन प्रदेश भर में किए जाएंगे।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उप्र के केंद्रीय पदाधिकारियों ने आज यहां बताया कि उड़ीसा के विद्युत नियामक आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए टाटा पावर की चारों विद्युत वितरण कंपनियों का लाइसेंस निरस्त करने के लिए 10 अक्टूबर को सुनवाई की तारीख तय की है। पहले यह तारीख 28 अगस्त को तय की गई थी लेकिन 29 अगस्त को उड़ीसा में स्थानीय अवकाश होने के कारण इसे 10 अक्टूबर को पुनर्धारित कर दिया गया है।
संघर्ष समिति ने बताया कि उड़ीसा के सभी उपभोक्ता फोरमों की ओर से श्री किशोर पटनायक ने 16 अगस्त को टाटा पावर की चारों विद्युत वितरण कंपनियों के विरुद्ध उपभोक्ता सेवा में पूरी तरह अक्षम रहने और उपभोक्ताओं का उत्पीड़न करने के आरोप लगाते हुए इन कंपनियों का विद्युत वितरण का लाइसेंस निरस्त करने की मांग की थी। उपभोक्ता फोरमों ने उड़ीसा विद्युत नियामक आयोग रेगुलेशन 2004 की धारा 9(1) और (4) के अंतर्गत उपभोक्ता सेवाओं में पूरी तरह विफल रहने के आरोप लगाते हुए दाखिल की थी।
उपभोक्ता फोरमों ने अपनी प्रेयर में कहा है कि विद्युत परिषद को विघटित करने का और उसके उपरांत विद्युत वितरण का निजीकरण करने का सबसे पहला प्रयोग उड़ीसा में हुआ। यह दोनों ही प्रयोग पूरी तरह विफल रहे हैं। निजीकरण के परिणाम विनाशकारी हैं और उपभोक्ता दर दर भटक रहे हैं।
उपभोक्ता फोरमों का आरोप है कि भीषण गर्मी में घंटों बिजली की कटौती की जा रही है, बिना प्रॉपर नोटिस के विद्युत विच्छेदन किया जा रहा है, बेतहाशा बढ़े हुए गलत बिल भेजे जा रहे हैं और सबसे अधिक स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाकर उपभोक्ताओं को परेशान किया जा रहा है।
उपभोक्ता फोरमों ने अपने आवेदन में यह भी कहा है कि उड़ीसा के पूर्व बिजली कर्मियों को टाटा पावर द्वितीय श्रेणी का नागरिक मानती है। उनको बिना काम के किनारे बैठा रखा गया है और उनका करियर बर्बाद हो रहा है।
संघर्ष समिति ने कहा की उड़ीसा में सबसे पहले 1999 में निजीकरण किया गया था। निजीकरण के एक साल बाद ही अमेरिका की एईएस कंपनी वापस चली गई। रिलायंस पावर की बाकी तीनों कंपनी का लाइसेंस फरवरी 2015 में विद्युत नियामक आयोग ने पूरी तरह अक्षम रहने के कारण रद्द कर दिया था।
2020 में चारों कंपनियों का लाइसेंस टाटा पावर को दिया गया और अब विद्युत नियामक आयोग ने बेहद खराब उपभोक्ता सेवा का स्वत: संज्ञान लेते हुए 15 जुलाई 2025 को टाटा पावर की चारों कंपनियों को नोटिस जारी कर दिया है। टाटा पावर का लाइसेंस निरस्त करनी हेतू 10 अक्टूबर को सुनवाई हो रही है।
संघर्ष समिति ने कहा की उड़ीसा में कृषि क्षेत्र उत्तर प्रदेश की तुलना में बहुत कम है। बिजली के क्षेत्र में घाटा मुख्यतः ग्रामीण और कृषि क्षेत्र में होता है। निजीकरण का प्रयोग उड़ीसा जैसे औद्योगिक ।प्रांत में विफल रहा है और निजीकरण के लाइसेंस निरस्त करने हेतु सुनवाई हो रही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के 42 जनपदों की गरीब जनता पर निजीकरण न थोपा जाय।
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उत्तर प्रदेश के 42 जनपदों के निजीकरण पर छाया बड़ा संकट नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने निजीकरण के पूरे मसौदे की पत्रावली व सभी कागजात किया तलब छानबीन की शुरू पावर कारपोरेशन में मचा हड़कंप भ्रष्टाचारियों का फसना तय उपभोक्ता परिषद की लड़ाई रंग लाई।
किसानों की ,बुनकरों की ,ग्रामीण उपभोक्ताओं की सब्सिडी एवं सरकारी बकाए को घाटे में दिखाना क्या सही है?? जब सब्सिडी देने से विभाग बेचने की नौबत आ रही है तो सब्सिडी क्यों दे रहे आप??
हमे अपनी बिजली खुद खरीदने और बेचने का अधिकार क्यों नहीं दे रहा ऊर्जा प्रबंधन?
सनातन राज करने की चालबाजियां के तहत गलत तथ्य पेश करके विभागों का निजीकरण करने से पहले
सनातन जीवन बचाए रखने के लिए अमृत खोज लेना चाहिए।
वरना निजीकरण का पाप कोई और करेगा
मौज कोई और
Shame on to hold salary
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विद्युत कर्मचारियों का कार्य आपातकालीन स्थिति में काम कर रहे किसी डॉक्टर से कम नहीं है, लेकिन
विद्युत कर्मी ऊर्जा जन शक्ति जैसे महा घटिया ऐप पर घंटों अटेंडेंस लगाने में बर्बाद करके अपनी सैलरी बचाएं या लोगों का जीवन।
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विगत 222 दिन से बिजली के कर्मचारी बिजली के निजीकरण के विरोध में लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन कर रहे हैं।
बिजली का निजीकरण सिर्फ और सिर्फ चुनिंदा पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया जा रहा है, अरबों, खरबों की सरकारी संपत्तियां कौड़ियों के भाव बेची जा रही हैं, 42 जनपदों के बिजली की सभी जमीन मात्र ₹1 प्रति माह की लीज पर दी जा रही है।
अब बिजली कर्मियों और किसानों के साथ-साथ प्रदेश की जनता भी मानने लगी है कि बिजली के निजीकरण में बहुत बड़ा घोटाला होने जा रहा है। बिजली के निजीकरण से बिजली की दरों में कई गुना वृद्धि होने वाली है, और बिजली का निजीकरण प्रदेश की जनता के हित में नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदेश की जनता बिजली के निजीकरण का विरोध कर रही है, प्रदेश का किसान बिजली के निजीकरण का विरोध कर रहा है, प्रदेश का बिजली कर्मचारी बिजली के निजीकरण का विरोध कर रहा है, प्रदेश का छात्र बिजली के निजीकरण का विरोध कर रहा है, प्रदेश का व्यापारी बिजली के निजीकरण का विरोध कर रहा है, प्रदेश का गरीब बिजली के निजीकरण का विरोध कर रहा है, प्रदेश के युवा बिजली के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं, तो फिर यह बिजली का निजीकरण किसको लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है ?
जबकि सबको पता है कि बिजली के निजीकरण से बिजली की दरों में वृद्धि होगी, सरकारी नौकरियां के पद समाप्त होगे, सरकारी नौकरियों में मिलने वाला आरक्षण समाप्त होगा, किसानों को मिलने वाली मुफ्त बिजली समाप्त होगी, गरीब बीपीएल उपभोक्ताओं को मिलने वाली सब्सिडी भी समाप्त होगी। तो फिर निजीकरण क्यों किया जा रहा है ?
अब प्रदेश की जनता बिजली कर्मचारियों के साथ खुलकर निजीकरण का विरोध कर रही है प्रदेश की देवतुल्य जनता का सादर आभार।
माननीय मुख्यमंत्री जी से अनुरोध है कि व्यापक जनहित में बिजली की निजीकरण का प्रस्ताव निरस्त किया जाए।
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