@narpat_rat18280 @AnkitTi92697961 सच्चे राजपूत देश दुनिया के साथ कनेक्ट रहते हैं देश व समाज हित में वोट करते हैं न की किसी जाति विशेष के लिए काम नहीं करते हैं जो दूर सोच रखते हैं वह #राजपूत कहलाने का हक रखते हैं । अपने वारे में तो सभी सोचते हैं।
सुवेंदु अधिकारी के PA चंद्रनाथ रथ जी के हत्या में अभिषेक बनर्जी का हाथ होने की पूरी संभावना है
उसके कई कारण है
पहला कारण यह कि वह वीडियो भी है जिसमें अभिषेक बनर्जी चुनाव के बाद चंद्रनाथ रथ को देखने की धमकी दे रहे हैं
और दूसरा यह जब एक काउंटिंग सेंटर पर ममता बनर्जी जबरदस्ती घुसने का प्रयास कर रही थी तब चंद्रनाथ रथ ने ममता बनर्जी को रोका था उन्हें नियम बताए थे कि आप बगैर प्रॉपर आई कार्ड के आप घूस नहीं सकती और यहां तो आप बिल्कुल नहीं घुस सकती क्योंकि आप यहां उम्मीदवार नहीं है
और फिर ममता बनर्जी को वहां से जाना पड़ा था
तब अभिषेक बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के साथ आए एक व्यक्ति ने उनसे काफी देर तक लड़ाई झगड़ा किया था उन्हें धमकी दिया था उन्हें मारने की बात किया था
जिसका यह वीडियो है
जब पाप मानने से बजा घंटा :-
काशी के विश्वनाथ मंदिर में एक घंटा था जो सौ साल से नहीं बजा था, क्योंकि उसे बजाने के लिए पाप रहित हाथ चाहिए था।
औरंगजेब के समय में जब मंदिर टूटा, तब पुजारियों ने एक बड़ा पीतल का घंटा कुएँ में छिपा दिया। जब अहिल्याबाई ने मंदिर फिर बनवाया तो घंटा निकाला गया। महंत ने उस पर संस्कृत में खुदवाया, यह घंटा वही बजाए जिसके मन में चोरी, झूठ और हिंसा न हो।
लोग आए, राजा आए, साधु आए सबने रस्सी खींची। घंटा हिला तक नहीं। धीरे-धीरे लोगों ने कोशिश छोड़ दी। घंटा मंदिर के कोने में लटकता रहा, धूल जमती रही। बच्चे पूछते, बाबा यह बजता क्यों नहीं। पुजारी कहते, पाप रहित हाथ अब कलियुग में कहाँ।
एक बार माघ की अमावस्या को काशी में भारी भीड़ थी। उसी रात गाजीपुर से माधो नाम का एक चोर काशी आया। वह पंद्रह साल से चोरी करता था। पहले मजबूरी में, फिर आदतन। उस रात उसने सोचा, विश्वनाथ के दर्शन करने वालों की भीड़ में किसी सेठ की थैली मिल जाएगी।
वह घाट पर नहाया भी नहीं, सीधे मंदिर की गली में घुसा। भीड़ में धक्का लगा, एक बूढ़ा गिर पड़ा। माधो ने उसे उठाया। बूढ़े की लाठी टूट गई। माधो ने अपनी धोती फाड़कर लाठी बाँध दी। बूढ़ा बोला, भगवान तुम्हारा भला करे।
मंदिर में आरती हो रही थी। पुजारी ने कहा, आज कोई पाप रहित है तो घंटा बजाकर दिखाए। माधो कोने में खड़ा था। उसने सोचा, मैं तो पापी हूँ, पर घंटा देखूँ तो सही। वह धीरे-धीरे घंटे के पास गया। रस्सी पर हाथ रखा। तभी पीछे से एक आवाज आई, मत छू। वह मुड़ा, देखा एक सात साल की लड़की, मैली फ्रॉक, हाथ में मिट्टी का दिया।
लड़की बोली, तुमसे नहीं बजेगा। माधो बोला, तू कौन है। लड़की बोली, मैं गंगा किनारे फूल बेचती हूँ। माँ बीमार है। आज दिया चढ़ाने आई हूँ। पंडित जी ने कहा था घंटा पापी से नहीं बजता। माधो ने पूछा, तू पापी है ? लड़की हँसी, मैंने कल एक बेर चुराकर खा लिया था।
माधो का हाथ रुक गया। उसने पहली बार किसी को अपने जैसा देखा। आरती खत्म हुई। लड़की ने दिया जलाकर शिवलिंग के पास रखा, फिर लौटकर बोली, तुमने उस बूढ़े को उठाया था। माधो चौंका, तू वहाँ थी ? लड़की बोली, हाँ तुम चोर हो न ! माधो ने सिर झुका लिया। लड़की ने उसकी हथेली पकड़ी और कहा, चलो दोनों खींचते हैं। पाप आधा-आधा बँट जाएगा। माधो हँसा, फिर भी उसने लड़की का हाथ पकड़ लिया। दोनों ने मिलकर रस्सी खींची। पहले कुछ नहीं हुआ। फिर घंटा हल्का सा हिला। दूसरी बार खींचा, एक धीमी गूँज निकली, टन। तीसरी बार दोनों ने पूरी ताकत लगाई। सौ साल बाद काशी का वह घंटा बजा। आवाज ऐसी गूँजी कि कबूतर उड़ गए, पुजारी थाली छोड़कर दौड़े, भीड़ रुक गई। पुजारी चिल्लाया, किसने बजाया। माधो डर कर भागने लगा। लड़की ने उसका कुर्ता पकड़ लिया, बोली भागो मत।
पुजारी ने देखा, एक चोर और एक फूलवाली। वह बोला, असंभव। तुम दोनों पापी हो। माधो ने हाथ जोड़कर कहा, महाराज मैं चोर हूँ। मैंने जीवन में सैकड़ों जेबें काटीं। आज भी चोरी करने आया था। पर इस बच्ची ने मेरा हाथ पकड़ा। इसने कहा पाप बाँट लेते हैं। मैंने सोचा, अगर पाप बाँट सकते हैं तो शायद पुण्य भी। लड़की बोली, मैंने बेर चुराया था। पुजारी चुप रहा। महंत आए। उन्होंने घंटा देखा, रस्सी देखी। बोले, सौ साल में पहली बार बजा है। शास्त्र कहता है पाप रहित हाथ चाहिए। इसका अर्थ तुमने गलत समझा। लोगों ने पूछा, क्या अर्थ है। महंत बोले, पाप रहित का अर्थ निष्पाप होना नहीं, अपने पाप को जानना है। जो अपने पाप को छिपाता है, उसका हाथ भारी होता है। जो कहता है मैं पापी हूँ, मुझे क्षमा करो, उसका हाथ हल्का हो जाता है। आज इस घंटे को दो हल्के हाथों ने छुआ है, एक ने चोरी मानी, एक ने बेर चुराना माना।
घंटा रोज बजने लगा। उस रात के बाद महंत ने नियम बदल दिया। अब आरती से पहले पुजारी कहता, जिसने आज कोई भूल की हो, आए और घंटा बजाए। पहले दिन कोई नहीं आया। दूसरे दिन एक हलवाई आया, बोला मैंने घी में मिलावट की। उसने रस्सी खींची, घंटा बजा। फिर एक छात्र आया, बोला मैंने माँ से झूठ बोला। घंटा बजा।
माधो ने चोरी छोड़ दी। वह गंगा किनारे नाव चलाने लगा। लड़की का नाम गौरी था। माधो ने उसकी माँ का इलाज कराया। गौरी अब फूल नहीं बेचती, मंदिर में दिया जलाती है।
लोग पूछते हैं, घंटा अब रोज कैसे बजता है। पुजारी हँसकर कहता है, क्योंकि काशी में अब लोग पाप छिपाते नहीं, मान लेते हैं। सौ साल का मौन इसलिए नहीं था कि दुनिया में कोई पवित्र नहीं था। मौन इसलिए था कि सब खुद को पवित्र समझते थे।
जिस दिन हम अपने भीतर की चोरी स्वीकार कर लेते हैं, उसी दिन हमारे हाथ भी घंटा बजा सकते हैं। और काशी का वह घंटा आज भी बजता है, हर शाम, किसी न किसी हल्के हाथ से।